संजीवनी टुडे

जिनके आगे माँ काली नाचती थी उनकी 183वीं जयंती आज

संजीवनी टुडे 18-02-2018 19:09:50

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जयपुर।  रामकृष्ण परमहंस भारत के एक महान संत एवं विचारक थे। इन्होंने सभी धर्मों की एकता पर जोर दिया। उन्हें बचपन से ही विश्वास था कि ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं अतः ईश्वर की प्राप्ति के लिए उन्होंने कठोर साधना और भक्ति का जीवन बिताया। स्वामी रामकृष्ण मानवता के पुजारी थे।

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साधना के फलस्वरूप वह इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि संसार के सभी धर्म सच्चे हैं और उनमें कोई भिन्नता नहीं। वे ईश्वर तक पहुँचने के भिन्न-भिन्न साधन मात्र हैं।

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रामकृष्ण की चेतना इतनी ठोस थी कि वह जिस रूप की इच्छा करते थे, वह उनके लिए एक हकीकत बन जाती थी। इस स्थिति में होना किसी भी इंसान के लिए बहुत ही सुखद होता है। हालांकि रामकृष्ण का शरीर, मन और भावनाएं परमानंद से सराबोर थे, मगर उनका अस्तित्व इस परमानंद से परे जाने के लिए बेकरार था। उनके अंदर कहीं न कहीं एक जागरूकता थी कि यह परमानंद अपने आप में एक बंधन है।

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काली के भक्त
रामकृष्ण परमहंस ने अपना ज्यादातर जीवन एक परम भक्त की तरह बिताया। वह काली के भक्त थे। उनके लिए काली कोई देवी नहीं थीं, वह एक जीवित हकीकत थी। काली उनके सामने नाचती थीं, उनके हाथों से खाती थीं, उनके बुलाने पर आती थीं और उन्हें आनंदविभोर छोड़ जाती थीं। यह वास्तव में होता था, यह घटना वाकई होती थी। उन्हें कोई मतिभ्रम नहीं था, वह वाकई काली को खाना खिलाते थे।

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विवेकानंद के गुरु
परमज्ञानी योगी और आध्यात्मिक गुरु के अलावा रामकृष्ण परमहंस स्वामी विवेकानंद के गुरु भी थे। वो अक्सर विवेकानंद से कहा करते थे कि भगवान खुद उनके शरीर में वास करते हैं, लेकिन विवेकानंद का बौद्धिक मस्तिष्क इसे मानने को कतई तैयार नहीं होता था।

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संन्यासी शिष्य : स्वामी विवेकानंद या नरेंद्र नाथ दत्त (आध्यात्मिक गुरु, समाज सेवी), रामकृष्ण मिशन के संस्थापक; राखल चन्द्र घोष (स्वामी ब्रह्मानंद), कालीप्रसाद चन्द्र (स्वामी अभेदानन्द), तारकनाथ घोषाल (स्वामी शिवानंद), सशिभूषण चक्रवर्ती (स्वामी रामकृष्णानन्द), सरतचन्द्र चक्रवर्ती (स्वामी सरदानन्द), तुलसी चरण दत्त (स्वामी निर्मलानंदा), गंगाधर घटक (स्वामी अखंडानंद), हरी प्रसन्न (स्वामी विज्ञानानंद) इत्यादि।

 

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