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करीब 6000 साल पहले हड़प्पा युग में भी थी, स्‍वच्‍छता की जागरूकता

संजीवनी टुडे 25-02-2018 20:00:28

Source: Google


फतेहाबाद। करीब 6000 साल पहले हड़प्पाकालीन सभ्यता में भी स्‍वच्‍छता के प्रति आज जैसी ही जागरूकता थी। उस समय कच्‍ची मिट्टी से ही सही लेकिन सुंदर फ्लोरिंग हाेत थी। उस जमाने में लोग स्वच्छता के लिए मिट्टी की शानदार फर्श भी बनाते थे। भारत में स्‍वच्‍छता अभियान जोर-शोर से चलाया जा रहा है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसकी अलख जगाई है। लेकिन, हमारे समाज में स्‍वच्‍छता की ललक हड़प्‍पा काल से रही है। आधुनिक युग है तो मार्बल आदि बिछाकर घरों में शानदार फर्श के जरिये स्वच्छ रहने की शान भी दिखाते हैं। स्वच्छता के प्र‍ति संवेदना और ललक हमारे समाज में हजारों साल पुरानी है। 

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आपको बता दें कि इस हकीकत के प्रमाण हड़प्पाकालीन पुरातात्विक स्थल कुनाल की आठवीं बार हो रही खोदाई के दौरान मिले हैं। राज्य पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग की देखरेख में चल रही खोदाई में रैम्ड फलोर अर्थात दबी हुई फर्श उभरकर सामने आई है। किसी चबूतरे की मानिंद दिखती है। हालांकि अभी यह फर्श संपूर्ण आकार के साथ सामने नहीं आई है। लेकिन मेन माउंट से थोड़ी-सी दूरी पर निकली फर्श उस युग में भी स्वच्छता के प्रति लोगों की संवेदनाओं को दर्शता है।

सच तो यह है कि कुनाल में पिछले अठारह दिनों की खोदाई में मिले पुरातात्विक अवशेष हड़प्पाकालीन सभ्यता से जुड़े अनेक तथ्यों को प्रामाणिकता देते हैं। यहां एकबार फिर यह सच्चाई सामने आई है कि करीब 6000 साल पहले लोग गड्ढे बनाकर रहते थे। यहां कच्ची मिट्टी की ईंट की दीवार मिली हैं तो गड्ढ़े में स्टोरेज बनाने के साक्ष्य भी। शानदार पॉटरी के साथ-साथ खोदाई में मोती-मनकों का मिलना जारी है। परत-दर-परत हड़प्पाकालीन सभ्यता के राज खुल रहे हैं और कुनाल फिर से हजारों वर्ष पुरानी भारतीय सभ्यता व संस्कृति का गवाह बन रहा है।

इस बार उत्खनन के दौरान कॉपर रिंग अर्थात तांबे की अंगूठी मिली है। एक आकलन के अनुसार रिंग काफी कीमती रही होगी। अंगूठी के अतिरिक्त मोती-मनके भी मिल रहे हैं। बताया गया है कि कार्नेलियन, लेपिस लेजुली, एगेट जैसे महंगे स्टोन भी मिले हैं। ये मोती-मनके और पत्थर हड़प्पाकालीन सभ्यता के दौरान आभूषणों के वृहद व्यापार के संकेत देते हैं।

गांव कुनाल में शुरू की गई खोदाई के कार्य में प्री-हड़प्पाकालीन सभ्यता के अवशेष मिले हैं जो 6000 साल पूर्व के हैं। खोदाई के दौरान टीम को आभूषण, मणके, हड्डियों के मोती मिले हैं। वर्ष 1994 में यहां 24 कैरेट सोने के हार व चांदी के मुकुट भी मिले थे। यहां पर आभूषण पिघालने की भट्ठी भी मिली थी, जिससे यह स्पष्ट लग रहा है कि लोग आभूषण ढालने का काम किसी भट्ठी द्वारा करते थे।

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राज्य पुरातत्व एवं म्युजियम विभाग की उपनिदेशक डॉ. बनानी भट्टाचार्य बताती हैं कि यहां इस बार खोदाई के दौरान भी काफी अच्छी पॉटरीज मिली हैं। सिरैमिक्स पर की गई पेंटिंग भी उन दिनों की कला-संस्कृति से रूबरू कराती हैं।

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विभागीय अधिकारियों के अनुसार, कच्ची मिट्टी के जरिये करीने से फर्श बनाने की हड़प्पायुगीन प्राचीन परंपरा इक्कीसवीं सदी में भी स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत की परिकल्पना को आधार देती है।

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