संजीवनी टुडे

ये धुआं क्यों उठ रहा है!

डॉ प्रदीप उपाध्याय

संजीवनी टुडे 14-08-2019 14:28:22

आप किसी की जुबान नहीं पकड़ सकते,कहने वाले तो कहेंगे ही और जलने वाले जलेंगे!ऐसे में इस बात का तो हमेशा ही ध्यान रखना पड़ेगा कि लोगों को हर किये-धरे पर आग लगती है या यूं कह सकते हैं कि मिर्ची लगती है। बात-बात पर यहाँ-वहाँ से धुआं उठता हुआ दिखाई देगा, बल्कि यह कह सकते हैं कि लोगों को इतनी आग लगती है कि झाल सी उठती दिखाई देती है।


आप किसी की जुबान नहीं पकड़ सकते, कहने वाले तो कहेंगे ही और जलने वाले जलेंगे! ऐसे में इस बात का तो हमेशा ही ध्यान रखना पड़ेगा कि लोगों को हर किये-धरे पर आग लगती है या यूं कह सकते हैं कि मिर्ची लगती है। बात-बात पर यहाँ-वहाँ से धुआं उठता हुआ दिखाई देगा, बल्कि यह कह सकते हैं कि लोगों को इतनी आग लगती है कि झाल सी उठती दिखाई देती है। ऐसा नहीं है कि एक बार मिर्ची लगी और जलन धीरे धीरे मिट जाए या फिर एक बार आग लगने के बाद दुबारा आग लगने की गुंजाइश ही नहीं रहे। कहा भी है कि लगी को आग कहते हैं, बुझी को राख। एक बार आग लग गई तो लग गई। धुआं तो उठता ही रहेगा।

हाँ, देखा गया है कि कुछ लोगों को मिर्ची लगाने की आदत होती है क्योंकि उन्हें मिर्ची लगाकर ही प्रसन्नता मिलती है,मजा आता है आनन्द की प्राप्ति होती है। आनन्द विभाग चाहे तो इस पर शोध कर सकता है। कुछ लोगों को बात-बात पर या बिना बात के ही मिर्ची लगती है। ऐसे में मिर्ची लगाने का अपना एक अलग ही आनन्द है। कई लोग दिल जले होते हैं उन्हें कोई कुछ कहे या कुछ करें तो उनके पास से धुआं निकलते हुए देखा जा सकता है। अभी कश्मीर के मसले पर सरकार ने कड़ा फैसला लेते हुए देश की अवाम के जख्मों पर मरहम लगाने का काम किया है तो उधर आग फिर सुलग गई। वहाँ हाल यह है कि कभी आग बूझने का नाम ही नहीं लेती। धुआं धूं-धूं कर उठता ही रहता है। लगता है कि उनका जन्म ही धुंआ उगलने के लिए ही हुआ है।

वैसे हरेक आदमी की चाहत होती है कि उसे अच्छे पड़ोसी मिलें लेकिन सभी के भाग्य में यह सुख कहाँ।फूट डालो-राज करो की नीति के नियन्ता कैसे हमें अच्छा पड़ोसी देकर जाते।वे तो उस पटवारी की मानिन्द थे जो मरने से पहले खूंटा गड़वाकर नर्क लोक में प्रस्थान कर जाता है। स्वाभाविक ही है कि ऐसे पड़ोसी को  तीखी मिर्ची तो लगती ही रहती है जिसकी जलन मिटाए नहीं मिट रही है और भी छोटे-बड़े और दूर के बन चुके रिश्तेदारों को भी मिर्ची लगने का अहसास है लेकिन वे अपनी जलन के अहसास को दर्शित नहीं होने दे रहे हैं। अब बाहर की बात तो छोड़े, घर में ही आग लगी हो तो क्या कीजे और इस आग के कारण जगह-जगह से धुआं उठ रहा है। लेकिन कैसे कहें कि यह आग लगने से उठा हुआ धुआं है या फिर कि उन्होंने मिर्ची लगाई उसकी जलन!

बहरहाल, ऐसा कोई अछूता क्षेत्र नहीं मिल रहा है जहाँ इस आग का या मिर्ची लगने का कोई काम न हो। आजकल सबसे ज्यादा धुआं तो बुद्धिजीवियों और रचनाकर्मियों के आसपास से उठता हुआ दिखाई देता है। बात वही पड़ोसी को लगने वाली मिर्ची जैसी ही है। सब पीछे चलें और हमसे अच्छा कोई कैसे कर ले, यदि कर लिया तो मिर्ची लगेगी ही और धुआं उठने से आप-हम कोई भी नहीं रोक सकते। यानी हर जगह, हर क्षेत्र में ये मिर्ची और धुएं की समस्या है, कब तक इनसे और आलोचकों से परेशान रहेंगे।सीधी सी बात है कि कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना।छोड़ो बेकार की बात में..अपना टाइम खोटी करना।

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