संजीवनी टुडे

फसलों के अवशेष जलाने के मामलों में भारी कमी, प्रदूषण का स्तर घटा

इनपुट-यूनीवार्ता

संजीवनी टुडे 13-08-2019 19:34:54

फसलों के अवशेष जलाने के मामलोंं में काफी कमी आयी जिससे प्रदूषण का स्तर घटा और फसलों का उत्पादन बढ़ा एवं सिंचाई में कमी आयी।


नई दिल्ली। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने दावा किया है कि तकनीक के उपयोग और जागरुकता के कारण पिछले वर्ष दिल्ली के आसपास के राज्यों में फसलों के अवशेष जलाने के मामलोंं में काफी कमी आयी जिससे प्रदूषण का स्तर घटा और फसलों का उत्पादन बढ़ा एवं सिंचाई में कमी आयी। 

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परिषद के महानिदेशक त्रिलोचन महापात्रा ने मंगलवार को यहां संवाददाता सम्मेलन में कहा कि इस संबंध में आईसीएआर और पंजाब कृषि विश्वविद्यालय ने सात वर्ष तक शोध कार्य किया जिसके नतीजे चौंकाने वाले हैं। उन्होंने कहा कि किसानों ने जब फसलों के अवशेष जलने से मिट्टी में होने वाले नुकसान और उसे हैपीसीडर मशीन से जोत कर खेत में मिलने से होने वाले फायदे को देखा तो वे समझ गये। हरियाणा में 40 से 45 प्रतिशत, पंजाब में 12 प्रतिशत और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 20 प्रतिशत फसलों के अवशेष जलाने की घटनाओं में कमी आई है। 

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उन्होंने बताया कि फसलों के अवशेष को मशीन से खेत में मिलाने तीन से पांच साल के दौरान मिट्टी में कार्बन की मात्रा 70 प्रतिशत तक बढ़ जाती है जिससे उर्वरा शक्ति बढ़ती है और फसलों का 10 से 20 प्रतिशत उत्पादन बढ़ता है। इसके साथ ही सिंचाई के लिए 20 प्रतिशत कम पानी की जरूरत होती है। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में धान काट कर जल्दी गेहूं बोने के लिए धान के अवशेष जलाने की घटना होती है। 

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