संजीवनी टुडे

जाऊं कहाँ बता ए दिल….

डॉ प्रदीप उपाध्याय

संजीवनी टुडे 08-08-2019 21:16:08

सरकार अब उनके निशाने पर है।बेचारी सरकार तो हमेशा ही निशाने पर रहती आई है।


सरकार अब उनके निशाने पर है।बेचारी सरकार तो हमेशा ही निशाने पर रहती आई है। सरकारों के भाग्य में यही लिखा है चाहे इनकी सरकार हो चाहे उनकी सरकार हो। बेचारी सरकार करे भी तो क्या करे! कुछ करे तो बदनाम और कुछ न करे तो भी बदनाम। अभी जो कर गुजरी सरकार जिसके लिए देश भर में जश्न का माहौल है तब भी उनकी शिकायत यही है कि जो किया गलत तरीके से किया।

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अभी पिछले दिनों आर्थिक मंदी की खबरों और रोजगार के संकट पर भी देश के प्रतिभाशाली युवा नेता राहुल गांधी ने कहा भी था कि भाजपा की सरकार सिर्फ़ संस्थाओं को नष्ट करने में अपना वक्त लगा रही है। उन्होंने निशाना साधते हुए यह भी कहा कि बीजेपी सरकार देश में कुछ निर्माण नहीं कर सकती। वह सिर्फ दशकों की कड़ी मेहनत से बनी संस्थाओं को नष्ट कर सकती है।

यहाँ तो उनकी बात से सहमत होना ही पड़ेगा क्योंकि कांग्रेस एक राजनीतिक दल ही नहीं , संस्था भी है। दूसरी छोटी-मोटी संस्थाओं को वर्तमान सरकार नष्ट-भ्रष्ट करे तो करे लेकिन यह क्या कि देश की आजादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली संस्था को ही नष्ट कर दो। उसे इस लायक भी न छोड़ो कि सत्ता तो दूर एक सशक्त विपक्ष के रूप में भी न रहने दें। कभी-कभी अंजाने में पैरों पर कुल्हाड़ी लग जाती है और कभी अधिक ज्ञानी होने पर भी कुल्हाड़ी पैरों पर चल जाती है। इसी के चलते अस्तित्व पर भी संकट आ खड़ा होता है। स्वयं ऐसा कर जाएं ,यह उनकी या रब  की मर्जी लेकिन उनको ऐसा भी क्या गिला-शिकवा कि कांग्रेस मुक्त भारत की बात करते फिरें। इतना खोटा सिक्का भी तो नहीं है वह!

नष्ट करना है किसी को तो करें लेकिन जड़-मूल से तो न उखाड़े गड़े मुर्दों के साथ। वे तो एकदम से पीछे ही पड़ गए, कहीं ऐसा न हो कि कोई नाम लेने वाला ही न मिले!ऐसे में चिंता होना स्वाभाविक है। जबसे आये हैं मिटाने पर ही तुले हुए हैं, किसी को बनने ही नहीं दे रहे हैं। वहाँ भी दो-तीन परिवारों ने सात पीढ़ियों का इंतजाम कर रखा था,उनके भी बुन्दे बैठ गए। यानी चारों तरफ से सफाया करने की चाहत!चलिए ठीक है कि सत्ता में नहीं आने दिया,न सही। अगली सरकार बनाने के दिवास्वप्न में भी लोकनिर्माण विभाग द्वारा बनाए गए बेतरतीब स्पीड ब्रेकर की तरह बन बैठे और हर किसी को उछालते-गिराते खुद फिर पाँच साल के लिए गद्दीनशीन हो गए लेकिन यह भी तो ठीक नहीं कि किसी को विपक्ष का नेता भी न बनने दो। कम से कम इतनी हैसियत में तो रहने देते किन्तु यह भी नहीं, यहाँ भी नष्ट करने पर ही आमादा थे।

बहरहाल जो हुआ सो हुआ,लेकिन अभी जो किया वह तो नहीं होना था न।भविष्य के सभी सपनों को तोड़कर रख दिया।ऐसे में निशाना साधना तो बनता है।हाँ इन हालातों में इनके सहित कई लोगों के दिल यह पूछते जरूर हैं कि - "जाऊं कहाँ बता ए दिल, दुनिया है बड़ी संगदिल।"

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