संजीवनी टुडे

नशे की लत से भी खतरनाक हो सकती है मोबाइल गेम्‍स की लत, जानें कैसे छुड़ाएं ये आदत...

संजीवनी टुडे 11-07-2019 10:08:59

बच्‍चे हों या युवा हर कोई मोबाइल लिए गेम्‍स खेलता दिख जाता है। कुछ लोगों को तो ये लत इतनी अधिक होती है कि उन्‍हें पता ही नहीं चलता कि उनके आसपास क्‍या हो रहा है।


डेस्क। आजकल सबसे बड़ी समस्‍या है मोबाइल गेम्‍स की लत। अगर आपका बच्चा भी अक्सर मोबाइल से चिपका रहता है, तो आपको सतर्क होने की जरूरत है। बच्‍चे हों या युवा, हर कोई मोबाइल लिए गेम्‍स खेलता दिख जाता है। कुछ लोगों को तो ये लत इतनी अधिक होती है कि उन्‍हें पता ही नहीं चलता कि उनके आसपास क्‍या हो रहा है। डॉक्टरों के अनुसार आजकल मोबाइल बहुत ज्यादा यूज करने से बच्चों में डिप्रेशन, अनिद्रा व चिड़चिड़ापन जैसी मानिसक समस्याएं बढ़ रही हैं। 

जानकारी के अनुसार आपको बता दें की बच्चों और वयस्कों में इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स के लगातार उपयोग को रोकने के प्रायोगिक तरीके बताते हुए मनोचिकित्सकों ने आगाह किया है कि डिजिटल लत वास्तविक है और यह उतनी ही खतरनाक हो सकती है जितनी की नशे की लत।

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विशेषज्ञों ने कहा कि डिजिटल लत से लड़ने के लिए सबसे जरूरी बात इस लत के बढ़ने पर इसका एहसास करना है।

नई दिल्ली स्थित इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल्स के मनोचिकित्सा विभाग के सीनियर कंसल्टेंट संदीप वोहरा ने कहा, “गैजेट्स के आदी लोग हमेशा गैजेट्स के बारे में सोचते रहते हैं या जब वे इन उपयोगों का उपयोग नहीं करने की कोशिश करते हैं तो उन्हें अनिद्रा या चिड़चिड़ापन होने लगता है। 

उन्होंने बताया की डिजिटल लत किसी भी अन्य लत जितनी खराब है। तो अगर आपको डिजिटल लत है, तो ये संकेत है कि आप अपने दैनिक जीवन से दूर जा रहे हैं। आप हमेशा स्क्रीन पर निर्भर हैं। 

और ये भी कहा की ऐसे लोग व्यक्तिगत स्वच्छता तथा अपनी उपेक्षा तक कर सकते हैं। वे समाज, अपने परिवार से बात करना भी बंद कर देते हैं और अपनी जिम्मेदारियों के बारे में सोचना या अपने नियमित काम करना भी बंद कर देते हैं।

फोर्टिस हेल्थकेयर के मानसिक स्वास्थ्य एवं व्यावहारिक विज्ञान विभाग के निदेशक समीर पारिख ने कहा, कि वयस्कों को प्रति सप्ताह चार घंटों के डिजिटल डिटॉक्स को जरूर अपनाना चाहिए। इस अंतराल में उन्हें अपने फोन या किसी भी डिजिटल गैजेट का उपयोग नहीं करना है।

पारिख ने कहा की लोगों के लिए काम, घर के अंदर जीवन, बाहर के मनोरंजन तथा सामाजिक व्यस्तताओं के बीच संतुलन कायम रखना सबसे महत्वपूर्ण काम है। उन्हें यह सुनिश्चित करना है कि वे पर्याप्त नींद ले रहे हैं, यह बहुत जरूरी है। 

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उन्होंने कहा, “ऐसे लोगों में अवसाद, चिंता, उग्रता, अनिद्रा, चिड़चिड़ापन के साथ-साथ अन्य चीजों पर ध्यान केंद्रित करने में परेशानी भी हो सकती है। 

वोहरा ने सलाह दी कि लोगों को जब लगे कि उनका बच्चा स्क्रीन पर ज्यादा समय बिता रहा है तो उन्हें सबसे पहले अपने बच्चे से बात करनी चाहिए और उन्हें डिजिटल गैजेट्स से संपर्क कम करने के लिए कहना चाहिए

एक वैज्ञानिक अध्यन में पाया गया है जो लोग बार बार नोटिफिकेशन और मैसेज़ पर अपना स्मार्टफोन चेक करते हैं वह अपने दिमाग पर ज्यादा प्रेशर डालते हैं। बार बार स्मार्टफोन चेक करने की आदत से लोगों में कई तरह की बीमारियां भी पनप रहीं हैं।

आजकल सबसे बड़ी समस्‍या है मोबाइल गेम्‍स की लत। अगर आपका बच्चा भी अक्सर मोबाइल से चिपका रहता है, तो आपको सतर्क होने की जरूरत है। बच्‍चे हों या युवा, हर कोई मोबाइल लिए गेम्‍स खेलता दिख जाता है। कुछ लोगों को तो ये लत इतनी अधिक होती है कि उन्‍हें पता ही नहीं चलता कि उनके आसपास क्‍या हो रहा है। डॉक्टरों के अनुसार आजकल मोबाइल बहुत ज्यादा यूज करने से बच्चों में डिप्रेशन, अनिद्रा व चिड़चिड़ापन जैसी मानिसक समस्याएं बढ़ रही हैं। 

जानकारी के अनुसार आपको बता दें की बच्चों और वयस्कों में इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स के लगातार उपयोग को रोकने के प्रायोगिक तरीके बताते हुए मनोचिकित्सकों ने आगाह किया है कि डिजिटल लत वास्तविक है और यह उतनी ही खतरनाक हो सकती है जितनी की नशे की लत।

विशेषज्ञों ने कहा कि डिजिटल लत से लड़ने के लिए सबसे जरूरी बात इस लत के बढ़ने पर इसका एहसास करना है।

नई दिल्ली स्थित इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल्स के मनोचिकित्सा विभाग के सीनियर कंसल्टेंट संदीप वोहरा ने कहा, “गैजेट्स के आदी लोग हमेशा गैजेट्स के बारे में सोचते रहते हैं या जब वे इन उपयोगों का उपयोग नहीं करने की कोशिश करते हैं तो उन्हें अनिद्रा या चिड़चिड़ापन होने लगता है। 

उन्होंने बताया की डिजिटल लत किसी भी अन्य लत जितनी खराब है। तो अगर आपको डिजिटल लत है, तो ये संकेत है कि आप अपने दैनिक जीवन से दूर जा रहे हैं। आप हमेशा स्क्रीन पर निर्भर हैं। 

और ये भी कहा की ऐसे लोग व्यक्तिगत स्वच्छता तथा अपनी उपेक्षा तक कर सकते हैं। वे समाज, अपने परिवार से बात करना भी बंद कर देते हैं और अपनी जिम्मेदारियों के बारे में सोचना या अपने नियमित काम करना भी बंद कर देते हैं।

फोर्टिस हेल्थकेयर के मानसिक स्वास्थ्य एवं व्यावहारिक विज्ञान विभाग के निदेशक समीर पारिख ने कहा, कि वयस्कों को प्रति सप्ताह चार घंटों के डिजिटल डिटॉक्स को जरूर अपनाना चाहिए। इस अंतराल में उन्हें अपने फोन या किसी भी डिजिटल गैजेट का उपयोग नहीं करना है।

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पारिख ने कहा की लोगों के लिए काम, घर के अंदर जीवन, बाहर के मनोरंजन तथा सामाजिक व्यस्तताओं के बीच संतुलन कायम रखना सबसे महत्वपूर्ण काम है। उन्हें यह सुनिश्चित करना है कि वे पर्याप्त नींद ले रहे हैं, यह बहुत जरूरी है। 

उन्होंने कहा, “ऐसे लोगों में अवसाद, चिंता, उग्रता, अनिद्रा, चिड़चिड़ापन के साथ-साथ अन्य चीजों पर ध्यान केंद्रित करने में परेशानी भी हो सकती है। 

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वोहरा ने सलाह दी कि लोगों को जब लगे कि उनका बच्चा स्क्रीन पर ज्यादा समय बिता रहा है तो उन्हें सबसे पहले अपने बच्चे से बात करनी चाहिए और उन्हें डिजिटल गैजेट्स से संपर्क कम करने के लिए कहना चाहिए

एक वैज्ञानिक अध्यन में पाया गया है जो लोग बार बार नोटिफिकेशन और मैसेज़ पर अपना स्मार्टफोन चेक करते हैं वह अपने दिमाग पर ज्यादा प्रेशर डालते हैं। बार बार स्मार्टफोन चेक करने की आदत से लोगों में कई तरह की बीमारियां भी पनप रहीं हैं। 

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