संजीवनी टुडे

बहुविवाह और निकाह हलाला को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर जल्द सुनवाई से इनकार

संजीवनी टुडे 12-07-2019 16:00:24

सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम समाज में प्रचलित पुरुषों के बहुविवाह और निकाह हलाला को चुनौती देने वाली याचिकाओं को जल्द सुनवाई करने से इनकार कर दिया है।


नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम समाज में प्रचलित पुरुषों के बहुविवाह और निकाह हलाला को चुनौती देने वाली याचिकाओं को जल्द सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता और बीजेपी नेता अश्विनी उपाध्याय से कहा कि अभी सुनवाई के लिए संविधान बेंच का गठन कर पाना संभव नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने 26 मार्च 2018 को इस मसले पर सरकार को नोटिस जारी किया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सुनवाई के लिए संविधान बेंच को रेफर कर दिया था। कोर्ट ने इस मामले में सहयोग करने के लिए अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल और विधि आयोग को निर्देश दिया था।

बीजेपी नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय और सायरा बानो के बाद दिल्ली की महिला समीना बेगम ने बहुविवाह और निकाह-हलाला के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। अपनी याचिका में इस महिला ने बहुविवाह और निकाह-हलाला को भारतीय दंड संहिता के तहत अपराध घोषित करने और मुस्लिम पर्सनल लॉ की धारा 2 को असंवैधानिक करार देने की मांग की है।

दक्षिणी दिल्ली की समीना बेगम ने याचिका दायर की है। उसने याचिका में कहा है कि उसकी शादी 1999 में जावेद अनवर से हुई थी। उससे उसे दो बेटा पैदा हुआ था। जावेद ने उस पर काफी अत्याचार किया। जब उसने आईपीसी की धारा 498ए के तहत शिकायत दर्ज कराई तो जावेद ने उसे तलाक का पत्र भेज दिया। उसके बाद उसने 2012 में रियाजुद्दीन नामक व्यक्ति से शादी की, जिसकी पहले से ही आरिफा नामक महिला से शादी हो चुकी थी। रिजायुद्दीन ने भी उसे उस समय फोन पर तलाक दे दिया था जब वह गर्भवती थी।

वकील अर्चना पाठक के जरिये दायर अपनी याचिका में समीना ने कहा है कि उसे बाध्य होकर यह याचिका दायर करनी पड़ रही है। वो खुद बहुविवाह की पीड़ित रही है जो कि हलाला के साथ मुस्लिम समाज में काफी प्रचलित है। याचिका में कहा गया है कि भारत में विभिन्न धार्मिक समुदायों को अपने-अपने निजी कानूनों के मुताबिक चलने की अनुमति दी गई है। इसमें कोई शक नहीं है कि धार्मिक समुदायों के अपने अलग कानून हो सकते हैं पर पर्सनल लॉ को संवैधानिक वैधता और नैतिकता पर खरा उतरना चाहिए। ये संविधान की धारा 14, 15 और 21 का उल्लंघन नहीं कर सकते हैं।

समीना ने याचिका में कहा है कि मुस्लिम विवाह विघटन अधिनियम 1939 के तहत शादी के विघटित होने के नौ आधार दिए गए हैं जिनमें नपुंसकता, शादी की जिम्मेदारियों को नहीं निभा पाना और क्रूरता शामिल है। पर कहीं भी यह नहीं है कि शादी की पूर्व शर्तें क्या हैं। मुस्लिमों के लिए यह जरूरी नहीं है कि दूसरी शादी करने से पहले वह पहली बीबी से अनुमति ले। इस तरह से मुस्लिम पुरुष बहुविवाह के अपराध की जद से पूरी तरह बाहर हैं।

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