संजीवनी टुडे

बंग भस्म के अचूक फायदे जानकर आप भी हो जायेंगे चकित, जानिए इसके बारे में

संजीवनी टुडे 16-06-2019 10:55:34

बंग भस्म आयुर्वेद में यह बहुत ही प्रचलित औषधि है। यह वे आयुर्वेदिक फॉर्मूलेशन मिश्रण हैं जिनमें पौधे, खनिजों और धातुएं शामिल हैं। यह धातु की हर्बल तैयारी हैं जो लंबे समय तक स्थिर है और कम खुराकमें असर दिखाती हैं। मनुष्य में सेक्स सम्बंधित किसी भी प्रकार की समस्या के लिए बंग भस्म का उपयोग किया जाता है |


डेस्क। बंग भस्म आयुर्वेद में यह बहुत ही प्रचलित औषधि है। यह वे आयुर्वेदिक फॉर्मूलेशन मिश्रण हैं जिनमें पौधे, खनिजों और धातुएं शामिल हैं। यह धातु की हर्बल तैयारी हैं जो लंबे समय तक स्थिर है और कम खुराकमें असर दिखाती हैं। मनुष्य में सेक्स सम्बंधित किसी भी प्रकार की समस्या के लिए बंग भस्म का उपयोग किया जाता है | यह पुरुष की इन्द्रिय को ताकत देती है, शुक्र धारण में सहयोग करती है, वीर्य को गाढ़ा करती है तथा नामर्दी, शीघ्रपतन, पेशाब के साथ शुक्र जाना, स्वप्न में स्खलन, हस्तमैथुन आदि में रोगों को नष्ट करती है। धातु में वृद्धि करने के गुण से इसे धातुक्षीणता, क्षय, खून की कमी, पाण्डु, आदि रोगों में भी देते हैं। कफ को कम करने का गुण इसे कास, श्वास, त्वचा के दोष आदि में देते हैं। तासीर में गर्म होने के कारण बंग भस्म दीपक, पाचक, रूचिकर, है। 

बंग भस्म तैयार करने की विधि : 

बंग को लोहे की कड़ाही में अग्नि पर गलाकर उसमें पलास (ढाकटेसू) के पुष्य मोती की सीप का चूर्ण थोड़ा-थोड़ा डालकर लोहे की कलछी से चलाता जाय। जब सम्पूर्ण बंग का चूर्ण हो जाय तब उसके ऊपर सकरा ढककर तब तक आँच दें जब तक बंग भस्म का वर्ण आग की तरह लाल न हो जाय। स्वांगशीतल होने पर सूप से फटककर पलास के फूलों की राख अलग करके बंग भस्म को कपड़े से छानकर ग्वारपाठे (घीकुमारी) के रस में मर्दन कर छोटी-छोटी टिकियां बनाकर, धूप में सूखाकर, सराब-सम्पुट में बन्द कर गजपुट में फेंक दें। इस तरह सात पुट देने से श्वेतवर्ण की भस्म मिलेगी।

बंग भस्म सेवन विधि : –

सामान्य अवस्था में 1 रत्ती से 2 रत्ती बंग भस्म को मिश्री, मक्खन , मधु या मलाई के साथ लिया जा सकता है या फिर रोग के अनुसार चिकित्सक की सलाह अनुसार ही प्रयोग करना उचित है |

बंग भस्म के लाभ –

-बंग भस्म शरीर को पुष्ट करती है तथा अंगों को ताकत देती है। इसे आयुर्वेद में हल्का, दस्तावर, और गर्म माना गया है। यह मुख्य रूप से मूत्र – प्रजनन अंगों, रक्त और फेफड़ों सम्बंधित रोगों में लाभप्रद है। 

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-स्वप्नदोष, शीघ्रपतन, वीर्यस्त्राव, नपुंसकता, धातुक्षीणता, प्रमेह इन सभी सेक्स से जुड़े रोगों में बंग भस्म प्रयोग करना लाभप्रद माना गया है | इसके साथ-साथ बंग भस्म का प्रयोग कास – स्वास- पांडु रोग- कृमि, मन्दाग्नि और क्षय रोगों में भी किया जाता है |

 यह स्त्रियों के लिए गर्भाशय के रोग, अत्यार्तव और अधिक मासिक जाना, मासिक में दर्द, डिम्ब की कमजोरी,  सुजाक के कारण दूषित शुक्र को संतान उत्पन्न करने योग्य बनाने में भी बंग भस्म उपयोगी है |

-यह इन्द्रिय को सख्ती देती है और वीर्य को गाढ़ा करती है।

-यह वातवाहिनी नसों, मांसपेशियों और इन्द्रिय की कमजोरी को दूर कर शुक्र के अनैच्छिक स्राव को रोकती है।

-मुख्य रूप से बंग भस्म का प्रयोग सेक्स से जुड़ी समस्याओं को ठीक करने में अधिक किया जाता है किन्तु बहुत से चिकित्सक इस भस्म का प्रयोग और भी बहुत से रोगों में करते है | इसलिए बंग भस्म का प्रयोग करने से पहले एक बार चिकित्सक से परामर्श अवश्य ले| 

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