संजीवनी टुडे

30 वर्षों के संघर्ष और युद्ध के बाद भी महाराणा प्रताप को कभी बंदी नहीं बना सके अकबर, लेकिन बाद में...

संजीवनी टुडे 17-01-2019 12:36:59


डेस्क । महाराणा प्रताप का जन्म- 9 मई, 1540 ई. कुम्भलगढ़, राजस्थान; मृत्यु- 29 जनवरी, 1597 ई. का नाम भारतीय इतिहास में वीरता और दृढ़ प्रतिज्ञा के लिए अमर है। वे उदयपुर, मेवाड़ में सिसोदिया राजवंश के राजा थे। वह तिथि धन्य है, जब मेवाड़ की शौर्य-भूमि पर 'मेवाड़-मुकुट मणि' राणा प्रताप का जन्म हुआ। वे अकेले ऐसे वीर थे, जिसने मुग़ल बादशाह अकबर की अधीनता किसी भी प्रकार स्वीकार नहीं की। वे हिन्दू कुल के गौरव को सुरक्षित रखने में सदा तल्लीन रहे।

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महाराणा प्रताप को बचपन में कीका के नाम से पुकारा जाता था। इनका नाम प्रताप  और इनके पिता का नाम राणा उदय सिंह  था। प्रताप का वजन 110 किलो और हाईट 7 फीट 5 इंच थी। प्रताप का भाला 81 किलो का और छाती का कवच का 72 किलो था। उनका भाला, कवच, ढाल और साथ में दो तलवारों का वजन कुल मिलाकर 208 किलो था। प्रताप ने राजनैतिक कारणों की वजह से 11 शादियां की थी। 

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अकबर ने एक बार कहा था की अगर महाराणा प्रताप और जयमल मेड़तिया मेरे साथ होते तो हम विश्व विजेता बन जाते। ऐसा माना जाता है कि हल्दीघाटी के युद्ध में न तो अकबर जीत सका और न ही राणा हारे। मुगलों के पास सैन्य शक्ति अधिक थी तो राणा प्रताप के पास जुझारू शक्ति की कोई कमी नहीं थी।

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अकबर ने राणा प्रताप को कहा था की अगर तुम हमारे आगे झुकते हो तो आधा भारत आप का रहेगा, लेकिन महाराणा प्रताप ने कहा मर जाऊँगा लेकिन मुगलों के आगे सर नही नीचा करूंगा। 30 सालों तक प्रयास के बाद भी अकबर, प्रताप को कभी बंदी न बना सका। प्रताप की मौत की खबर सुनकर अकबर भी रो पड़ा था। 

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हल्दीघाटी के युद्ध को “राजस्थान का थर्मोपोली” कहा जाता है। इस युद्ध में जहां प्रताप की सेना में कुल 20 हजार सैनिक थे वहीं मुगल सेना 85 हजार सैनिक थे। मुगलों की इतनी बड़ी सेना को देखकर भी प्रताप ने हार नहीं मानी और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया। यह युद्ध 18 जून 1576 इस्वीं में लड़ा गया। मुगलो की सेना राजामानसिंह और आसफ खाँ के नेतृत्व में लड़ी। मुगलों के पास जहां सैन्य शक्ति अधिक थी वहीं प्रताप के पास जुझारू शक्ति का बल था। भीषण युद्ध में दोनों तरफ के योद्धा घायल होकर जमीन पर गिरने लगे। प्रताप अपने स्वामीभक्त घोड़े चेतक पर सवार होकर शत्रु की सेना में मानसिंह को खोजने लगे। युद्ध में चेतक ने अपने अगले दोनों पैर सलीम (जहांगीर) के हाथी की सूंड पर रख दिये। प्रताप के भाले से महावत मारा गया और सलीम भाग खड़ा हुआ। 

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महाराणा प्रताप को युद्ध में फंसा हुआ देखकर झाला सरदार मन्नाजी आगे बड़ा प्रताप के सिर से मुकुट उतार कर स्वयं अपने सिर पर रख लिया और तेजी से कुछ दूरी पर जाकर युद्ध करने लगा। मुगल सेना उसे ही प्रताप जानकर उस पर टूट पड़े और प्रताप को युद्ध भूमि से दूर जाने का अवसर मिल गया। उनका पूरा शरीर अनेक घावों से लहुलुहान हो चुका था। स्वामीभक्त घोड़ा चेतक 26 फीट लम्बे नाले को पार कर गया और अपने स्वामी के प्राण बचाये। इस प्रयास में चेतक की मृत्यु हो गयी और प्रताप के भाई शक्तिसिंह ने उन्हें अपना घोड़ा दिया। प्रताप यहां से जंगलो की ओर निकल पड़े। यह युद्ध केवल एक दिन चला परन्तु इस युद्ध में 17 हजार लोग मारे गये। 

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जिस समय 1579 से 1585 तक मुगल अधिकृत प्रदेशों उत्तरप्रदेश, बंगाल, बिहार और गुजरात में विद्रोह हो रहे थे उसी समय महाराणा प्रताप फिर से मेवाड़ राज्य को जीतने में जुट गये। अकबर अन्य राज्यों के विद्रोह दबाने में उलझा हुआ था जिसका लाभ उठाकर महाराणा ने भी मेवाड़ मुक्ति के प्रयास तेज कर दिये और उन्होंने मेवाड़ में स्थापित मुगल चौकियों पर आक्रमण कर उदयपुर सहित 36 महत्वपूर्ण स्थानों पर अधिकार कर लिया। महाराणा प्रताप ने जिस समय सिंहासन ग्रहण किया। उस समय सम्पूर्ण मेवाड़ की भूमि उनकी सत्ता फिर से कायम हो गयी थी। यह युग मेवाड़ के लिए स्वर्ण युग बन गया। उन्होंने चावण्ड को अपनी नई राजधानी बनाया और यहीं पर उनकी मृत्यु हो गयी। उनकी मृत्यु सुनकर अकबर ने भी उनकी शूरवीरता की प्रशंसा की और उसकी आंख में आंसू आ गये। महाराणा प्रताप का जन्म कुभंलगढ़ दुर्ग में हुआ था। उनकी माता जैवन्ताबाई पाली सोनगरा अखैराज की बेटी थी। बचपन में प्रताप को कीका के नाम से पुकारा जाता था। इनका राज्याभिषेक गोगुन्दा में हुआ। विभिन्न कारणों से प्रताप ने 11 विवाह किये। महाराणा प्रताप से सम्बंधित सभी स्थलों पर स्मारक बनाये गये है। 

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हल्दीघाटी में घोडे़ चेतक का स्मारक भी बनाया गया है तथा एक पहाड़ी पर महाराणा प्रताप स्मारक के साथ-साथ इसकी तलहटी में एक निजी ट्रस्ट द्वारा आकर्षक प्रताप संग्रहालय स्थापित किया गया है। प्रताप के जीवन से जुडी तमाम घटनाओं को इस संग्रहालय में मॉडल, झांकी एवं चित्रों द्वारा बखूबी दर्शाया गया है। यहां प्रताप के जीवन से सम्बंधित एक लघु फिल्म भी दर्शकों को दिखाई जाती है। उदयपुर के सिटी पैलेस में बनी प्रताप दीर्घा में महाराणा प्रताप का 81 किलो का भाला, 72 किलो का छाती का कवच, ढ़ाल, तलवारों सहित अन्य स्मृतियां देखने को मिलती है। 


 

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