संजीवनी टुडे

मुसलमान कब करेंगे महंगाई व बेरोजगारी पर आंदोलन

आर.के. सिन्हा

संजीवनी टुडे 05-03-2020 12:39:33

संसद ने जब से नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) को पारित किया, देश के मुसलमानों का एक हिस्सा नाराज है। कम-से-कम जगह-जगह धरने-प्रदर्शन कर यह बताने की कोशिश की जा रही है कि वे खफा हैं।


नई दिल्ली। संसद ने जब से नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) को पारित किया, देश के मुसलमानों का एक हिस्सा नाराज है। कम-से-कम जगह-जगह धरने-प्रदर्शन कर यह बताने की कोशिश की जा रही है कि वे खफा हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बार-बार भरोसा देने के बाद भी कि इससे देश के मुसलमानों को भयभीत होने की कतई आवश्यकता नहीं है, वे शांत नहीं हो रहे हैं। वे सड़कों पर उतरे हुए हैं। अब दिल्ली में ही देख लीजिए कि मुसलमान औरतें शाहीन बाग में सड़क को घेर कर बैठी हैं। उन्हें इस बात की रत्ती भर भी चिंता नहीं है कि उनके धरने से राजधानी के लाखों लोग रोज अपने गंतव्य स्थलों पर कई घंटे देर से पहुंच रहे हैं। खैर, धरना देना तो उनका मौलिक अधिकार है। पर याद नहीं आ रहा कि देश के मुसलमानों ने महंगाई, बेरोजगारी या अपने-अपने इलाकों में नए स्कूल-कॉलेज या अस्पताल खुलवाने आदि मांगों को लेकर कभी सड़कों पर उतरकर कोई धरना-प्रदर्शन किया। आपको भी एक भी इस तरह का उदाहरण याद नहीं आएगा जब मुसलमान अपने मूल और बुनियादी सवालों पर सड़कों पर उतरे हों। क्या इनके लिए महंगाई, निरक्षरता या बेरोजगारी जैसे सवाल गौण हैं?

गुस्ताखी माफ हो, लगता है कि देश के मुसलमानों को इनके धार्मिक और सियासी रहनुमा अंधकार युग में बनाये रखना चाहते हैं। ये भी अपने को बदलने के लिए तैयार नहीं हैं। हालांकि इन्हें सीएए के खिलाफ आंदोलन में देश के लगभग सभी प्रमुख विपक्षी दलों के कुछ लोगों का धन-बल का साथ और नैतिक समर्थन भी मिल रहा है। लेकिन क्या कभी मुसलमान अपने समाज के दलितों, आदिवासियों या समाज के अन्य कमजोर वर्गों के हितों को लेकर आगे आए हैं? कभी नहीं। ये बात-बात पर गुजरात दंगों की बात करना भी नहीं भूलते। पर वे कभी गोधरा के दिल दहलाने वाले नरसंहार को याद नहीं करते, जिसमें साठ तीर्थयात्रियों को ट्रेन के डब्बे में जिन्दा जला दिया गया था। क्या ये कभी कश्मीर में इस्लामिक कट्टरपंथियों के हाथों मारे गए पंडितों के लिए भी लड़े? क्या दिल्ली में जब 1984 में श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिखों का खुलेआम नरसंहार हो रहा था, तब क्या ये सिखों को बचाने के लिए आगे आए थे? कतई नहीं। इन्हें अपने को तो हमेशा विक्टिम की स्थिति में रखना-बताना अच्छा लगता है। ये सिर्फ अपने अधिकारों की बातें करते हैं। ये कर्तव्यों की चर्चा करते ही हत्थे से उखड़ जाते हैं।

बाकी की तो बात छोड़ दें, अब तो स्थिति इतनी शोचनीय नजर आती है कि मुसलमान समाज के बड़े असरदार लोग भी अपने पसमांदा मुसलमानों की भी कतई फिक्र नहीं करते। पसमांदा यानी जो पिछड़ गए। अगर आबादी के हिसाब से देखें तो अजलाफ़ (पिछड़े) और अरजाल (दलित) मुसलमान भारतीय मुसलमानों की कुल आबादी का कम-से-कम 85 फीसद हैं। अपने को जातिविहीन कहने वाला मुसलमान समाज जाति के भयंकर कोढ़ में फंसा हुआ है। इधर पसमांदा मुसमानों के हक में तो कोई बात ही नहीं होती। मुस्लिम रहनुमा उर्दू, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, पर्सनल लॉ इत्यादि पर ही बातें करते हैं। इन मुद्दों पर ही समाज को गुमराह करके और गोलबंदी कर और अपने पीछे गरीब मुसलमानों की फ़ौज खड़ी कर खुद मौज काटते रहते हैं। यह सब करते हुए पसमांदाओं के सवाल हर बार कहीं पीछे छूट जाते हैं। आप किसी मुस्लिम नेता से यदि बात करेंगे तो वह अपनी कौम को लेकर तो बड़ी-बड़ी बातें करेगा। पर हकीकत में वह पसमांदा मुसलमानों के हक में कभी आगे नहीं आते। इनके लिए पसंमादा मुसलमान भीड़ से अधिक कुछ नहीं है। ये इन पसमांदा मुसलमानों और उनकी औरतों को अपने आंदोलनों में झोंक देते हैं। आजकल यही तो हो रहा है। अब तो इस तरह के वीडियो भी वायरल हो रहे है, जिसमें मुसलमान औरत अपने शौहर पर आरोप लगा रही है कि वह उसे जोर-जबरदस्ती कर धरने पर बैठने के लिए भेजता है। कहता है कि जाकर वहीं बिरयानी खाकर आओ।

बेशक, सीएए के खिलाफ चल रहे धरने-प्रदर्शन राजनीतिक साजिश से ही प्रेरित हैं। इनको स्वत: स्फूर्त प्रचारित करने वाले लेफ्ट लिबरल, रैडीक्लाइज इस्लामिस्ट, कांग्रेस और चंद्रशेखर रावण जैसों का अपना निहित एजेंडा है। आप देख लें कि जिस दिन अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दिल्ली में पधार रहे थे उसी दिन रावण ने भारत बंद का आहवान किया। उसके आह्वान के बाद बड़ी संख्या में लोग पश्चिमी उत्तर प्रदेश से उत्तर-पूर्वी दिल्ली के जाफराबाद में एकत्र होने लगे। फिर वहां जो कुछ भी हुआ उससे सारा देश हतप्रभ और सन्न है। दिल्ली ने देश के विभाजन के बाद इतने भयंकर हिन्दू-मुसलमानों के बीच खून-खराबा नहीं देखा था। पूरा दंगा पूर्ण रूप से सुनियोजित था। पुलिस एस.आई.टी. के अनुसन्धान में योजना की परत-दर-परत खुल रही है।

अब तो यह साफ होता जा रहा है कि सीएए के विरोध के नाम पर देशभर में हिंसा करवाने की सुनियोजित कोशिशें काफी पहले से चल रही थी। घरों में भारी हथियार आदि जमा किए जा रहे थे। दिल्ली पुलिस ने दंगों को उकसाने या करवाने के लिए ताहिर हुसैन, इशरत जहां से लेकर पुलिस वाले पर बंदूक तानने वाले शाहरुख खान को पहचान लिया है और गिरफ्तार भी कर लिया है। अब ये सारा सच उगलेंगे। इन और इन जैसों की हरकतों के कारण ही दिल्ली धू-धूकर जली। बेहद अफसोस का विषय है कि संसद के दोनों सदनों में भारी बहुमत से पारित होने पर भी सीएए का विरोध हुआ। अफवाह यह फैलाई गई कि सीएए मुसलमानों को देश से बाहर निकालने का कानून है। जबकि यह कानून स्प्ष्ट करता है कि यह किसी की नागरिकता छीनने का कानून है ही नहीं। इसका देश के किसी भी नागरिक से कोई लेना-देना नहीं। बल्कि, सन 1955 के नागरिकता कानून को संशोधित कर यह व्यवस्था की गयी है कि 31 दिसम्बर सन 2014 के पहले पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से भारत आए हिन्दू, बौद्ध, सिख, जैन, पारसी एवं ईसाई धार्मिक प्रताड़ना के शिकार लोगों को भारत की नागरिकता प्रदान की जा सकेगी। 

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