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कोरोना से भी तेज होती हैं डर की रफ्तार इसकी वजह बताता हैं विज्ञान...

संजीवनी टुडे 29-05-2020 11:22:21

कोरोना वायरस की रफ्तार रुकने का नाम ही नहीं ले रही हैं। कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया में तबाई मचा रखी हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार अब तक कोरोना वायरस संक्रमण के करीब 59 लाख से अधिक मामले सामने आ चुके है।


डेस्क। कोरोना वायरस की रफ्तार रुकने का नाम ही नहीं ले रही हैं। कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया में तबाई मचा रखी हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार अब तक कोरोना वायरस संक्रमण के करीब 59 लाख से अधिक मामले सामने आ चुके है। और इसके चपेट में आने से 3 लाख 62 हजार से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। कोरोना वायरस के साथ-साथ उसका डर भी किसी महामारी की तरह फैल रहा है। घबराए लोग घर पर जरूरी चीजों का स्टॉक इकट्ठा करते दिख रहे हैं. अमेरिका जैसे देशों में कोरोना वायरस के डर की वजह से एशियाई मूल के लोगों पर बढ़ते नस्ली हमलों की खबरें आ रही हैं। 

covid19

आज के दौर में मीडिया की पहुंच इतनी व्यापक और तेज हो गई है कि डर किसी खतरनाक वायरस से ज्यादा तेजी से फैलता है। किसी को डरा हुआ देखकर आप भी डर जाते हैं, भले ही आपको पता न हो कि उसके डर का कारण क्या है। कोरोना वायरस को लेकर सोशल मीडिया पर तरह तरह की पोस्ट शेयर की जा रही हैं। कुछ पोस्ट जानवरों से भी जुड़ी हैं जिसमें कहा जा रहा है कि पालतू जानवरों से भी कोरोना वायरस फैलता है, हालांकि यह अब तक साबित नहीं हुआ है कि जानवरों के कारण कोरोना वायरस फैलता है। भारत में भी कई लोग अपने पालतू जानवरों को सड़क पर छोड़ दे रहे हैं। आवारा पशुओं और कुत्तों के लिए काम करने वाले समूह और कार्यकर्ताओं का कहना है कि कोविड-19 के कारण जानवरों के जीवन पर प्रभाव पड़ा है। 

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डर के पीछे का विज्ञान

डर का संक्रमण जैविक विकास का हिस्सा रहा है। शोधकर्ता कई दूसरी प्रजातियों में इसका अध्ययन करते रहे हैं और वे बताते हैं कि डर होने पर हमारी प्रतिक्रिया एक प्रजाति के तौर पर हमारा बचे रहना सुनिश्चित कर सकती है। अफ्रीका के सवाना मैदानों में चरते हिरणों के किसी झुंड का ही उदाहरण ले लीजिए. अचानक झुंड में किसी सदस्य को शिकार के लिए बढ़ते किसी शेर की मौजूदगी का अहसास होता है। एक क्षण के लिए हिरण ठिठकता है और फिर तुरंत वह दूसरे साथियों को चेतावनी का संकेत देते हुए भागना शुरू करता है। उसकी देखा-देखी दूसरे हिरण भी भागने लगते हैं।

हमारे दिमाग का एक खास हिस्सा खतरों पर प्रतिक्रिया देने में अहम भूमिका निभाता है। इसका नाम है एमिगडला. ये इंद्रियों से आने वाली जानकारी ग्रहण करता है और खतरे का आभास होते ही हाइपोथैलेमस जैसे दिमाग के दुसरे हिस्सों को संकेत भेजता है जहां अलग-अलग हालात के हिसाब से शरीर द्वारा दी जाने वाली प्रतिक्रियाओं का समन्वय होता है। इसके नतीजे भय, अपनी जगह पर जम जाने, भागने या फिर लड़ने के रूप में दिखते हैं। यह सब स्वत:स्फूर्त होता है और इंसान सहित सभी जीवों में होता है। खतरा महसूस होने पर हिरण की प्रतिक्रिया को इससे समझा जा सकता है।

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लेकिन भय का संक्रमण इससे एक कदम आगे जाता है। झुंड के एक सदस्य के बाद सभी हिरणों का अपनी जान बचाने के लिए भागना एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है. लेकिन देखा जाए तो उनका ऐसा करना शेर के हमले के चलते नहीं होता, बल्कि वे ऐसा अपने झुंड के एक भयभीत सदस्य के व्यवहार को देखकर करते हैं. एक का डर पूरे झुंड में फैल जाता है और सारे सदस्य वैसा ही बर्ताव करने लगते हैं

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दूसरे प्राणियों की तरह मनुष्य भी डर की उस भावना के प्रति संवेदनशील होता है जो उसके संबंधी जाहिर करते हैं। दूसरे लोग बचने के लिए क्या कर रहे हैं, यह वह बहुत तेजी से भांप सकता है। अध्ययन बताते हैं कि एंटीरियर सिंगुलेट कॉरटेक्स कहलाने वाला उसके दिमाग का एक खास हिस्सा उसकी इस क्षमता के लिए बहुत अहम होता है। यह हिस्सा उन तारों यानी फाइबर्स को घेरे होता है जो दिमाग के बाएं और दाएं हिस्से को जोड़ते हैं। अब आप किसी दूसरे शख्स को डर की हालत में दिखते हैं तो आपका एंटीरियर सिंगुलेट कॉरटेक्स सक्रिय हो जाता है। 

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जानवरों में किए गए अध्ययन बताते हैं कि किसी दूसरे को डरा हुआ देखकर इसका संदेश एंटीरियर सिंगुलेट कॉरटेक्स से एमिगडला तक जाता है जहां से सुरक्षा प्रतिक्रिया शुरू होती है। यह समझना मुश्किल नहीं कि क्यों सामाजिक प्राणियों के अवचेतन में डर के संक्रमण की एक स्वचालित प्रक्रिया विकसित हुई होगी। इससे आपसी भावना में बंधे किसी समूह का एक साथ सफाया होने से रुकने में मदद मिलती है। इससे उस समूह के सारे सदस्यों के सभी साझे जीन संरक्षित होते हैं ताकि वे आगे की पीढ़ियों में जा सकें।

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अध्ययन बताते हैं कि डर का सामाजिक संक्रमण अजनबियों के बजाय मनुष्य सहित उन प्राणियों के बीच सबसे मजबूत होता है जो एक ही समूह से ताल्लुक रखते हैं। इसके अलावा कई मामलों में यह गुण एक ही समूह के ही नहीं, बल्कि दूसरी प्रजातियों के प्राणियों में सुरक्षा प्रतिक्रिया पैदा करने में भी सहायक साबित होता है।  जैव विकास की प्रक्रिया में कई प्रजातियों ने दूसरी प्रजातियों के खतरे का अलार्म समझने की क्षमता विकसित कर ली है। उदाहरण के लिए चिड़ियों की कर्कश ध्वनि को सुनकर कई स्तनधारी प्राणी भी सचेत हो जाते हैं।

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