संजीवनी टुडे

...अपनों ने ही भुला दिया रायबरेली के प्रथम सांसद फिरोज गांधी को

संजीवनी टुडे 23-03-2019 13:23:00


रायबरेली। देश के पहले आम चुनाव में रायबरेली के प्रथम सांसद के रूप में प्रतिनिधित्व करने वाले फिरोज गांधी अब अप्रासंगिक हो चुके हैं। रायबरेली से अपने रिश्तों की बात करने वाले अपनों ने ही फिरोज को भुला दिया है। 

फिरोज को भले ही उन्हीं के परिवार और पार्टी ने भुला दिया हो लेकिन लोगों के दिलों में आज भी उनके काम व आदर्श ताजा है। उन्होंने न केवल अपनी संसदीय प्रतिभा की धाक देश भर में जमाई बल्कि रायबरेली को भी विकास की से जोड़ा।मात्र 240000/- में टोंक रोड जयपुर में प्लॉट 9314166166

 रायबरेली का प्रतिनिधित्व करके फिरोज को अपनी संसदीय प्रतिभा को राष्ट्रीय स्तर पर रखने का मौका मिला। सभी जानते हैं कि पार्टी के इतर उनकी छवि एक तेज तर्रार और ईमानदार नेता की थी जो मुद्दों को लेकर पार्टी लाइन से अलग राय रखते थे। शायद कम ही लोगों को पता है कि फिरोज रायबरेली के लिए नए नहीं थे। आजादी के पहले से ही उनका रायबरेली से नाता था।

उनकी बेबाकी और खुलकर राय रखने के उदाहरण यहां लोगों ने पहले भी देखे थे। प्रसिद्ध सर्वोदयी नेता रवींद्र सिंह चौहान के अनुसार तत्कालीन कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रफी अहमद किदवई ने ही फिरोज गांधी को रायबरेली में सक्रिय होने के लिए प्रेरित किया। 1946 के सेंट्रल और प्रोविंशियल विधान परिषद के चुनाव के दौरान की एक घटना का जिक्र करते हुए चौहान कहते हैं कि शिवगढ़ के राजा ने मुसलमानों की एक मीटिंग बुलाई थी जिसमें रफी अहमद किदवई और फिरोज गांधी भी थे।

MUST WATCH & SUBSCRIBE

 मीटिंग में सभी ने मुस्लिम लीग के उम्मीदवार की जमानत जब्त हो जाने की बात कही लेकिन फिरोज ने सभी के सामने तथ्यात्मक रूप से बताया कि कांग्रेस उम्मीदवार कितना कमजोर है। उस समय किसी ने उनकी बात नहीं मानी और परिणाम आने पर कांग्रेस उम्मीदवार को पराजय मिली। 

इस बात के कई उल्लेख मिलते हैं कि इलाहाबाद का निवासी होने के बावजूद फिरोज गांधी वहां से चुनाव नहीं लड़ना चाहते थे। रायबरेली में पहले से सक्रियता और रफी अहमद किदवई की मित्रता के बदौलत उन्होंने यहां से पहला चुनाव लड़ने का निश्चय किया और 1952 और 1957 में यहां से निर्वाचित हुए। 

बाद के वर्षों में उनकी पत्नी इंदिरा गांधी से लेकर बहू सोनिया गांधी से लेकर अन्य गांधी परिवार के लोग यहां से चुनाव जीते। फिरोज ने ही रायबरेली और गांधी परिवार के बीच के संबंधों को जोड़ा। रायबरेली से भावनात्मक रिश्तों की बात करने वालो के लिए फिरोज गांधी अप्रासंगिक हैं। चुनाव प्रचार से लेकर पार्टी के कार्यक्रमों तक कहीं भी फिरोज गांधी की चर्चा तक नहीं होती। शायद फिरोज कभी वोट पाने का जरिया नहीं बन पाए।

More From national

Loading...
Trending Now
Recommended