संजीवनी टुडे

डेंगू तुम कब आवोगे

संजीवनी टुडे 12-09-2018 14:04:14


डेंगू इस वर्ष डंक कम मार रहा है। वो सुनाई और दिखाई नही दे रहा। मीडिया में डेंगू की पोपुलर्टी कम हो चुकी है। सारी टी.आर.पी बाढ़ ने अपने नाम कर ली है। चारों तरफ बाढ़ ही बाढ़ दिखाई दे रही है। बाढ़ पढ़ी जा रही है। बाढ़ सुनी जा रही है। एक नाम है जो हर साल इन दिनों जोरों से सुनाई देता था वो नेपथ्य मे है। डेंगू की आश में कई लोग बैठे हुए हैं। उनकी निराश आंखें डेंगू की तलाश में है। डेगूं आता तो हलचल होती। हॉस्पिटल और दवा की दुकानें गुलजार रहती। ब्लड बैंक में धड़ल्ले से खून बेचा जाता। ऊँचे दामों में मानवता खरीदी जाती। डेंगू आते ही नीम-हकीमों की दुकाने भी खूब दौड़ पड़ती हैं। पपीते की पत्तियों से लेकर तुलसी दल की डिमांड खूब बढ़ जाती है। इस साल सभी इंतजार में बैठे हैं। तुम कब आओगे वाला सीन क्रिएट हुए जा रहा है। नाले-छतों में इकठ्ठा पानी डेंगू की राह ताक रहा है। पुराने कनस्तरों बेकार टायरों की आड़ में जमा बरसाती पानी उचक-उचक कर डेंगू की राह निहार रहा है। अस्पताल तक जाने वाले रास्ते की हर आहट पर बांछे खिलने लग जाती हैं। उसे लगता है ये निश्चित ही डेंगू का मरीज होगा। लेकिन जब वो डेंगू मरीज की जगह किसी और को देखता है तो उदास होकर उसकी बाँछे मुरझा जाती हैं। 
    
डेंगू के समय पर ना आने से सरकारी अधिकारियों में हड़कम्प है। करोड़ो का बजट ऐसे ही पड़ा-पड़ा, सड़ा-सड़ा सा लग रहा है। अधिकारियों से बजट की ये हालत देखी नहीँ जा रही। वो जल्द से जल्द बजट को ठिकाने लगाने को आतुर हैं। हर साल वो डेंगू को खत्म करने का दावा ठोकते हैं लेकिन रक्तबीज की माफिक हर साल डेंगू फिर पैदा हो जाता है। इस बार अधिकारियों को अपने किये पर शक हो रहा है। कहीं सच्ची-मुच्ची डेंगू खत्म तो नही हो गया। लेकिन उनको अपने किये कराये पर पूरा विश्वास है। डेंगू इतनी आसानी से कहाँ खत्म होगा। डेंगू तो सोने का अंडा देनी वाली मुर्गी है। जो हर साल नेताजी से लेकर अधिकारियों के लिए सोने का अंडा लेकर आता है। 
    
डेंगू के टाइम से न पहुचने से फॉगिंग मशीन भी चिंताग्रस्त हैं। उसका जंग लगा मुंह धुंवा उगलने को बेताब है। पिछले दस सालों से फॉगिंग मशीन अपना मशीनी धर्म निभाते आ रही है। भले ही फाइलों पर हर साल उसके नए होने का दावा ठोका जाता रहा है। लेकिन उसने कभी भी विद्रोह नहीँ किया, वो हमेशा मुंह खोलकर धुंवा ही उगलता रहा। 
   
उधर अस्पताल के बेड भी चरचराते हुए आपस में कानाफूंसी कर रहे हैं। आखिर हो क्या गया है डेंगू को। ना जाने कहां रह गया अब तक। हम कब से खाँसी, जुकाम, बुखार वालों का भार उठाये लेटे हैं। डेंगू के मरीज आएँ तो लाइफ में कुछ चेंज आये। 
    
प्लेटलेट्स काउंट करने वाली मशीन पिछले 6 महीनों से सोई पड़ी है। अब वो सोते-सोते बोर हो चुकी है। उसे डर है कहीं उसका हुनर यूं ही सोते-सोते सो ना जाये। वो भी जल्द से जल्द डेंगू मरीजों के प्लेटलेट्स गिनकर खुद को शाबित करना चाहती है। दुकानों और ठेलियों में लगा अनार का जूस खुद ही खुद की प्यास बुझा रहा है। वो भी चाहता है कि वो डेंगू मरीजों के कंठ की प्यास बुझाकर खुद को शहीद घोषित करे। सभी को इंतजार है। सभी यही कहते सुने जा रहे हैं, डेंगू तुम कब आवोगे। 

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