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ग्लोबल आतंकवाद कब बनेगा दुनिया की चिंता?: प्रभुनाथ शुक्ल

संजीवनी टुडे 15-03-2019 10:32:26


वैश्विक आतंकवाद पर दुनिया कितनी संजीदा है, इसका अंदाजा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चीन की चालों से चल गया है। परिषद के स्थायी सदस्य देशों अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और रूस को ठेंगा दिखाते हुए चालबाज चीन ने यह बता दिया कि ग्लोबल आतंकवाद पर दुनिया के आंसू सिर्फ घड़ियाली हैं। जमीनी हकीकत दूसरी है।

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चीन ने चौथी बार वीटो का इस्तेमाल करते हुए भारत की कूटनीति पर पानी फेर दिया। भारत और उसका मित्र राष्ट्र अमेरिका चाह कर भी पाकिस्तानी आतंकी एवं जैश-ए-मोहम्मद के संस्थापक मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित कराने में नाकामयाब रहे। हालांकि भारत, चीन की इस फितरत से पहले से परिचित था। आतंकी मसूद पर सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव पास हो जाता तो उसकी मुश्किलें बढ़ जाती। वह किसी देश की यात्रा नहीं कर पाता। हथियार नहीं खरीद सकता था। उसकी संपत्तियां जब्त हो जाती।

पुलवामा हमले के बाद भारत को पूरा भरोसा था कि वह अपनी कूटनीति के जरिये दुनिया के देशों को वैश्विक आतंकवाद की भयावहता समझाने में कामयाब होगा और मसूद को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित करवा पाएगा। लेकिन चीन खुद मसूद से डर गया। उसने चौथी बार इस पर तकनीकी अड़ंगा लगा दिया। बताने की जरूरत नहीं कि पूरी दुनिया इस्लामिक आतंकवाद से त्रस्त है। इसमें सुरक्षा परिषद से जुड़े सभी स्थाई और अस्थाई देश भी शामिल हैं।

भारत के प्रस्ताव पर चीन 2009, 2016, 2017 और अब 2019 में वीटो का प्रयोग कर चुका है। भारत में 2014 में हुए राजनीतिक बदलाव के बाद दक्षिणपंथी विचारधारा वाली भाजपा ने वामपंथी पृष्ठभूमि वाले चीन से नये संबंधों की शुरुआत की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई बार चीन की यात्रा की और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत आए।

चीन के साथ संबंधों के सुधार में भारत ने बड़ा कदम उठाया। ऐसा लगा कि एक बार फिर भारत-चीन संबंध नेहरु युग की तरफ बढ़ रहे हैं। हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा सच साबित होता दिखा। लेकिन चालबाज चीन की नीयत में कोई बदलाव नहीं आया और हमें डोकलाम में धोखा मिला। भारत ने चीन को मुंहतोड़ जवाब दिया। चीन की इस जलन की मुख्य वजह भारत और अमेरिका के बीच मजबूत दोस्ती भी है, क्योंकि चीन खुद को तीसरी शक्ति के रुप में प्रदर्शित करना चाहता है। 

वह सैन्य और आर्थिक विस्तार के जरिये पूरे दक्षिण एशिया में अपनी दादागीरी की नीति पर आगे बढ़ रहा है। वह दुनिया के बाजार पर अपना एकाधिकार चाहता है। चीन भारत की बढ़ती ताकत को खुद के लिए बड़ा खतरा मानता है। भारत जितना मजबूत होगा, दक्षिण एशिया में चीन की पकड़ उतनी ढीली होगी। इसकी वजह से वह चाहता है कि भारत अपने पड़ोसियों से उलझा रहे। यही कारण है कि वह आतंकवाद पर दोगली नीति का अनुसरण कर रहा है।

एक बात और, चीन का शिनजियांग राज्य मुस्लिम बाहुल्य है। वहां काफी संख्या में इस्लामिक चरपंथ से जुड़े लोग रहते हैं जो पाकिस्तान समर्थित हैं। 1989 में शिनजियांग राज्य के कई शहरों में विरोध-प्रदर्शन में 156 लोगों की मौत हुई थी। उसे दबाने के लिए चीन ने एक रणनीति बनायी और तालिबानी नेता मुल्लाह उमर से मुलाकात किया। उमर ने चीन को भरोसा दिलाया कि अब वहां ऐसी कोई गतिविधियां नहीं होगी।

तालिबान की उसी वफादारी का कर्ज चीन चुकाता चला आ रहा है। उसे डर है कि अगर मसूद को वैश्विक आतंकी घोषित कराने में वह भारत के साथ खड़ा होता है तो चीन में भी आतंकवाद अपनी जड़ें जमा लेगा। दूसरी तरफ चीन और पाकिस्तान को जोड़ने वाला उसका अति महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट आर्थिक गलियारे का काम प्रभावित होगा। वह गलियारा पाक अधिकृत कश्मीर से गुजर रहा है। भारत उसका विरोध कर रहा है। वह गलियारा खैबर पख्तून से गुजर रहा है जो आतंकी गढ़ है।

चीन को डर है कि अगर उसने मसूद के खिलाफ कोई कदम उठाया तो उसका ड्रीम प्रोजेक्ट खटाई में पड़ सकता है। जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी दक्षिण एशिया में विस्तारवादी नीति पर विराम लगा सकते हैं, क्योंकि वही आतंकी चीनी इंजीनियरों और मजदूरों को सुरक्षा मुहैया करा रहे हैं। उस स्थिति में चीन भला अपना हाथ क्यों जलाएगा। मसूद पर और सबूत मांगने की बात तो उसकी साजिश है। भारत सारे सबूत सौंप चुका है। संसद हमला, उरी, पठानकोट और अब पुलवामा। ... कितने सबूत चाहिए।

चीन के इस फैसले के बाद भारत में बेहद गुस्सा है। इस पर राजनीति भी शुरु हो गयी है। लेकिन इस तरह के मसलों पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। प्राथमिकता में पहले राष्ट्र है, फिर राजनीति। कहा जा रहा है कि चीनी वस्तुओं का बहिष्कार कर उसे सबक सिखाया जाए। चीन के व्यापारिक हित को जब नुकसान पहुंचेगा तो उसकी नींद खुलेगी। 

सुरक्षा परिषद को अगर वैश्विक आतंकवाद की चिंता है तो वह चीन की दादागीरी पर दूसरा रास्ता अख्तिायार कर सकता है। अमेरिका ने चीन को चेताया भी है कि उसके बगैर भी इस प्रस्ताव पर मुहर लग सकती है। सुरक्षा परिषद में अमेरिका, रुस, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन पांच स्थाई सदस्य हैं जबकि दस देश अस्थाई सदस्य हैं। प्रस्ताव पास कराने के लिए सिर्फ नौ देशों का समर्थन चाहिए।

भारत के साथ नौ से अधिक देश हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ और संबंधित देशों को इस पर तत्काल कदम उठाते हुए फैसला लेना चाहिए। इससे यूएन दुनिया को यह संदेश भी देने में कामयाब होगा कि वह वैश्विक आतंकवाद पर किसी समझौते के पक्ष में नहीं है। दूसरी तरफ पाकिस्तान को भी उसकी औकात मालूम होगी।

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इस तरह की सहमति नहीं बनती है तो संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी संस्थाओं का कोई मतलब नहीं निकलता। फिर यह मान लिया जाएगा कि शक्तिशाली देशों की चिंता आतंक पर दिखावा है। जब दुनिया यह जान गयी है कि मसूद अजहर को पाकिस्तान और चीन का खुला संरक्षण है। पाकिस्तान और चीन उसे बचाने में लगे हैं। 

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