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चंद्रयान-2: लगातार टूटती जा रही है 'लैंडर विक्रम' से संपर्क की उम्मीदें, अब बचा है मात्र 1 दिन, जानिए आगे क्या होगा?

संजीवनी टुडे 20-09-2019 22:02:59

बता दे कि , 22 जुलाई को लॉन्‍च किए गए चंद्रयान-2 मिशन के तहत 7 सितंबर को विक्रम लैंडर को चांद की सतह पर लैंड कराया जाना था।


नई दिल्‍ली। भारत के मून मिशन चंद्रयान-2 के तहत चांद पर भेजे गए 'विक्रम लैंडर' से भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के वैज्ञानिकों का संपर्क अभी तक नहीं हो पाया है। इसके साथ ही अब इससे संपर्क की उम्मीदे भी लगभग खत्म हो गई है, अब आज विक्रम लैंडर से संपर्क का अंतिम दिन है। 

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अगर आज इसरो के वैज्ञानिक इसमें सफल नहीं हो पाए तो शायद उससे कभी संपर्क ना हो पाए। इसके पीछे का कारण है कि इसकी मिशन लाइफ महज 14 दिन की थी, जो कि आज खत्‍म हो रही है। बता दे कि , 22 जुलाई को लॉन्‍च किए गए चंद्रयान-2 मिशन के तहत 7 सितंबर को विक्रम लैंडर को चांद की सतह पर लैंड कराया जाना था। लेकिन चांद की सतह से कुछ ऊपर ही उससे संपर्क टूट गया था। 

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7 सितंबर की सुबह हार्ड लैंडिंग के साथ चंद्रमा की सतह पर पहुंचे लैंडर से संपर्क दोबारा साधने की कोशिशों को अब तक कोई कामयाबी नहीं हाथ लगी है। चंद्रमा के एक दिन की अवधि धरती के 14 दिन के बराबर होती है। खगोलशास्त्री के अनुसार सूर्य की रोशनी समाप्ति की ओर है। आज दोपहर बाद पूरी तरह अंधकार में डूब जायेगा चंद्रमा का दक्षिण ध्रुव। 

इसरो ने विक्रम लैंडर की कार्य करने की निर्धारित अवधि पहले 14 दिन तय की थी। अब सारा फोकस ऑर्बिटर पर है। अपने सभी निर्धारित लक्ष्यों को इसरो ऑर्बिटर द्वारा हासिल करेगा। ऑर्बिटर सौ प्रतिशत सही है। ऑर्बिटर में लगे सभी 8 पेलोड पूरी तरह से एक्टिव हैं। वे योजना के अनुसार लगातार काम कर रहे हैं। 

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विक्रम लैंडर की हार्ड लैंडिंग के बाद इसरो ने ये उम्मीद जताई थी कि विक्रम से एक बार फिर से संपर्क साधने के लिए उनके पास 14 दिनों की अवधि है। इन 14 दिनों में इसरो ने थर्मल ऑप्टिकल तस्वीरों के सहारे विक्रम की स्थिति की जानकारों हासिल की। ये पता चला कि लैंडिंग हार्ड हुई है पर इसकी वजह से इसके ढांचे को कोई नुकसान नहीं हुआ है। 

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वैज्ञानिकों ने अपनी उम्मीदों को कायम रखा और लगातार इसरो अपने डीप स्पेस सेन्टर से सिग्नल भेजता रहा। भेजे जाने वाले सिग्नल को ऑर्बिटर ने हर बार रेस्पांड किया पर विक्रम तक सिग्नल पहुंचे जरूर पर उधर से किसी भी तरह की कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। इस क्रम में नासा ने भी विश्व के अलग अलग जगहों पर स्थापित डीप स्पेस सेन्टर से 8 घंटे प्रति स्पेस सेन्टर से 24 घंटे सिग्नल भेजने की प्रक्रिया को अपनाया है। बावजूद इसके इस दिशा में सफलता नही मिल पाई है। 

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