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पांडव कालीन इतिहास को संजोए दुखहरण नाथ मंदिर, जानिए इसके बारे में...

संजीवनी टुडे 20-07-2019 15:12:14

प्राचीनतम इतिहास को संजोए दुखहरण नाथ मंदिर, पर वैसे तो आम दिनों में भी श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।


गोण्डा। प्राचीनतम इतिहास को संजोए दुखहरण नाथ मंदिर, पर वैसे तो आम दिनों में भी श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। लेकिन भगवान शिव को समर्पित पूरे श्रावण मास व कजली तीज पर्व पर प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में श्रद्धालु कर्नलगंज स्थित पवित्र सरयू नदी से नंगे पैर जल भरकर इस मंदिर पर जलाभिषेक करते हैं। पांडव कालीन इतिहास को सजोए इस प्राचीनतम मंदिर को 'पांडेश्वर मंदिर' भी कहा जाता है। 

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सावन मास शुरू होते ही श्रद्धालुओं की अपार भीड़ आने के नाते मंदिर कमेटी के जरिए श्रद्धालुओं को सुगमता से जलाभिषेक कर सके इसके लिए व्यापक बंदोबस्त किया जाता है। इस दौरान शिव भक्तों के जरिए विशेष अनुष्ठान रुद्राभिषेक के साथ-साथ शिवपुराण की कथा का आयोजन व मंदिर पर तरह-तरह के कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। 

जनपद मुख्यालय के बीचो-बीच स्थित दुखहरण नाथ मंदिर का अपना एक पौराणिक इतिहास है। मान्यताओं के अनुसार महाभारत काल में धर्म युद्ध से पहले युधिष्ठिर ने विजय का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए इस शिवलिंग की स्थापना की थी और मंदिर में द्रोपदी संघ पूजा-अर्चना करने आते थे। पांडव के पूजा करने से ही इस मंदिर का नाम पांडेश्वर मंदिर पड़ गया। कहा जाता है कि जब द्रोपदी के साथ युधिष्ठिर भोलेनाथ की पूजा करते थे तो उनके चारों भाई मंदिर के चारों गुंबद पर बैठकर भोले नाथ का ध्यान करते थे। 

श्रावण मास में शिव भक्तों द्वारा प्रतिदिन पांडेश्वर मंदिर पर स्थित शिवलिंग पर पंचामृत दूध, दही, बेलपत्र, भांग, धतूरा और गंगाजल चढ़ाने से भगवान भोलेनाथ प्रसन्न होते हैं और भक्तों के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। इसलिए इस मंदिर को दुखहरण नाथ महादेव मंदिर भी कहा जाता है। मंदिर परिसर स्थित सैकड़ों वर्ष पुराना वटवृक्ष और कुआं आज भी भक्तों के आकर्षण का केंद्र बना है। 

ऐसी मान्यता है कि इस कुआं का जल भीषण तपिश में भी ठंडा रहता है। इतिहासकारों के मुताबिक प्राचीनतम काल में इस मंदिर का निर्माण गोण्डा नरेश देवी बख्श सिंह ने पत्थरों से इसका निर्माण कराया था। पूरे श्रावण मास खासतौर पर सोमवार व शुक्रवार को यहां पर श्रद्धालुओं की अपार भीड़ जुटती है। 

कजली तीज के दिन तो इस मंदिर पर करीब आठ किलोमीटर तक तीन कतारों में प्रशासन द्वारा जलाभिषेक कराने के लिए लाइन लगवाई जाती है। इसके लिए बड़े पैमाने पर बैरिकेडिंग होती है, ताकि श्रद्धालुओं की भीड़ को नियंत्रित किया जा सके। श्रावण पूरे मास मंदिर परिसर के आसपास पटरी के दुकानदारों के जरिए बेलपत्र, धतूरा, भांग सहित फूल की बिक्री काफी बढ़ जाती है। 

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मंदिर परिसर में फूल की दुकान कर रहे एक माली ने बताया भोलेनाथ की कृपा से सिर्फ श्रावण मास की बिक्री से पूरे वर्ष का खर्चा चल जाता है। अधिकांश चीजें जो भोलेनाथ को चढ़ाई जाती है वह व ग्रामीण अंचलों में बड़े पैमाने पर स्वत: निर्जन स्थानों पर उग जाती है। ऐसे में बिना लागत के आसानी से उपलब्ध हो जाती है, जैसे भांग, धतूरा, मदार के पुष्प बेलपत्र आदि। 

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