संजीवनी टुडे

नौ रत्नों में से एक थे तानसेन, इनके मौत का कारण बना इनका संगीत, जानिए कैसे?

संजीवनी टुडे 18-03-2019 14:53:10


डेस्क । इतिहास के पन्नों में तानसेन का नाम हमेशा के लिए अमर है। क्योंकि उनका संगीत ऐसा था कि बुझे दिए भी उनकी वाणी सुनकर जल जाते थे। 

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14वीं शताब्दी में पैदा हुए सुर के महान ज्ञाता तानसेन का असली नाम तनसुख था। उनके पिता का नाम मकरंद पांडे था, वह पांच साल की उम्र तक गूंगे थे। पिता के सानिध्य में गायन की शुरुआत की, 11 वर्ष की उम्र में राजा मान सिंह तोमर की रागमाला में विद्यार्थी के रूप में आए। यहां दरबारी संगीतज्ञ के रूप में रहे, इब्राहीम लोदी के ग्वालियर किले पर चढ़ाई के बाद 1557 में उन्होंने रीवा नरेश रामचंद्र बघेल के दरबार में पनाह ली। राजा रामचंद्र की सभा के गायक जीन खां अकबर के दरबारी गायकों में शामिल हो गए थे। उन्होंने तानसेन की विशिष्ट गायकी की प्रशंसा करके उनको अकबर के दरबार में शामिल कराया था। बाद में अकबर ने तानसेन को अपने नौ रत्‍‌नों में शामिल कर लिया। उनको संगीत विभाग का प्रधान बना दिया।

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तानसेन ने करीब 400 राग-रागनियों को परिष्कृत करके अपने संगीत ग्रंथों में समाविष्ट किया। उन्होंने ईरानी और भारतीय संगीत शैलियों का प्रयोग करके एक नवीन दरबारी तर्ज का विकास किया। दरबारी तोड़ी, दरबारी जैसे रागों का सृजन किया। उन्होंने तीन प्रमुख ग्रंथों संगीतसार, रागमाला और गणेश स्त्रोत की रचना की।

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इतिहास में तानसेन और बैजू बावरा के बीच हुआ मुकाबला काफी प्रसिद्ध हैं। तानसेन और बैजू बावरा दोनों वृंदावन वाले स्वामी हरिदास के शिष्य रहे थे। एक बार बादशाह अकबर ने हरिदास से मिलने ख्वाहिश की तो तानसेन ने उनको आगरा बुलाने की हामी भर दी। यह बात स्वामी को बुरी लगी, अपना अपमान समझा कि तानसेन ने राजा उनसे मिलने वृंदावन आने की क्यों नहीं कहा। स्वामी ने तानसेन का दीपक राग सिखाया था, बैजू बावरा को उन्होंने राग मल्हार सिखाया। दोनों के बीच मुकाबला कराया गया। 

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पहला मुकाबला आगरा किले के दीवान खास में हुआ, यहां बैजू ने पत्थर पिघला कर अपना तानपूरा गाड़ दिया। उसे तानसेन से निकालने को कहा लेकिन वह नहीं निकाल सके। दूसरा मुकाबला सिकंदरा में हुआ, यहां राग सुनकर हिरन बैजू के पास आ गए, उन्होंने अपने गले की माला हिरन के गले में डाल दी। 

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तानसेन को अपने संगीत के बल पर हिरन को पास बुलाकर उसके गले में पड़ी माला उतारने की चुनौती दी थी। तानसेन इस चुनौती को पूरा नहीं कर सके थे। तीसरा और आखिरी मुकाबला सीकरी में हुआ, मान्यता है कि यहां तानसेन के राग से दीपक जल उठे, उनके कपड़ों में आग लग गयी। तब बैजू ने राग मल्हार गाकर बारिश कराके दीपकों को बुझा दिया था। बताते हैं इस हार के बाद तानसेन अकबर का दरबार छोड़कर ग्वालियर चले गए। अंतिम समय तक यहीं रहे, अप्रैल 1589 में उन्होंने अंतिम सांस ली।

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