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कृषि बिल के विरुद्ध क्यों हो रहा है किसान आंदोलन, यहां जानिए पूरी डिटेल

संजीवनी टुडे 25-09-2020 13:48:59

कृषि बिल के विरुद्ध किसान संगठनों ने आज भारत बंद बुलाया है।


नई दिल्ली। कृषि बिल के विरुद्ध किसान संगठनों ने आज भारत बंद बुलाया है। यहीं नहीं, पंजाब में तो रेल रोको आंदोलन भी प्रारम्भ हो गया है। कुछ किसान ट्रैक्टर से दिल्ली आ रहे हैं जिन्हें हरियाणा में रोका गया है। इस मध्य कांग्रेस ने राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन प्रारम्भ करने का निर्णय लिया है। 

Bharat Bandh

जानें कृषि बिल के विरुद्ध क्यों हो रहा है किसान आंदोलन?
- किसानों को सबसे बड़ा भय न्यूनतम समर्थन मूल्य समाप्त होने का है। इस बिल के जरिए सरकार ने कृषि उपज मंडी समिति मतलब मंडी से बाहर भी कृषि व्यवसाय का रास्ता खोल दिया है। मंडी में लाइसेंसी ट्रेडर किसान से उसकी उपज एमएसपी पर लेते हैं। किन्तु बाहर व्यवसाय करने वालों हेतु एमएसपी को बेंचमार्क नहीं बनाया गया है। इसलिए मंडी से बाहर एमएसपी प्राप्त होने की कोई गारंटी नहीं है। 

- सरकार ने बिल में मंडियों को समाप्त करने की बात कहीं पर भी नहीं लिखी है। किन्तु उसका इंपैक्ट मंडियों को बर्बाद कर सकता है। इसका अनुमान लगाकर किसान डरा हुआ है। उनका मानना है कि मंडियां बचेंगी तभी तो किसान उसमें एमएसपी पर अपनी उपज बेच सकेगा। 

- इस बिल से ‘वन कंट्री टू मार्केट’ वाली नौबत उत्पन्न होती हुई नजर आ रही है।  क्योंकि मंडियों में कर का भुगतान होगा और मंडियों के बाहर कोई टैक्स नहीं लगेगा। फिलहाल मंडी से बाहर जिस एग्रीकल्चर ट्रेड की सरकार ने व्यवस्था की है उसमें कारोबारी को कोई कर नहीं देना होगा। जबकि मंडी में औसतन 6-7 फीसदी तक का मंडी टैक्स लगता है। 

- किसानों की तरफ से यह तर्क दिया जा रहा है कि आढ़तिया या फिर कारोबारी अपने 6-7 फीसदी टैक्स का नुकसान न करके मंडी से बाहर खरीद करेगा। जहां उसे कोई कर नहीं देना है। इस निर्णय से मंडी व्यवस्था हतोत्साहित होगी। मंडी समिति कमजोर होंगी तो किसान धीरे-धीर बिल्कुल बाजार के हवाले चला जाएगा। 

- किसानों की इस चिंता के मध्य राज्‍य सरकारों-खासकर पंजाब एवं हरियाणा- को इस बात का भय सता रहा है कि यदि निजी खरीदार सीधे किसानों से अनाज खरीदेंगे तो उन्‍हें मंडियों में मिलने वाले कर का नुकसान होगा। दोनों राज्यों को मंडियों से मोटा कर प्राप्त होता है, जिसे वे विकास कार्य में उपयोग करते हैं।  हालांकि, हरियाणा में भाजपा का शासन है इसलिए यहां के सत्ताधारी नेता इस मामले पर चुप हैं। 

- एक बिल कांट्रैक्ट फार्मिंग से संबंधित है। इसमें किसानों के अदालत जाने का अधिकार छीन लिया गया है। कंपनियों और किसानों के मध्य विवाद होने की सूरत में एसडीएम निर्णय करेगा। उसकी अपील अदालत में न होकर डीएम के यहां होगी। किसानों को डीएम, एसडीएम पर भरोसा नहीं है क्योंकि उन्हें लगता है कि इन दोनों पदों पर बैठे लोग सरकार की कठपुतली की तरह होते हैं। वो कभी किसानों के हित की बात नहीं करते। 

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- भारत सरकार जो बात एक्ट में नहीं लिख रही है उसका ही वादा बाहर कर रही है। इसलिए किसानों में भ्रम फैला हुआ है। सरकार अपने ऑफिशियल बयान में एमएसपी जारी रखने तथा मंडियां बंद न होने का वादा कर रही है, पार्टी फोरम पर भी यही बोल रही है, किन्तु यही बात एक्ट में नहीं लिख रही। किसानों को लगता है कि सरकार का कोई भी बयान एग्रीकल्चर एक्ट में एमएसपी की गारंटी देने की बराबरी नहीं कर सकता। क्योंकि एक्ट की वादाखिलाफी पर सरकार को कोर्ट में खड़ा किया जा सकता है, जबकि पार्टी फोरम एवं बयानों का कोई कानूनी आधार नहीं है। हालांकि, सरकार सिरे से किसानों की इन आशंकाओं को खारिज कर रही है। 

यह खबर भी पढ़े: कृषि बिल के विरोध में आज किसानों का 'भारत बंद', इन राज्यों पर दिखेगा प्रभाव

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