संजीवनी टुडे

लोकतंत्र की हिफाजत और तानाशाही के खिलाफ फिर से सुनाई दी जेपी आंदोलन की गूंज

संजीवनी टुडे 26-06-2019 21:22:12

जेपी आंदोलन की गूंज एक बार फिर से बुधवार को पटना के ए.एन. सिन्हा सामाजिक अध्ययन संस्थान में सुनाई दी।


पटना। जेपी आंदोलन की गूंज एक बार फिर से बुधवार को पटना के ए.एन. सिन्हा सामाजिक अध्ययन संस्थान में सुनाई दी। मौका था लोकनायक जय प्रकाश सामाजिक परिवर्तन संस्थान द्वारा आयोजित 'राष्ट्रीय संगोष्ठी आपातकाल: एक काला अध्याय' में  जेपी सेनानियों के जुटान का। इसमें जेपी आंदोलन से जुड़े देशभर से आये जेपी सेनानियों ने अपने खास तेवर के साथ शिरकत की। 24 जून 1975 को दिल्ली के रामलीला मैदान में जेपी की सभा थी और 25 जून को उनकी गिरफ्तारी हुई थी और रात को 12 बजे तक पूरे देश में इमरजेंसी लागू कर दी गई थी।  इसके साथ ही 26 जून 1975 से पूरे देश में भूचाल आ गया था। 

लोकशाही की हिफाजत और इंदिरा गांधी की दमनकारी मनोवृति के खिलाफ जेपी के आदर्शों  को आत्मसात करते हुये लोग बड़े पैमाने पर कांग्रेसी हुकूमत से दो -दो हाथ करने के लिए तैयार हो गये थे। राज्यसभा सदास्य  और भाजपा के वरिष्ठ नेता रवींद्र किशोर सिन्हा की अगुआयी में इस एलान के साथ कि आज के दिन वह सिर्फ और सिर्फ लोकनायक जय प्रकाश के सिपाही हैं इस संगोष्ठी की शुरुआत बिहार के पूर्व मंत्री नरेंद्र सिंह की अध्यक्षता में हुई। इसके बाद एक- एक करके जेपी आंदोलन के साथ मजबूती से जुड़े तमाम योद्धा अपने अनुभवों को साझा करते गये।पटना विश्वविद्यालय के प्रो. रमाकांत पांडे ने गिरफ्तारी के बाद लोकनायक जयप्रकाश को 21 दिन तक चंडीगढ़ की  जेल में रखा गया था। जेल जाने से पहले वह पूरी तरह से स्वस्थ्य थे। 21 दिन में जेल के अंदर उनके साथ ऐसा क्या हुआ कि उनकी किडनी खराब हो गई। 

इसकी जांच करने की जरुरत है। उन्होंने कहा कि दिल्ली के रामलीला मैदान में 24 जून 1975 की सभा के बाद वह गांधी शांति प्रतिष्ठान में विश्राम कर रहे थे। उनको उसी रोज गिरफ्तार कर लिया गया था। उन्होंने कहा कि जेपी से संबंधित इन  सारी बातों की जांच करने की जरुरत है ताकि सारी सच्चाई सामने आ सके। उन्होंने दावा किया कि गिरफ्तारी पहले  हुई थी, इमरजेंसी बाद में लागू की  गयी थी । दिल्ली से  इस संगोष्ठी में खास तौर से शिरकत करने पटना  आये जेपी आंदोलन के सेनानी देवदास आप्टे ने कहा कि आंदोलन के दौरान जेल के अंदर तो क्रांतिकारी बंद थे ही, बड़ी संख्या में जेल के बाहर भी क्रांतिकारी भूमिगत होकर काम कर रहे थे। जब उन्हें पता चला कि जेल में बंद उनके साथियों को यातनाएं दी जा रही हैं और  धीरे-धीरे उनका मनोबल टूट रहा तो उन्हें प्रोत्साहित करने और उनका मनोबल बनाये  रखने के लिए भूमिगत होकर काम कर रहे कुछ जेपी सेनानियों को जानबूझ कर गिरफ्तार करवा कर जेल के अंदर भेजा गया। 

जेल के अंदर उनका काम पहले से बंद सेनानियों की हौसला अफजाई करना था। उन्होंने बताया कि 1971 से लेकर 1977 तक वह खुद 6 बार जेल जा चुके  थे। जेपी आंदोलन के दौरान भागलपुर जेल में उनके  बैरक में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी बंद थे। उन्होंने बताया कि बाद में उनकी एक तस्वीर जेपी के साथ ली गयी थी जो आज भी उनके घर में लगी हुई है। लेकिन उन्हें दुख इस बात का है कि नई पीढ़ी जेपी को नहीं पहचान पा रही है। जेपी के साथ उनकी तस्वीर  देखकर बच्चे उनसे सवाल करते हैं कि यह कौन है? उन्होंने कहा कि जेपी के बारे में नई पीढ़ी को बताने की जरुरत है। लोगों को संबोधित करने के दौरान उन्होंने जेपी आंदोलन से जुड़े कुछ रोचक किस्से भी बताये। इनमें पंडित प्रभाकर शर्मा का किस्सा काफी मजेदार था जिन्हें बिना वारंट के ही गिरफ्तार  कर लिया गया था फिर एक दिन अचानक जेल के बाहर उन्हें पान खिलाने के बहाने से जेलर साहब ले गये और वहीं छोड़ कर जेल का फाटक बंद कर लिया। पंडित प्रभाकर शर्मा कहा करते थे जितना बेइज्जत होकर वह जेल से बाहर हुये थे उतना उतना बेइज्जत कोई नहीं हुआ था।उत्तर प्रदेश के विंध्यवासिनी कुमार ने कहा कि जेपी सेनानियों को तरह- तरह से प्रताड़ित  किया जा रहा था। उनके पिता जी को नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया था। जेपी ने व्यक्तिवाद के बजाये सिद्धांत की राजनीति पर बल दिया था। जो सवाल जेपी ने कई दशक पहले उठाये थे वे आज भी प्रासांगिक हैं।

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