संजीवनी टुडे

जाने नवग्रह के सबसे बलवान शनि के जन्‍म की गाथा

संजीवनी टुडे 23-03-2019 13:23:14


डेस्क। अपने जीवन में शनि ग्रह का बेहद महत्व होता है। श्री शनि देव जिन्हें छाया सुत भी कहा गया है शनि को सौर जगत के नौ ग्रहों में से सातवां ग्रह माना जाता है। शनि सदैव मार्गी नहीं रहते हैं। समय-समय पर मार्गी तथा वक्री होते रहते हैं। शनि की स्वराशियाँ मकर तथा कुंभ हैं। ये तुला राशि में 20 अंश परम उच्चस्थ, मेष राशि के 20 अंश तक परमनीचस्थ तथा कुंभ राशि के 20 अंश तक मूल त्रिकोणस्थ माने जाते हैं। ये फलित ज्योतिष में अशुभ ग्रह भी माना जाता है। शनि को काल पुरुष का दुःख माना गया है, यह कृष्णवर्णी कृशाड्गी सुनयना, वृद्धावस्था वाले नपुंसक लिंगी, शुद्ध जातीय, रूक्ष केश एवं मोटे दाँत व नखयुक्त दुर्ग आकृति वाले द्विपादी के रूप में ज्योतिर्विदों द्वारा चित्रांकित किए गए हैं। ग्रहमंडल में इन्हें सेवक का पद प्राप्त है। यदि खगोल शास्त्र की दृष्‍टि से देखें तो आधुनिक अध्‍ययन के अनुसार शनि की धरती से दुरी लगभग नौ करोड़ मील है। इसका व्यास एक अरब बयालीस करोड़ साठ लाख किलोमीटर और इसकी गुरुत्व शक्ति धरती से पंचानवे गुना अधिक है। 

शनि की जन्‍म कथा

श्री शनैश्वर देवस्थान के अनुसार शनिदेव की जन्म गाथा या उत्पति के संदर्भ में कई मान्‍यतायें हैं। सूर्यदेव की द्वितीय पत्नी छाया के गर्भ में शनि का जन्म हुआ माना जाता है। इन्हें एक राशि पर भ्रमण करने में लगभग 30 मास तथा राशि चक्र का पूर्ण भ्रमण करने में 30 वर्ष लगते हैं। इनमें सबसे अधिक प्रचलित गाथा स्कंध पुराण के काशीखण्ड में दी गई है। इसके अनुसार सूर्यदेवता का ब्याह दक्ष कन्या संज्ञा के साथ हुआ। वे सूर्य का तेज सह नहीं पाती थी। तब उन्‍होंने विचार किया कि तपस्या करके वे भी अपने तेज को बढ़ा लें या तपोबल से सूर्य की प्रचंडता को घटा दें। सूर्य के द्वारा संज्ञा ने तीन संतानों को जन्म दिया, वैवस्वत मनु, यमराज, और यमुना। संज्ञा बच्चों से भी बहुत प्यार करती थी। एक दिन संज्ञा ने सोचा कि सूर्य से अलग होकर वे अपने मायके जाकर घोर तपस्या करेंगी और यदि विरोध हुआ तो कही दूर एकान्त में जाकर अपना कर्म करेंगी। इसके लिए उन्‍होंने तपोबल से अपने ही जैसी दिखने वाली छाया को जन्म दिया, जिसका नाम ' सुवर्णा ' रखा। उसे अपने बच्चोँ की जिम्मेदारी सौंपते हुए कहा कि आज से तुम नारी धर्म मेरे स्थान पर निभाओगी और बच्चों का पालन भी करोगी। कोई आपत्ति आ जाये तो मुझे बुला लेना, मगर एक बात याद रखना कि तुम छाया हो संज्ञा नहीं यह भेद कभी किसी को पता नहीं चलना चाहिए। इसके बाद वे अपने पीहरचली गयीं। जब पिता ने सुना कि सूर्य का ताप तेज सहन ना कर सकने के कारण वे पति से बिना कुछ कहे मायके आयी हैं तो वे बहुत नाराज हुए और वापस जाने को कहा। इस पर संज्ञा घोडी के रूप में घोर जंगल में तप करने लगीं। 

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नक्षत्र-पुष्य अनुराधा एवं उत्तराभाद्रपद नक्षत्रों के निम्न चरण, जिनके स्वामी शनि हैं, कृतिका, आर्द्रा, अश्लेषा, उत्तराफाल्गुन, स्वाति, ज्येष्ठा, उत्तराषाढ़ा, शतभिषा व रेवती इन 9 (नौ) नक्षत्रों के दूसरे व तीसरे चरण के स्वामी शनि ग्रह हैं। कर्क, वृश्चिक एवं मीन इन तीन नक्षत्रों की राशि हैं, जिनके स्वामी शनि ग्रह हैं। वृष, मिथुन, कर्क, कन्या, तुला, वृश्चिक, मकर, कुंभ व मीन क्रम से ये वे राशियाँ हैं जिनके नक्षत्रों के चरणों के स्वामी शनिदेव हैं। 

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