संजीवनी टुडे

दुनिया को रहने लायक बनाने की जिम्मेदारी किसकी: सियाराम पांडेय 'शांत'

संजीवनी टुडे 30-06-2019 14:13:58

मुंबई में इतनी बारिश हो रही है कि वहां जनजीवन अस्त-व्यस्त है। दूसरीओर, कई राज्य ऐसे भी हैं, जहां बादलों ने रूठकर रास्ता बदल लिया है। बरसात के मौसम में सूर्यदेव तप रहे हैं। लू चल रही है। ऋतु चक्र का गड़बड़ होना बड़ी समस्या है। इससे पूरी दुनिया जूझ रही है। अमेरिका और ठंडे समझे जाने वाले यूरोपीय देशों में गर्मी शिखर पर है।


मुंबई में इतनी बारिश हो रही है कि वहां जनजीवन अस्त-व्यस्त है। दूसरीओर, कई राज्य ऐसे भी हैं, जहां बादलों ने रूठकर रास्ता बदल लिया है। बरसात के मौसम में सूर्यदेव तप रहे हैं। लू चल रही है। ऋतु चक्र का गड़बड़ होना बड़ी समस्या है। इससे पूरी दुनिया जूझ रही है। अमेरिका और ठंडे समझे जाने वाले यूरोपीय देशों में गर्मी शिखर पर है। बढ़ता तापमान केवल गर्म देशों की ही समस्या नहीं है। ठंडे मुल्क भी इसकी चपेट में हैं। ऋतु चक्र का संतुलन बिगड़ा है। दुनियाभर में इसे लेकर चिंता है। ग्लोबल वार्मिंग का आलम यह है कि 1975 से लगातार हिमालयीय ग्लेशियर पिघल रहे हैं। 1975 से 2000 तक हर साल हिमालयीय ग्लेशियर की 400 करोड़ टन बर्फ पिघलती रही। 2000 से 2019 तक दोगुनी रफ्तार से 800 करोड़ टन बर्फ हर साल पिघल रही है। यह स्थिति चिंताजनक है। ग्लेशियर ही नहीं बचेंगे तो नदियों में जल कहां से आएगा? 

 ब्रिटेन में जलवायु परिवर्तन पर काम हो रहा है। लोग इस समस्या को लेकर गंभीर हैं। ब्रिटिश गायिका ब्लाइथे पेपीनो ने जलवायु परिवर्तन पर काम करने के लिए वर्ष 2018 में 'बर्थ स्ट्राइक' ग्रुप बनाया है। इस ग्रुप में 330 सदस्य हैं जिसमें 80 प्रतिशत महिलाएं हैं। इस ग्रुप की महिलाओं ने यह निर्णय लिया है कि वे बच्चे पैदा नहीं करेंगी। जनसंख्या नियंत्रण के लिहाज से यह बड़ा निर्णय है लेकिन बच्चे पैदा न करने की जो वजह बताई गई है, वह दुख देती है। ग्रुप का कहना है कि यह दुनिया रहने लायक नहीं है। दुनिया में सूखे, अकाल, बाढ़ और ग्लोबल वार्मिंग का डर है। 

आने वाली पीढ़ियों को इस समस्या से जूझना न पड़े, इसलिए उन्होंने ऐसा किया है। भले ही यह निर्णय छोटे स्तर पर लिया गया हो लेकिन इससे इसकी महत्ता कम नहीं हो जाती। विचार कहीं भी पैदा हो लेकिन उसके वटवृक्ष बनने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता। पेपीनो और उनके ग्रुप ने यह फैसला यूनाइटेड नेशंस इंटरनेशनल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज की चेतावनी के बाद लिया है। इसमें कहा गया था कि जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए महज 11 साल बचे हैं। ग्रुप से जुड़े लोगों का मानना है कि अगर चीजें ठीक नहीं होंगी, तो मनुष्य अच्छा जीवन नहीं बिता सकेगा। 

जलवायु परिवर्तन होने पर कई चीजें बदलती हैं। इससे खाद्य उत्पादन, संसाधन प्रभावित होते हैं। सवाल यह उठता है कि दुनिया रहने लायक नहीं बची, इस स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन है? किसकी वजह से जलवायु परिवर्तन के खतरे बढ़ रहे हैं? जवाब एक ही होगा, मनुष्य। उसने जल, जमीन, आकाश हर जगह अपनी बाजीगरी की है। प्रकृति को जीतने के चक्कर में मनुष्य खुद के जीवन को खतरे में डाल बैठा है। यूनाइटेड नेशंस की मानें तो  2030 तक धरती पर 8.5 बिलियन लोग होंगे और 2100 तक यह आंकड़ा 11 बिलियन तक होने की उम्मीद है।
 
हाल के कुछ वर्षों में जलवायु परिवर्तन के खतरे बढ़े हैं। ऋतु चक्र का संतुलन बिगड़ा है। जब बरसात अपेक्षित होती है तो नहीं होती और जब बरसात की अपेक्षा नहीं होती तो इतनी हो जाती है कि जल प्लावन का खतरा बढ़ जाता है। सूखा, अकाल, बाढ़ और ग्लोबल वार्मिंग की समस्या से दुनिया के तमाम देश जूझ रहे हैं। लेकिन इस समस्या से निपटने की प्रभावी नीति अभी तक नहीं बन पाई है। अपने देश में हर साल सूखे और बाढ़ से खरबों रुपये का नुकसान होता है। बड़ी संख्या में लोग असमय काल-कवलित होते हैं। 

सूखा और राहत के नाम पर भारत के हर प्रदेश में करोड़ों का वारा-न्यारा होता है। नहीं होता तो समस्या का स्थायी निदान। जिस तेजी के साथ यहां वनों की कटान हो रही है। पहाड़ तोड़े जा रहे हैं। पत्थरों को पीसकर सीमेंट बनाई जा रही है। नदियों में अंधाधुंध बालू का खनन हो रहा है। यह स्थिति पर्यावरण के लिए खतरनाक है। प्रकृति के अंधाधुंध दोहन से प्राकृतिक विक्षोभ स्वाभाविक है। प्रगतिशील बनने की होड़ में हमने एक बार भी नहीं सोचा कि हम कर क्या रहे हैं और मानव जीवन पर इसका क्या प्रतिकूल असर पड़ सकता है।

विश्व बैंक की रिपोर्ट कहती है कि वर्तमान में एक व्यक्ति साल में औसत पांच टन कार्बन-डाइऑक्साइड का उत्सर्जन करता है। अमेरिकन साल में औसत 15.6 मीट्रिक टन कार्बन का उत्सर्जन करते हैं। श्रीलंका और घाना एक टन से भी कम उत्सर्जन करते हैं। धरती पर रहने वाला हर इंसान अगर अमेरिकी नागरिकों की तरह कार्बन का उत्सर्जन करने लगे, तो लोगों को रहने के लिए चार से छह पृथ्वी की जरूरत पड़ेगी। कार्बन उत्सर्जन के अनेक कारण हैं। कल-कारखाने, वाहन, वायुयान, डीजल से चलने वाली पर्यावरण प्रदूषण की समस्या लगातार गंभीर हो रही है। 

भारत ने कहा है कि वह पर्यावरण संतुलन के मुद्दे पर किसी भी देश के सामने नहीं झुकेगा। पर्यावरण के प्रति इससे उसकी प्रतिबद्धता झलकती है लेकिन पर्यावरणीय समस्या से निपटने के लिए उसे विशेष रणनीति बनानी होगी। गत वर्ष तीन प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संगठनों एक्शन एड, क्लाइमेट एक्शन नेटवर्क साउथ एशिया और ब्रेड फार द वर्ल्ड ने अपनी रिपोर्ट में चेताया था कि जलवायु परिवर्तन से दक्षिण एशिया के देशों खासकर भारत में विस्थापन में बेतहाशा वृद्धि होगी। 

रोजी-रोटी की तलाश में ग्रामीण से शहरी इलाकों में विस्थापन तो दशकों से होता रहा है लेकिन बीते एक दशक में जलवायु परिवर्तन की मार से विस्थापन की गति बढ़ी है। बाढ़, सूखे और तूफान ने इसमें इजाफा किया है। विशेषज्ञ भी मानते हैं कि आगामी वर्षों में भारत में आंतरिक विस्थापन ही नहीं, पड़ोसी देशों से भी यहां आने वालों की संख्या में भी वृद्धि होगी। 

आंतरिक विस्थापन निगरानी केंद्र के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2015 में प्राकृतिक आपदाओं के चलते भारत में 36.50 लाख लोग विस्थापित हुए थे। समुद्र का जलस्तर लगातार बढ़ने की वजह से देश के तटवर्ती राज्यों में विस्थापन का भारी खतरा मंडरा रहा है। नौ तटवर्ती राज्यों में साढ़े सात हजार किमी में फैले ऐसे संवेदनशील इलाकों में दस करोड़ से ज्यादा की आबादी रहती है। समुद्र का जलस्तर बढ़ने के कारण तटीय इलाकों में रहने वाले लगभग 76 लाख लोगों के विस्थापन का खतरा पैदा हो जाएगा। 

पश्चिम बंगाल के सुंदरबन इलाके में दो द्वीप पहले ही समुद्र के जल में डूब चुके हैं। ऐसा ही कुछ चलता रहा तो कुछ और द्वीपों के डूब जाने का खतरा है। भारत में पर्यावरण शरणार्थियों की तादाद लगातार बढ़ रही है। पोलैंड में आयोजित कॉप 24 जलवायु सम्मेलन में यह रिपोर्ट पेश की गई कि हिमालय क्षेत्र के  संवेदनशील राज्यों की सूची में असम सबसे ज्यादा संवेदनशील है। जम्मू-कश्मीर तीसरे नंबर पर है जबकि सिक्किम सबसे कम संवेदनशील है। असम में बहुत कम सिंचित जमीन है। इसके अलावा प्रति एक हजार ग्रामीण घरों पर जंगल का अनुपात भी यहां सबसे कम है। 

मिजोरम का लगभग 30 फीसदी इलाका ढलवा होने के कारण राज्य में जलवायु परिवर्तन का असर ज्यादा होने का अंदेशा है। ऐसे इलाके भूस्खलन के प्रति काफी संवेदनशील होते हैं। असम अपनी भौगोलिक स्थिति के अलावा बदहाल आर्थिक-सामाजिक परिस्थितियों की वजह से भी ज्यादा संवेदनशील माना गया है। यहां जलवायु परिवर्तन के चलते बार-बार आने वाली बाढ़ का मुकाबला करने में लोग सक्षम नहीं हैं। ब्रह्मपुत्र में स्थित दुनिया का सबसे बड़ा नदी द्वीप माजुली जलवायु परिवर्तन की मार से सर्वाधिक प्रभावित होता है। बार-बार आने वाली बाढ़ से इसका क्षेत्रफल प्रतिवर्ष  सिकुड़ता जा रहा है। 

गनीमत है कि पर्यावरण संतुलन की पीड़ा को इस देश का बौद्धिक समाज समझ रहा है। मध्यप्रदेश में हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने बीते कुछ सालों में ऐसे फैसले सुनाए हैं, जिसमें न केवल याचिकाकर्ता को राहत मिली है बल्कि समाज की बेहतरी के लिए कुछ करने का अवसर भी मिला है। इस बार मानसून को ध्यान में रखते हुए जस्टिस शील नागू क्रिमिनल मामलों में जिन आरोपियों को सशर्त जमानत का लाभ दे रहे हैं, उन्हें 100-100 पौधे रोपने के लिए भी कह रहे हैं। उन्होंने कुल 36 मामलों में आरोपियों को 100-100 पौधे रोपने का आदेश दिया है। हाईकोर्ट कॉरिडोर में इसे ग्रीन जजमेंट कहा जा रहा है। 

मध्यप्रदेश में जन्मदिन और पुण्य तिथि पर एक पेड़ लगाने और उसे बड़ा करने का संकल्प दिलाया जाता रहा है। इंदौर के जिलाधिकारी ने गत वर्ष विद्यालयों में पढ़ाने का अभियान शुरू किया था। इसका असर यह हुआ कि अधिकारियों को जब भी मौका मिलता, वे स्कूलों में पढ़ाने चले जाते हैं। इस तरह की पहल सामाजिक जागरूकता बढ़ाती है। काश, ऐसा हर व्यक्ति के स्तर पर हो पाता। केवल दुनिया को कोसने से ही काम नहीं चलेगा। अपनी उन भूलों को सुधारना होगा, जो हम वर्षों से करते आ रहे हैं। 

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