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मेजर ध्यानचन्द: हॉकी के जादूगार के जीवन की ऐसी रस्यमय बातें जो आप नहीं जानते हो

संजीवनी टुडे 20-01-2018 21:01:07

Major Dhyanchand Such a rational thing of the life of Hokis magician you do not know

नई दिल्ली। भारतीय राष्ट्रीय खेल हॉकी की बात करें तो सबसे पहले  मेजर ध्यानचन्द का नाम आता है।  हम हॉकी के महान जादूगर मेजर ध्यान चन्द को कैसे भूल सकते हैं। ध्यानचन्द का जन्म 29 अगस्त, 1905 को इलाहाबाद में हुआ था। वह भारतीय फ़ौज में नौकरी करते थे और हॉकी के बहुत ही बढ़िया खिलाड़ी थे। उनको तीन बार ओलिंपिक खेलों में भाग लेने का अवसर मिला– 1928, 1932 और 1936 में अपने पूरे ख़ेल जीवन के दौरान उन्होंने 400 से ज़्यादा गोल किये और हमेशा अपनी टीम को जीत दिलाई।

ख़ेल के दौरान ध्यानचन्द इतनी चुस्ती फुर्ती, स्फ़ूर्ति और कुशलता के साथ खेलते थे और उनके इतने ज्यादा गोल करने के क्षमता की वजह से ऐसा कहा जाने लग गया कि – हॉकी एक खेल नहीं है, बल्कि एक जादू है और ध्यान चन्द इसके महान जादूगर 1936 ओलंपिक खेलों में भारत का फाइनल मैच जर्मनी के साथ होना था और यह मैच देखने के लिए उस वक़्त के जर्मनी के चांसलर अडोल्फ़ हिटलर भी स्टेडियम में मौजूद थे और वह चाहते थे कि किसी भी तरह जर्मनी यह फाइनल मैच जीत जाए। मगर ध्यान चन्द के होते हुए यह कहां सम्भव था, और अंतत: भारत ने जर्मनी को 8-1 के मार्जिन से हरा दिया। इस मैच में अकेले ध्यानचन्द ने 6 गोल दागे और जर्मनी के चांसलर हिटलर ध्यान चन्द की खेल कुशलता और शैली से इतना प्रभावित हुआ कि उसने ध्यानचन्द को अपने घर खाने पर बुलाया। खाने के दौरान हिटलर ने ध्यान चन्द से पूछा कि वह हॉकी खेलने के इलावा क्या करते है? ध्यानचन्द ने जवाब दिया कि वह आर्मी में लान्सनायक हैं।

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फिर हिटलर ने ध्यानचन्द को इंडिया छोड़कर जर्मनी में आकर बसने का निमंत्रण दिया और यह भी लालच दिया कि वह ध्यान चन्द को जर्मनी की सेना में जनरल बना देगा, एक बहुत बड़ी कोठी भी उसे दी जाएगी, बस वह आकर वहीं बस जाये और जर्मनी की टीम को हॉकी खेलना सिखाये। मगर ध्यानचन्द ने हिटलर का प्रस्ताव यह कहकर ठुकरा दिया कि वह अपने देश को बहुत प्यार करता है और अपना देश छोड़ने के बारे में सोच भी नहीं सकता।

मगर अपने देश में अन्य दलित लोगों की तरह, ध्यानचन्द के साथ भी जाति आधारित भेदभाव अक्सर होते रहते थे। जैसे कि खिलाडियों को जीतने के बाद जो इनाम में दी जाने वाली धन राशि को घोषणा होती है, वह भी उस खिलाड़ी की जाति जानकर ही होती है। सारी उम्र ध्यानचन्द का हॉकी के प्रति समर्पण, उसकी अपने देश को जीत दिलाने की लगन व कार्य-कुशलता को देखते हुए उसको बहुत पहले खेलों में भारत रत्न मिल जाना चाहिए था।

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मगर ऐसा हरगिज़ नहीं हो सका, क्योंकि किस-किस खिलाड़ी को क्या-क्या इनाम और मान सम्मान देना है, इसका निर्णय तो सत्ता में शिखर पर बैठे बड़े अधिकारी और नेतागण ही करते हैं और यह निर्णय लेते समय वह खिलाड़ी की जाति देखना कभी नहीं भूलते। अंत में जब 2014 में यह निर्णय लिया गया कि भारत रत्न के लिए खेलों को भी शामिल किया जाना चाहिए, उस वक़्त भी ध्यानचन्द के साथ चार-पांच दशकों से होते रहे अन्याय को समाप्त करने की बजाय, ध्यानचन्द  छोड़कर सचिन तेंदुलकर को यह सम्मान दे दिया गया। और इस तरह ध्यानचन्द के साथ हो रहा तिरस्कार का सिलसिला उसके मरणोप्रांत अब भी जारी है. अपने ही गांव झाँसी में 3 दिसंबर, 1979 को उनकी मृत्यु हो गई।

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