संजीवनी टुडे

बुजुर्गों के स्वाभिमान की कहानी बयां करती है फिल्म " रिटायरमेंट"

संजीवनी टुडे 09-10-2019 18:01:34

फिल्म रिटायरमेंट कि शूटिंग मेवाल फिल्म स्टुडियो जयपुर में पूरी होने के बाद फिल्म के डाइरेक्टर तप्तेश कुमार मेवाल ने बताया कि यह शॉर्ट फिल्म हमे यह बताती है कि भारतीय समाज में बुजुर्गों का हमेशा एक सम्मानीय स्थान रहा है।


जयपुर। फिल्म रिटायरमेंट कि शूटिंग मेवाल फिल्म स्टुडियो जयपुर में पूरी होने के बाद फिल्म के डाइरेक्टर तप्तेश कुमार मेवाल ने बताया कि यह शॉर्ट फिल्म हमे यह बताती है कि भारतीय समाज में बुजुर्गों का हमेशा एक सम्मानीय स्थान रहा है। एक मार्गदर्शक और पारिवारिक मुखिया होने के नाते जो सम्मान बुजुर्गों को मिलता था, उसमे धीरे-धीरे कमी आ रही है। उनके अनुभव को अमूल्य पूंजी समझने वाला समाज अब इनके प्रति बुरा बर्ताव भी करने लगा है। बुजुर्गों के प्रति दुर्व्यवहार के मुख्य कारणों में समय का अभाव और एकल परिवार है बुजुर्गों की देखभाल एक व्यापक समस्या के रूप में सामने आ रही है।

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सबसे चिंताजनक पहलू है कि समाज ने बुजुर्गों का सम्मान करना बंद कर दिया है, उनके अनुभव का लाभ उठाने की बजाय उन्हें बोझ समझा जाने लगा है। यह नयी सामाजिक व्यवस्था की कड़वी सच्चाई है, हम अपने बुजुर्गों को न प्यार देते हैं और न सम्मान जिसके वो हकदार हैं। बुजुर्गों के सामने पेश आने वाले मुद्दों के प्रति युवा पीढ़ी की जागरूकता उनके प्रति वास्तविक मदद में तब्दील नहीं हो पाती। आज का वृद्ध समाज-परिवार से कटा रहता है और सामान्यतः इस बात से सर्वाधिक दुःखी है कि जीवन का विशद अनुभव होने के बावजूद कोई उनकी राय न तो लेना चाहता है और न ही उनकी राय को महत्व देता है। 

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हम सब कुछ बदल सकते हैं, लेकिन पूर्वज नहीं। जिस परिवार में बड़े बुजुर्गों का सम्मान नहीं होता उस परिवार में सुख, संतुष्टि और स्वाभिमान नहीं आ सकता। हमारे बड़े बुज़ुर्ग हमारा स्वाभिमान हैं, हमारी धरोहर हैं। उन्हें सहेजने की जरूरत है। यदि हम परिवार में स्थायी सुख, शांति और समृध्दि चाहते हैं तो परिवार में बुजुर्गों का सम्मान करें। भारतीय संस्कृति में परिवार के वरिष्ठ जनों अथवा बुजुर्गों का सम्मान देने उनकी सुख सुविधाओं का हर क्षण ध्यान रखने की प्राचीन परम्परा रही है। परिवार में कोई भी कार्य करने से पूर्व वरिष्ठ जनों से सलाह मार्ग दर्शन एवं आशीर्वाद लिया जाना आवश्यक माना जाता था। 

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वर्तमान में पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण से भारत में संयुक्त परिवार की प्राचीन परंपरा समाप्त हो रही है। एकल परिवार बढ़ते जा रहे है। एकल परिवार में सबसे ज्यादा उपेक्षा बुजुर्गों की हो रही है। बुजुर्गों की सुरक्षा व सम्मान बहुत जरूरी है। इसे सभी को समझना होगा। “फल न देगा न सही,छाँव तो देगा तुमको पेड़ बूढ़ा ही सही, आंगन में लगा रहने दो।”

 ये है फिल्म के मुख्य कलाकार:
दिनेश कछवाहा, जगमोहन रावत, डॉ शिखा तिवारी, अतुल प्रताप, चंद्रप्रभा चौधरी, प्रतिष्ठा शर्मा, वीणा रावत, कौशल किशोर, जगदीश प्रसाद चाँदोलिया, तप्तेश कुमार और मोक्षित मेवाल है। फिल्म के कहानीकार है संतोष निर्मल की व कैमरे पर साथ दिया है श्री हरि, सन्नी स्टुडियो & मानव सेवा ट्रस्ट जयपुर।

गोवर्मेन्ट एप्रूव्ड प्लाट व फार्महाउस मात्र रु. 2600/- वर्गगज, टोंक रोड (NH-12) जयपुर में 9314166166    

 
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