संजीवनी टुडे

नोबल पुरस्कार प्राप्त अमर्त्य सेन पर बनी डॉक्युमेंट्री, 9 मार्च को होगी रिलीज

संजीवनी टुडे 25-02-2018 22:13:50

Source: Google


नई दिल्ली। नोबल पुरस्कार से सम्मानित अमर्त्य सेन पर बनी डॉक्यूमेंटरी 9 मार्च, 2018 को पश्चिम बंगाल में रिलीज होगी। फिल्म डॉयरेक्टर सुमन घोष ने बताया, ‘मैंने साल 2002-3 में कुछ दोस्तों के साथ भारत, ब्रिटेन और अमेरिका में शूट करना शुरू। डॉक्युमेंट्री करीब 15 सालों बाद 2017 में पूरी हुई। कोलकाता सेंसर बोर्ड ने ‘यू’ प्रमाण-पत्र देने के लिए डॉक्यूमेंट्री से छह शब्दों को हटाने के लिए कहा। ये शब्द थे गुजरात, भारत में, हिंदू, गाय, इन दिनों, हिंदुत्व।’ डायरेक्टर ने लोगों से डॉक्यूमेंट्री देखने की अपील की है।

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डायरेक्टर सुमन घोष ने कहा है कि सेंसर बोर्ड की सलाह पर फिल्म में ‘गुजरात’ शब्द पर बीप किया गया है। करीब एक घंटे की यह डॉक्यूमेंट्री ‘द आर्ग्यूमेंटेटिव इंडियन’ तब विवादों में आ गई थी जब कोलकाता के फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने इसमें 9 शब्दों की आवाज बीप करने को कहा था। हालांकि सीबीएफसी मुंबई ने 11 जुलाई 2017 को केवल एक शब्द ‘गुजरात’ पर बीप के साथ इसे मंजूरी दे दी। 

बता दें कि इससे पहले डॉक्यूमेंट्री पर सीबीएफसी के अध्यक्ष पहलाज निहलानी ने तर्क दिया था कि इन शब्दों को हटाने से रचनात्मकता प्रभावित होना महसूस करने का कोई कारण नहीं है, जब ये शब्द संस्कृति और लोकतंत्र की स्पष्ट अवमानना को दर्शाते हैं। एक जगह सेन ने भारतीय लोकतंत्र के बारे में बात की और गुजरात के ‘क्रिमिनलिटीज’ (अपराधिता) का हवाला दिया, इसलिए हमने ‘गुजरात’ शब्द हटाने के लिए कहा।”

उन्होंने बताया कि डॉक्युमेंट्री में एक जगह धार्मिक नेतृत्व का संदर्भ देश के दुश्मन के तौर पर दिया गया है, जहां से उन्होंने ‘भारत’ शब्द हटाने के लिए कहा है। एक जगह प्रोफेसर सेन भारत की बात करते हैं, जहां ‘हिंदू’ के के रूप में इसकी व्याख्या की गई है, इस शब्द (हिंदू) को हटाने के लिए कहा गया है। चौथा कट ‘गाय’ शब्द को लेकर हैं, जहां प्रोफेसर धार्मिक एकीकरण की बात करते हुए गाय का तुच्छ संदर्भ देते हैं।

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उन्होंने बताया कि पांचवा कट ‘यूज्ड’ और ‘दीज डेज’ शब्द को लेकर है, जहां सेन कहते हैं कि वेदों का इस्तेमाल आजकल सम्प्रदायवादी कर रहे हैं और अंतिम शब्द ‘बैनल’ को हटाने के लिए कहा गया है, जहां सेन ने भारत के हिंदुत्व विचार को घिसा-पिटा बताया है।

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निहलानी ने कहा, “मेरे पास प्रिंट मीडिया और टेलीविजन चैनलों के लगातार ढेर सारे फोन आ रहे हैं, जो पूछ रहे हैं कि हमने डॉक्युमेंट्री में छह शब्दों की जगह बीप लगाने का निर्देश क्यों दिया है। इसका कारण यह है कि हमें लगा कि नोबेल पुरस्कार विजेता पर डॉक्यूमेंट्री में हमारे राजनीति और धर्म को असंवेदनशील रूप में दर्शाने से देश में शांति और सामंजस्य को गंभीर खतरा हो सकता है। 

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