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कमर्शियल माइनिंग को लेकर हड़ताल समाप्त, 3 दिनों में करोड़ों रुपये की क्षति

संजीवनी टुडे 04-07-2020 21:56:05

कमर्शियल माइनिंग के खिलाफ देशव्यापी कोयला मजदूर यूनियन की जिले की राजमहल परियोजना में जारी तीन दिवसीय की हड़ताल शनिवार को समाप्त हो गई।


गोड्डा। कमर्शियल माइनिंग के खिलाफ देशव्यापी कोयला मजदूर यूनियन की जिले की राजमहल परियोजना में जारी तीन दिवसीय की हड़ताल शनिवार को समाप्त हो गई। तीन दिन के हड़ताल से कोल इंडिया को लगभग 320 करोड़ के रॉयल्टी का नुक़सान होने की संभावना जताई गई है। इसमें 60 करोडों का नुकसान झारखंड प्रदेश को होने वाला है। 

दरअसल ईसीएल में राजमहल परियोजना एक बड़ी परियोजना है, जहां पूरे ईसीएल का 40 फीसदी से ज्यादा कोयले का उत्पादन होता है। परियोजना बंद होने से भारी नुकसान होने की संभावना जताई गई है, जिस वजह से जिले को होने वाला राजस्व नुकसान भी बड़ा है। डीएमएफटी, खनन राजस्व, जीएसटी के अलावे अन्य प्रकार के राजस्व की क्षति भी 3 दिनों में करोड़ों रुपये की हुई है।

ज्ञात हो कि जिले में कोल प्रोडक्शन का एक तिहाई रॉयल्टी जिले के विकास के लिए दिया जाता है। हड़ताल की वजह से जिले में विकास कार्यों को भी काफी धक्का लगा है। कोयला श्रमिकों यूनियन का हड़ताल तीसरे दिन प्रथम पाली में भी असरदार रहा जबकि द्वितीय पाली में अधिकांश निजी कंपनियों में काम काज शुरू हो गया। तीसरे दिन राजमहल परियोजना से होने वाला कोयला डिस्पैच पूरी तरह से बाधित रहा। इस संबंध में श्रमिक संगठनों ने एक स्वर में कहा है कि जब तक केंद्र सरकार कमर्शियल माइनिंग के लिए बनाई गई रूपरेखा को वापस नहीं लेता है, तब तक ये संघर्ष जारी रहेगा। 

यूनियन के नेताओं में मिस्त्री मरांडी, डॉ राधेश्याम चौधरी एवं प्रदीप पंडित ने कहा कि केंद्र सरकार कमर्शियल माइनिंग के जरिए पूरे कोल सेक्टर पर पूंजीपतियों का कब्जा जमाना चाहती है। इससे मजदूरों और उस क्षेत्र में काम करने वाले लोगों को भारी नुकसान होना तय है। यह नुकसान झेलने के लिए यूनियन तैयार नहीं है। श्रमिक नेताओं ने कहा कि आज भी कोल इंडिया नवरत्नों में शामिल है। यह लगातार भारत सरकार को मुनाफा ही देती रही है। यही कारण है कि पूंजी पतियों की नजर अब कोल इंडिया के मुनाफे पर है। पब्लिक सेक्टर की कंपनी होने से इसके होने वाले फायदे का लाभ आम लोगों को होता है तथा विकास कार्यों को भी नई दिशा मिलती है। 

कमर्शियल माइनिंग में जब पूंजीपति शामिल हो जाएंगे, तब यह सारे फायदे सिर्फ पूंजीपतियों को ही होंगे। कोयला उत्पादन के साथ-साथ बिक्री एवं दर निर्धारण पर भी निजी कंपनियों के अधिकार होने से उनके उत्पादन का लागत दर काफी कम होगा जिससे कोल इंडिया की कंपनियां उक्त दर पर प्रतिस्पर्धा में शामिल नहीं हो पाएगी तथा स्वाभाविक रूप से कोल इंडिया का बिक्री दर घटता जाएगा एवं थोड़े ही समय में यह कंपनी घाटे में चली जाएगी तथा इसे बंद करना पड़ेगा। सस्ते मजदूर लेने के कारण निजी कंपनियों की लागत काफी कम पड़ती है जबकि कोल इंडिया में काम करने वाले लोगों की बेहतर सैलरी एवं सुविधा कंपनी प्रदान करती है। बेहतर आय उपलब्ध कराने से उनके संतान भी देश हित में बेहतर कार्य के लिए तैयार हो सकते हैं पर निजी कंपनियों के कामगारों का सर्वथा दोहन ही होता रहेगा तथा बेहतर शिक्षा दीक्षा के लिए उनके पास राशि का अभाव बना रहेगा। 

इन्हीं बातों को लेकर श्रम संगठन भी आउटसोर्सिंग कंपनियों के कामगारों को बेहतर सैलरी देने की मांग करती रही है। इधर शनिवार को हड़ताल के अंतिम दिन भी परियोजना के अंतर्गत मुख्य कार्यशाला में तमाम बड़े डंपर एवं अन्य मशीन यार्ड में खड़े रहे तथा ज्यादातर मशीनें काम पर नहीं लगाई गई। इस हड़ताल में परियोजना एवं निजी आउटसोर्सिंग कंपनियों के तकरीबन तीन हजार कामगार शामिल हुए। उन सभी ने एक स्वर में कमर्शियल माइनिंग का विरोध किया तथा काम पर 2 दिन नहीं आए हालांकि उनकी उपस्थिति संबंधित कार्यालय में दर्ज करा दी गई। 

इधर इस तीन दिवसीय हड़ताल को लेकर ईसीएल के अध्यक्ष सह प्रबंध निदेशक प्रेम सागर मिश्रा ने एक अपील जारी कर कामगारों को हड़ताल पर नहीं जाने का आग्रह किया था। इसकी वजह से कुछ लोग काम पर वापस भी लौटे हैं। उन्होंने कामगारों को यह भरोसा दिलाया कि कमर्शियल माइनिंग सरकार का एक नीतिगत निर्णय है जिसमें में ईसीएल की एक भी खदान नहीं जाएगी। ना ही उन्हें कोई नुकसान होने वाला है। इस वजह से देशवासियों के हित में वह अपने काम पर लौटे जाएं पर उनके अपील का राजमहल परियोजना पर कोई खास असर नहीं पड़ा तथा अधिकांश श्रमिक हड़ताल पर डटे रहे। इस हड़ताल से राजमहल परियोजना को करीब दस करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है वही साथ साथ जिला के राजस्व की क्षति भी हुई है।

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