संजीवनी टुडे

Movie Review स्पेशल: शानदार अभिनय के साथ समाज की कडवी सच्चाई बताती है फिल्म 'लव सोनिया'

संजीवनी टुडे 12-09-2018 13:15:37


डेस्क। अनुपम खेर, राजकुमार राव और मनोज बाजपेयी से दिग्गज कलाकारों के बहतरीन अभिनय से भरपूर फिल्म 'लव सोनिआ' रिलीज हुई है। यह कहानी सच्ची घटनाओं पर आधारित है, जो 7-8 साल की रिसर्च के बाद बनी है। फिल्म में ग्रामीण क्षेत्रों में होने वाली ह्यूमन ट्रैफिकिंग और प्रॉस्टिट्यूशन की कड़वी सच्चाई को  एक बहन के दूसरी बहन को ढूंढने की कहानी है को बताया गया है।  

कहानी - फिल्म की कहानी महाराष्ट्र के एक गांव जहां बारिश न होने के कारण किसान बेहाल और कर्ज़ के बोझ तले दबे हुए हैं।  ऐसा ही एक किसान है प्रीती (रिया सिसोदिया) और सोनिया (मृणाल ठाकुर) का पिता शिवा (आदिल हुसैन) है। जिसमे दादा ठाकुर (अनुपम खेर) से कर्ज़ लिया हुआ है। इसी को चुकाने के लिए वह प्रीती को बेच देता है। अपनी बहन की तलाश में शहर दर शहर भटकती है। इस दौरान कहानी में तरह-तरह के किरदारों की एंट्री होती है जैसे रश्मि (फ्रीडा पिंटो), सलमा (डेमी मूर), माधुरी( रिचा चड्ढा), अंजलि (सई ताम्हणकर), शिवा (आदिल हुसैन), बलदेव सिंह (अनुपम खेर), मनीष (राजकुमार राव), फैजल (मनोज बाजपेयी). बहुत सारे उतार-चढ़ाव की वजह से देह व्यापार का एक बहुत बड़ा सरगना भी नजर आता है। बहुत सारे संघर्ष के बाद वो मनोज वाजपेय से मिलतित है और मनोज वाजपेयी उसे प्रीती से मिला देते हैं। लेकिन प्रीती अपनी हालत का ज़िम्मेदार सोनिया को ठहराती है। बाद में सोनिया और माधुरी को अवैध तरीके से पहले हॉन्ग-कॉन्ग बाद में अमेरिका भेज दिया जाता है। जहां रहकर सोनिया अपनी बहन को ढूंढने और खुद वापस आने का संघर्ष करती है। 

एक्टिंग - फिल्म की सबसे खास बात यह है कि मल्टी स्टारर होने के बावजूद भी कोई किरदार एक दूसरे पर हावी नहीं होता। फिल्म की कास्टिंग दिलचस्प है। चरित्रों की बहुत भीड़ में भी हर एक किरदार अपने आप में जरूरी और सटीक नजर आता है। रिया सिसोदिया ने बहुत ही बढ़िया अभिनय किया है। वहीं मृणाल ठाकुर ने टाइटल रोल बखूबी निभाया है लगता नहीं है कि ये उनकी पहली फिल्म है। अपनी हर फिल्म की तरह राजकुमार राव और मनोज वाजपेयी ने बहुत सधा हुआ अभिनय किया है। कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि वह दूसरे किरदार पर भारी पड़ रहे है। रिचा चड्ढा भी अच्छा करती हैं। फ्रेडा पिंटो ने रश्मि के किरदार में गजब जान फूंकी है। अनुपम खेर का फिल्म में बड़ा किरदार नहीं है लेकिन फिर भी वह अपने हिस्से के साथ पूरा न्याय करते हैं। 

 

डायरेक्शन - निर्माता-निर्देशक तबरेज नूरानी ने "लव सोनिया" से पहली बार निर्देशन में कदम रखा है। फिल्म में जिस तरह वैश्यालय के सीन्स को दिखाया गया है उससे आपके मन में सिर्फ और सिर्फ घृणा पैदा होती है। वहां के एक-एक सीन को फिल्माते हुए इतनी बारीक चीज़ों का ध्यान रखा गया है कि आप सिर्फ उस माहौल की विभत्सता को महसूस कर सकते हैं और कुछ भी नहीं। यह सीधे-सीधे दिमाग पर चोट करते मालूम होते हैं।  फिल्म का एन्ड एक दम सही जगह खत्म किया गया है। आये दिन हम ह्यूमन ट्रैफिकिंग से जुड़ी खबरें सुनते रहते हैं। लेकिन फिल्म में जिस तरह लड़कियों को एक जगह से दूसरी जगह भेजा जाता है वह दिल को दहला देने वाला है। हम आप इस तरह के हालत और रहस्यों की कल्पना भी नहीं कर सकते ऐसे समाज की सच्चाई को बताय गया है। अनिमियत संघर्ष और यातनाओ को दिखया गया है जिन्हें उन लड़कियों को वास्तव में झेलना पड़ता है। पिछले 2 सालों में यह फिल्म बहुत सारे नेशनल और इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में दिखाई गई है, जहां इसे काफी सराहा गया।

कमजोर कड़ी - फिल्म का बहुत आकलन करने के बाद एक ही कड़ी मिलती है और वो हैं इसका 'A' सर्टिफिकेट होना जो इसकी ऑडियंस को सिमित कर देता है। दूसरी कड़ी ये है की ये समाज की कड़ी सचाई को बताती है तो बॉलीवुड मसाला फिल्में देखने वाली जनता शायद इसे नापसंद करे। 

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अगर आप रेलस्टिक और सामजिक मुद्दों पर फिल्मे देखते है और इसकी उम्मीद रखते है तो ये जबरदस्त फिल्म है जो आपको सोचने पर मजबूर कर देगी।  

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