संजीवनी टुडे

गोडसे ने नहीं मारा होता, तो बापू को देश इतना महान नहीं मानता : कपिल मिश्रा

संजीवनी टुडे 17-05-2019 15:52:32


नई दिल्ली। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को लेकर छिड़े विवाद के बीच शुक्रवार को आम आदमी पार्टी(आप) के बागी नेता और विधायक कपिल मिश्रा ने यह कहकर नई बहस छेड़ दी है कि हत्या ने बापू को महान बना दिया। हालांकि जिस भावावेश में हत्या की गई वो असली मुद्दे छोटे हो गए। कपिल मिश्रा ने सोशल मीडिया के माध्यम से जारी संदेश में कहा कि यदि गोडसे ने नहीं मारा होता, तो बापू को देश इतना महान नहीं मानता। उन्होंने कहा कि गोडसे ने अगर बापू को नहीं मारा होता तो शायद बापू को यह देश इतना महान नहीं मानता। वहीं नकली गांधी बनकर राज करने वाले शायद आज होते ही नहीं कहीं।

कपिल मिश्रा ने कहा कि जीवन के अंतिम दिनों में बापू पाकिस्तान और पाकिस्तानी सोच के आगे समर्पण करते दिखे थे, अपने अहिंसा के सिद्धांत को महान बनाने का एक लालच उन्हीं आंखों पर पट्टी की तरह बन गया था, ऐसा लगता है। अगर बापू जिंदा रहते तो देश में खुलकर इन मुद्दों की चर्चा होती लेकिन बापू की हत्या के कारण इन मुद्दों पर बोलना भी गुनाह हो गया। मिश्रा ने कहा कि हत्या होते ही बापू के बारे में निगेटिव बोलना अपराध बन गया। बापू जिंदा होते तो जिस रास्ते पर वो चल चुके थे, वो लोगों में तेजी से अनपॉपुलर होते। जैसे आज गोडसे के विचार या सोच बताने के लिए मुश्किल होती हैं, वैसे गांधी के विचार बताने में मुश्किल होती। 

लोगों के मन में गांधी की आंदोलन, अहिंसा, महात्मा की छवि धुंधली हो जाती और पाकिस्तान के प्रति समर्पण, अहिंसा को सही बताने की अंधी जिद में कायरता की तरह तरफ झुकना जैसी यादें ही रह जाती। मिश्रा ने कहा कि बापू को ना भारत में साथ मिलता ना पाकिस्तान में। शायद उन्हें राष्ट्रपिता भी नहीं माना जाता। गोडसे ने बापू की हत्या करके एक तरह की नई लाइफ लाइन दे दी बापू के विचारों को लेकिन हत्या ने अन्य सभी सवाल दबा दिए लंबे समय के लिए। आज 70 साल बाद लोगों के मन में सवाल उठने लगे हैं दोबारा, बंटवारे के समय किसने क्या किया, क्यों किया। शायद 100 साल के बाद खुलकर बोलने और कहने भी लगेंगे सब। गोडसे के बयानों और कोर्ट की कार्यवाही को पढ़कर हर कोई भावुक होता है।

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मिश्रा ने कहा कि बिना गांधी की हत्या के अगर वह विचार सामने आते तो विचारों की ताकत कुछ और भी ज्यादा होती। शायद नकली गांधीवादियों का गंदा खेल देश को नहीं झेलना पड़ता। आज ऊपर कहीं बापू और गोडसे एक साथ बैठे होंगे, एक दूसरे को जानने समझने का पूरा समय होगा उनके पास। भगवान राम ने दोनों की आस्था थी, इसलिए दोस्ती भी हो गई होगी। क्या सोचते होंगे दोनों- शायद गोडसे सोचते होंगे कि हिंसा ना करता तो ज्यादा अच्छा होता और बापू सोचते होंगे कि देश और धर्म के आत्मसम्मान के लिए कभी-कभी अहिंसा छोड़ना भी पड़े तो ठीक है। बाबू और गोडसे तो एक दूसरे को समझ चुके होंगे लेकिन शायद हम ना बापू को समझ पाए और ना गोडसे को।

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