संजीवनी टुडे

भाजपा के पितामह आडवाणी हुए 91 साल के, प्रधानमंत्री ने देश के विकास में उनके योगदान को सराहा

संजीवनी टुडे 08-11-2018 19:50:00


नई दिल्ली। ‘भीष्म पितामह’ केवल परिवार (भाजपा ) व उसकी सत्ता की रक्षा के लिए होता है। उसकी रक्षा , उसको आगे बढ़ाने, बचाने में अपना सर्वस्व खपा देने, मृत्यु शैया वरण कर लेने के लिए होता है। सत्ताशीर्ष पद पाने, राजा बनने के लिए नहीं। आज की तारीख में भारतीय राजनीति के सबसे बड़े पुरोधा लाल कृष्ण आडवाणी की स्थिति भी महाभारत काल के भीष्म पितामह वाली ही है। 

आठ नवम्बर, 1927 को सिंधी हिन्दू परिवार में कराची (अब पाकिस्तान में) जन्मे आडवाणी आज 91 साल के हो गए। उनको जन्मदिन की बधाई देते हुए केन्द्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भारतीय राजनीति का पितामह कहा। उन्होंने कहा, “आडवाणी जी ने भाजपा को शुरू से सींचा है। वह पार्टी के करोड़ों कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणास्रोत हैं। ईश्वर उन्हें अच्छी सेहत और लंबी आयु प्रदान करें।’’

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उनके बारे में टि्वटर पर लिखा, ‘‘भारत के विकास में आडवाणी जी का योगदान बहुत बड़ा है। मंत्री के तौर पर उनके कार्यकाल की प्रशंसा भविष्योन्मुखी निर्णय लेने और जनपक्षधर नीतियों के लिए की जाती है। उनकी विद्वता की प्रशंसा सभी राजनीतिज्ञ करते हैं।’’ 

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने ट्वीट किया, ‘‘जनसंघ से भाजपा तक हमारी विचारधारा को जन-जन तक पहुंचाने और संसद में एक कुशल राजनेता के तौर पर भारत को प्रगति पथ पर ले जाने में, भारतीय राजनीति में आडवाणी जी का योगदान अतुलनीय है।’’ 

जब प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी, गृह मंत्री राजनाथ सिंह, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह तीनों ही लालकृष्ण आडवाणी को भारतीय राजनीति का इतना बड़ कद्दावर नेता मानते हैं, यह भी स्वीकार करते हैं कि भाजपा आज जिस शिखर पर है, उसमें आडवाणी का योगदान अतुलनीय है, भारतीय राजनीति में आडवाणी का योगदान अतुलनीय है, तब सवाल यह उठता है कि ऐसे आडवाणी को इस देश का राष्ट्रपति क्यों नहीं बनाया गया? क्या जिनको राष्ट्रपति बनाया गया, उनका योगदान संघ के कार्यों में, इस देश की राजनीति या जनसंघ या भाजपा की राजनीति में इस लालकृष्ण आडवाणी के योगदान से बहुत अधिक रहा है?

इस बारे में ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ समूह के गुजराती अखबार “समकालीन” के संपादक रहे, गुजरात एनआरआई बोर्ड के अध्यक्ष रहे और आडवाणी, मोदी तथा अमित शाह को अच्छे से जानने वाले गुजरात के वरिष्ठ पत्रकार डा. हरि देसाई का कहना है कि मोदी को जब तक आडवाणी के संरक्षण की जरूरत थी तब तक आडवाणी उनके लिए सब कुछ रहे। गुजरात दंगे के बाद जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी खुद नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री पद से हटाने के लिए अड़े हुए थे, तब आडवाणी ने जिद करके मोदी को बचाया था, उनका मुख्यमंत्री पद बचाया था। 

उसके 10 वर्ष बाद जब मोदी प्रधानमंत्री पद के लिए आगे आये, उनका नाम आया, जिसका आडवाणी ने विरोध किया, तबसे आडवाणी उनकी आंख की किरकिरी बन गये। मोदी की आंख की जब कोई किरकिरी बन जाता है और यदि वह उनसे पावरफुल नहीं है तो वह उसको किनारे लगाकर ही छोड़ते हैं। यही वजह है कि आडवाणी जी को राष्ट्रपति नहीं बनाया गया। अब जन्म दिन आदि अवसरों पर उनको प्रणाम करके, उनके बारे में अच्छी - अच्छी बातें ट्वीट करके उन्हें महान बताया जा रहा है। सभी दलों के नेता चाहे वे कांग्रेस, तृणमूल, सपा, तेदेपा, राकांपा और शिवसेना के नेता हों या अन्य दलों के या भाजपा के ही बहुत से नेता या कार्यकर्ता, कहते हैं कि आज की तारीख में भारतीय राजनीति, विशेषकर भाजपा में एक व्यक्ति जो हर तरह से बड़ा नेता है तो वह हैं लालकृष्ण आडवाणी । राष्ट्रपति पद के लिए वह सर्वोत्तम व्यक्ति साबित होते। उनको वह पद दिया गया होता तो पद की गरिमा बढ़ती। 

फिलहाल भारतीय राजनीति व जनसंघ तथा भाजपा की राजनीति के ऐसे ‘भीष्म पितामह’ को संभवतः पार्टी, सत्ता व भाजपा परिवार को संरक्षण देते हुए भीष्म की ही तरह ही खप जाना है। जो भी हो, आज की राजनीति में लगता है कि अटल बिहारी वाजपेई कितने बड़े मन के थे, लालकृष्ण आडवाणी कितने बड़े मन के रहे हैं। कितने बड़े लोग। वैसे भी भारत की संस्कृति और परंपरा में 80 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्ति को देवता माना गया है। जिसने आडवाणी को राष्ट्रपति नहीं बनाया, उनके लिए वह भले ही नहीं हों लेकिन आज भी भाजपा के बहुत से कार्यकर्ताओं के लिए वह ‘देवता’ हैं। तमाम मतभेदों के बावजूद ऐसे व्यक्ति के लिए हर कोई ईश्वर से स्वास्थ्य व दीर्घायु की प्रार्थना करता है, मैं भी करता हूं। 

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