संजीवनी टुडे

जो कभी चिमनियों का शहर था वह बन गया है अब औद्योगिक कब्रिस्तान

संजीवनी टुडे 14-07-2020 08:03:43

जो कभी चिमनियों का शहर था वह बन गया है अब औद्योगिक कब्रिस्तान


रतलाम। कभी चिमनियों का शहर हुआ करता था, जहां सौ से अधिक छोटे बड़े उद्योग हुआ करते थे। न राजनैतिक दावपेंच था न एक दूसरे को नीचा दिखाकर श्रेय लेने की होड़ थी । यही कारण था कि सज्जन मिल में बना कपडा विदेश जाता था। स्ट्रा बोर्ड, माडेला, परफेक्ट पाटरीज, जयन्त विटामिन्स, इत्र बनाने वाली कंपनियां थी, जिनिंग फैक्ट्री, बोरदिया केमिकल्स, अल्कोहल प्लांट, जैसे कारखाने थे जिनमें हजारों लोग रोजगार पाते थे। चिमनियों का निकलने वाला धुंआ एक अलग ही सकुन देता था। समय का ऐसा थपेड़ा आया, ऐसी राजनैतिक चैतना आई जिसने तेरा -मेरा सिखा दिया और चिमनियों से धुआं निकलना बंद हो गया। लोग हो गए बेरोजगार, रतलाम बन गया औद्योगिक कब्रिस्तान। बंद कारखानों में कालोनियां कट गई। मशीनें भंगार में बदल गई।

सज्जन मिल की शेष बची 52 बीघा जमीन और कारखाना खंडहर हो गया। वैध- अवैध गोदाम बन गए। मिल की क्या स्थिति है, किसी कर्णधार ने झांक कर नही देखा। केवल.दुधारू गाय के रुप में अभी भी इसे नोचने की प्रक्रिया ही चल रही है। मिल की चिमनी जो सहारों पर टिकी थी उसके सहारे भी साथ छोड़ रहे है । यह चिमनी जो कभी रतलाम की पहचान थी ,कभी भी हवां के झोंको में धराशयी हो सकती है। अचानक एक दिन मेरे दिमाग में आया की शान से  खड़ी चिमनी को देखा जाय तो उसकी दुर्दशा देखी नही गई । 

चित्र लिया जो शहरवासियों को दिखाया जा सके। कभी हम शहर के लिए जीते थे तब शहर का नाम पुरे देश में था। कवि प्राण गुप्ता ने अपनी कविता में इसका उल्लेख भी किया था । तब हमारा सर गर्व से ऊचां हो जाता था, लेकिन आज इस शहर की दुर्दशा को देखकर लगता है कि चिमनियों का शहर कहा जाने वाला यह औद्योगिक नगर शनै-शनै औद्योगिक कब्रिस्तान में बदल गया। आज नाम मात्र के उद्योग है, जिनमें श्रमिकों का शोषण हो रहा है, फिर भी वह शहर के बेरोजगारों को रोजगार तो दे रहे है, यहीं संतोष शहरवासियों को है। 

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