संजीवनी टुडे

जिसे सदियों तक बोलने नहीं दिया गया, आज वह अपने लिए बोल रहा है...

संजीवनी टुडे 13-10-2020 10:45:38

दलित लेखकों की रचनाएँ पाठ्यक्रमों में पढ़ाई जा रही हैं। उन पर शोध कार्य हो रहे हैं। मुख्यधारा के साहित्यकार उनका नोटिस लेने लगे हैं।


डेस्क। एक समाज जो सदियों से अपने लिए नहीं बोल सका। सदियों से जिसे बोलने नहीं दिया गया। सदियों से जिसके लिए कोई नहीं बोला। आज वह खुद अपने लिए बोल रहा है। चाहे हिंदी में हो या अन्य भाषाओं में। आज दलित लेखक बोल रहा है। दलित-लेखन का यह बोलना सदियों से शोषित,पीड़ित का बोलना है। दलित लेखकों की रचनाएँ पाठ्यक्रमों में पढ़ाई जा रही हैं। उन पर शोध कार्य हो रहे हैं। मुख्यधारा के साहित्यकार उनका नोटिस लेने लगे हैं।

भारत में दलित साहित्य लेखन की शुरुआत मराठी में हुई। कमलेश्वर ने 'सारिका' के सम्पादन  के दौरान मराठी और हिंदी में दलित साहित्य के विशेषांक निकाले। हिंदी में पहली बार इसी से पाठक दलित साहित्य से परिचित हुए। आज वह हिंदी में अपने उरूज पर है। दलित साहित्य के वरिष्ठ लेखकों में रत्नकुमार सांभरिया का महत्त्वपूर्ण स्थान है। उन्होंने कई महत्त्वपूर्ण कहानियाँ लिखी। दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र गढ़ने में भी इनकी महत्ती भूमिका रही है। हिंदी दलित-लेखन एवं रत्नकुमार सांभरिया के साहित्य पर डॉ.धूल चन्द मीना जे.आर.एफ. शोधार्थी ने कला संकाय के अधिष्ठाता,दलित चिंतक व कथा साहित्य के मर्मज्ञ प्रोफेसर (डॉ.) किशोरीलाल रैगर के निर्देशन में पाँच वर्ष तक महत्त्वपूर्ण व गम्भीर शोध कार्य किया है जो अब यह पुस्तक रूप में प्रकाशित है। इस पुस्तक के प्रकाशित में प्रोफेसर (डॉ.) किशोरीलाल का विशेष हाथ रहा है। पुस्तक की भूमिका इनके द्वारा लिखी गई है जो पुस्तक के विविध पक्षों को उद्घाटित करती है। डॉ.धूल चन्द ने समय-समय पर प्रोफेसर लाल से दलित-लेखन की हर सूक्ष्म अवधारणाओं पर कई तथ्यात्मक,शोधपरक संवाद व वार्ताएँ की हैं।

Ratnakumar Sambharia

दलित-लेखन के परिप्रेक्ष्य में देखे तो रत्नकुमार सांभरिया ने अपने साहित्य द्वारा दलित चेतना को एक नई पहचान दी है। उनका साहित्य न केवल दलितों की आवाज है बल्कि दलित-लेखन में जो बद्धमूल धारणाएँ घर करती जा रही थी उनको उन्होंने तोड़ा है और दलित साहित्य का नया सौंदर्यशास्त्र भी गढ़ने की कोशिश की। डॉ.धूल चंद मीना की यह पुस्तक दलित-लेखन की अवधारणा एवं विकासक्रम को वैज्ञानिक तरीके से देखने की कोशिश की है। 

उन्होंने चातुर्वर्ण्य व्यवस्था से लेकर आज तक दलित-लेखन की परम्परा एवं पृष्ठभूमि के परिप्रेक्ष्य में न सिर्फ दलित बल्कि दलितेतर लेखकों द्वारा रचित साहित्य पर भी प्रकाश डालते हुए इस निष्कर्ष पर पहुंचने की कोशिश की है इसके बीज आदिकाल में भी थे पर कुलीन वर्ग के साहित्य के कारण दबा दिया गया।

रत्नकुमार सांभरिया स्वयं दलित वर्ग के होने के कारण बचपन में उच्च वर्ग के लोगों द्वारा भेदभाव को भोगा व झेला। यही कारण था कि कालांतर में वे दलित समाज की मुखर आवाज साहित्य लेखन किया। डॉ.धूल चंद मीना ने सांभरिया के व्यक्तित्व का आकलन उनके पैतृक गाँव भाड़ावास (हरियाणा) जाकर,उनसे बात करके,उनका साहित्य पढ़कर किया। उनके साहित्य में अभिव्यक्त सामाजिक,आर्थिक,राजनीतिक,धार्मिक व सांस्कृतिक चेतना का सूक्ष्मता से अध्ययन कर डॉ.धूल चन्द ने प्रतिपादित किया कि उनकी कहानियों की अपनी एक विशिष्ट शैली है जो उन्हें अपने समकालीन दलित लेखकों से अलग एवं विशिष्ट बनाती है।

इस पुस्तक में गंभीर विवेचन करते हुए लेखक डॉ.मीना ने उनकी रचनाओं को आधार बनाकर दलित चेतना के विविध पक्षों को रेखांकित किया है। उसने प्रतिपादित किया कि रत्नकुमार सांभरिया समतामूलक व मानवतावादी समाज की स्थापना के लिए प्रतिबद्ध है। अपनी रचनाओं के माध्यम से वे सभी तरह की विषमताओं के विरूद्ध संघर्षरत पात्रों की बनावट करते हैं। ये पात्र ही उनके कथानक  की मूल भावना है जो न केवल जीवट व जज्बे से जातिवाद के सभी षड्यंत्रों को कुचलते हैं बल्कि शिक्षा,संगठन के मूलमंत्र से सोये हुए समाज में चेतना का संचार भी करते हैं।

लेखक डॉ.धूल चन्द ने रत्नकुमार सांभरिया की कहानियों,नाटकों,एकांकियों,लघुकथाओं आदि का समग्र मूल्यांकन करते हुए इनके साहित्य के मूल को पकड़ने की कोशिश की है और मूल यह है कि दलितों को स्वयं अपनी आवाज बननी होगी। इस प्रकार यह पुस्तक न केवल सांभरिया की दलित चेतना व उनके पुनर्वास के सिद्धांत को प्रतिपादित करने में सक्षम है अपितु दलित साहित्य सम्बन्धी कई बद्धमूल धारणाओं को भी तोड़ता है। दलित-लेखन के संदर्भ में रत्नकुमार सांभरिया के साहित्य के सार्थक मूल्यांकन की यह महत्त्वपूर्ण पुस्तक है।

Disclaimer- यह लेखक के निजी विचार है
     
समीक्षक : वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. सत्यनारायण

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