संजीवनी टुडे

वीरांगना के अभिशाप के चलते डूब गई ज्योतिरादित्य की लोकसभा सीट!

संजीवनी टुडे 25-05-2019 15:49:50


झांसी। लोकसभा चुनाव का परिणाम जहां मोदी लहर के चलते भाजपा की प्रचण्ड जीत के लिहाज से अहम रहा। वहीं यह कई दिग्गज नेताओं की हार के लिहाज से भी याद रखा जायेगा। ग्वालियर के सियासी घराने के महाराज ज्योतिरादित्य सिंधिया की हार इन्हीं में से एक है, जिसको लेकर वीरांगना लक्ष्मी बाई की भूमि झांसी में बेहद चर्चा है। 

ज्योतिरादित्य को अपने ही सियासी गढ़ गुना-शिवपुरी लोकसभा में करारी शिकस्त मिली है। ग्वालियर के महल की यह इस पीढ़ी की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक घटना है। इसको लेकर झांसी में चर्चा आम है कि वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई की भूमि पर कदम रखने के चलते महाराज का यह हाल हुआ है। लोगों का तो यहां तक कहना है कि वीरांगना की पावन भूमि का अभिशाप महाराज की जीत को निगल गया।

दरअसल लोकसभा चुनाव का शंखनाद होने के ठीक पहले पहली बार ज्योतिरादित्य सिंधिया ने वीरांगना भूमि झांसी में कदम रखा था। कुछ देर सर्किट हाउस में आराम करते हुए पार्टी पदाधिकारियों से बैठक भी की थी। इसके बाद वह वापस चले गये थे। इस बीच उन्हें नगर के चर्चित चौराहे इलाईट पर गद्दार सिंधिया वापस जाओं के नारों से दो-चार होना पड़ा था। लोकसभा चुनाव में करारी शिकस्त को कुछ लोग उनके झांसी आगमन से जोड़ रहे हैं। इनका मानना है कि सिंधिया का चुनाव के ठीक पहले वीरांगना की पवित्र भूमि पर आना ही हार का कारण बना। 

ज्योतिरादित्य सिंधिया की हार का कारण वीरांगना की भूमि पर कदम रखने की बात पर नवनिर्वाचित सांसद अनुराग शर्मा ने हिन्दुस्थान समाचार से बातचीत में पहले तो कुछ भी कहने से मना कर दिया। बाद में उन्होंने मुस्कराते हुए इतना कहा कि झांसी वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई की पावन धरा है। गद्दार इससे दूर रहें।

वहीं वरिष्ठ कांग्रेसी नेता अनिल झा इस सम्बन्ध में कहते हैं कि लोगों की इन चर्चाओं में कुछ खास दम नहीं है। लोकतंत्र में जनता स्वयं अपना मत देती है। किसी के कहीं आने-जाने से हार-जीत नहीं होती। यह महज एक अंधविश्वास है, क्योंकि इससे पहले भी ज्योतिरादित्य सिंधिया के पिता माधवराव सिंधिया स्वर्गीय शंकर लाल मल्होत्रा के घर आ चुके हैं। वहीं ज्योतिरादित्य भी कई बार झांसी आ चुके हैं और वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई के पार्क में जाकर उनकी प्रतिमा के सामने पुष्प भी अर्पित कर चुके हैं। वहीं वरिष्ठ पत्रकार रामसेवक अड़जरिया का कहना है कि जनसंघ के समय में राजमाता सिंधिया ने तो झांसी समेत ग्रामीण अंचलों में बैठकें की हैं। 

इस संबंध में हिन्दू युवा वाहिनी के बुन्देलखण्ड प्रभारी योगी सेवक अरविन्द वर्मा कहते हैं कि ग्वालियर के महाराज ने महारानी लक्ष्मीबाई को सहयोग का आश्वासन देकर बुलाया था। उसके बाद उन्होंने गद्दारी करते हुए उन्हें अंग्रेजी सेना से घिरवा दिया। कहते हैं इतिहास अपने आप को दोहराता है। आज उनके वंशज ज्योतिरादित्य सिंधिया को उन्हीं के विश्वासपात्र रहे केपी यादव ने लोकसभा चुनाव में करारी मात देकर उसका जबाब दे दिया है। 

वहीं उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महासचिव भानु सहाय इसे लोकसभा चुनाव के दौरान रिलीज हुई मणिकर्णिका फिल्म से जोड़ते हैं। उन्होंने बताया कि चुनाव के समय ही वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई की शौर्य गाथा को प्रस्तुत करते हुए एक फिल्म रिलीज हुई थी मणिकर्णिका। इस फिल्म ने उन लोगों को भी इतिहास से परिचित कराया जो इतिहास के बारे में जानते ही नहीं थे। फिल्म में ग्वालियर के महाराजा के क्रिया कलापों को देखते हुए लोगों ने अपने मत का प्रयोग किया और यह स्थिति सामने आई। 

बुन्देलखण्ड क्रांतिदल के राष्ट्रीय अध्यक्ष सत्येन्द्र पाल सिंह का मानना है कि ज्यातिरादित्य ही नहीं बल्कि पूरे परिवार में किसी को भी जीत नहीं मिलनी चाहिए। उनका कहना है कि पूरा ग्वालियर महल ऐसा राजपरिवार है जो अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए अंग्रेजों का सहयोग करता रहा और देश के साथ गद्दारी की। उन्होंने बताया कि वीरांगना महारानी को घिरवाने से लेकर 15 अगस्त 1947 में तिरंगा न फहराने जैसे उनके कारनामे हैं। अपनी करनी का फल उन्हें मिलना ही चाहिए। 

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क्या कहता है वर्षों पुराना ग्वालियर की बड़ी शाला का इतिहास


ग्वालियर में बड़ी शाला के नाम से एक प्रसिद्ध आश्रम है। ऐसा बताया जाता है कि वहां के तत्कालीन महंत गंगा दास जी ने वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई का घायल अवस्था में सहयोग किया था। शौर्य की प्रतिरूप महारानी ने अपनी अन्तिम सांस वहीं ली थी। इसके बाद उनके शव को ले जाने के लिए अंग्रेजों ने बड़ी शाला को घेर लिया था। तब करीब 1200 नागा साधुओं ने अपने देश के सम्मान को बचाने के लिए अंग्रेजों से युद्ध किया था। इस युद्ध में 745 नागा साधुओं को बलिदान देना पड़ा था। उसी दौरान महंत गंगादास जी ने अपनी कुटिया में आग लगाते हुए उसे महारानी की अन्तिम संस्कार शाला बना दिया था। तब से इस आश्रम के संत आज तक सिंधिया के ग्वालियर महल को गद्दार मानते आ रहे हैं। 

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