संजीवनी टुडे

पश्चिम बंगाल पर चला चुनाव आयोग का चाबुक

-संतोष कुमार भार्गव

संजीवनी टुडे 17-05-2019 13:28:50


पश्चिम बंगाल में हो रही चुनावी हिंसा को सारा देश देख रहा है। चुनाव आयोग ने निर्धारित समय से पूर्व चुनाव प्रचार पर रोक लगाकर सख्ती दिखाई है, लेकिन अहम सवाल यह है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो के दौरान उपजे विवाद के बाद भाजपा अध्यक्ष द्वारा राज्य चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल खड़े करने पर ही चुनाव आयोग ने सक्रियता क्यों दिखायी? उससे पहले हुई हिंसा की घटनाओं पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई। जब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी चुनाव आयोग के मोदी व शाह के इशारे पर काम करने के आरोप लगाती हैं तो चुनाव आयोग की साख पर भी आंच आती है। सवाल यह भी उठाया जा रहा है कि चुनाव प्रचार पर पाबंदी लागू करने में एक दिन की ढील का क्या औचित्य है? क्या बृहस्पतिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दो रैलियों के समय को देखकर यह फैसला लिया गया? 

इस सारे घटनाक्रम के बाद चुनाव आयोग पर विपक्षी दलों को तरजीह न देने के भी आरोप लगाये जा रहे हैं। चुनाव आयोग के एक पर्यवेक्षक ने रपट दी थी कि पश्चिम बंगाल के हालात वैसे ही बन गए हैं, जैसे 15 साल पहले बिहार के होते थे। बंगाल में प्रशासन और पुलिस का इस कद्र राजनीतिकरण कर दिया गया है कि निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव संभव नहीं हैं। यदि चुनाव आयोग अपने पर्यवेक्षक की रपट पर भरोसा कर तुरंत कार्रवाई करता, तो शायद बंगाल इतना न तपता और सुलगता। बंगाल हिंसा की लपटों में जलने और विभाजक धु्रवीकरण से बच सकता था, लेकिन आयोग ने विलंब से ही सही, एक अभूतपूर्व फैसला लिया है। संभवतः संविधान के अनुच्छेद 324 का पहली बार इस्तेमाल करते हुए चुनाव प्रचार को एक दिन पहले ही रोकने का आदेश दिया है। 

असल में ममता को सबसे अधिक खतरा नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी से है। ममता भी इस खतरे को भांप रही हैं। यह अकेली ऐसी पार्टी है, जो पश्चिम बंगाल में अपना जनाधार बढ़ा रही है, जबकि सूबे की सीपीएम और कांग्रेस जैसी परंपरागत पार्टियों का जनाधार सिमट रहा है। यही वजह है कि ममता ने बीजेपी से निपटने के लिए हर मोर्चे पर कोशिशें शुरू कर दी है। स्टेट मशीनरी का भी वह अपने लिए जमकर इस्तेमाल करती दिख रही हैं। दूसरी तरफ बीजेपी भी तृणमूल को पूरी टक्कर देती दिख रही है। हाल यह है कि मतदाताओं को धमकाने की भी कोशिश की जा रही है और इसके लिए हिंसा तक का सहारा लिया जा रहा है। यहां तक कि आधी रात को लोगों को दरवाजे खटखटाकर उनकी पोलिंग ड्यूटी याद दिलाई जा रही है। कई सुदूर ग्रामीण इलाकों में तो महिलाओं को सफेद साड़ी भी दी जा रही है, जिसका संकेत यह है कि यदि आपके पति ने कहीं और वोटिंग की तो फिर वह जिंदा नहीं लौटेगा। 
टीएमसी यह मानती रही है कि वह सूबे की सभी 42 सीटों पर कब्जा जमाएगी, लेकिन यह आसान नहीं है। चुनाव जैसे-जैसे निपटने की ओर है, ममता बनर्जी का दर्द भी इस आशंका से बढ़ता जा रहा है। टीएमसी के लिए सबसे बड़ी समस्या करप्शन है। आम लोगों की बातचीत में करप्शन का दर्द उभरकर सामने आता है। लेफ्ट फ्रंट की सरकार के दौरान रिश्वतखोरी और करप्शन चलता था, लेकिन टीएमसी के दौर में यह रूटीन एक्सरसाइज बन गया है। खासतौर पर ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी भी इस करप्शन के लिए जिम्मेदार ठहराए जाते हैं। 

ममता बनर्जी ने त्वरित टिप्पणी करते हुए चुनाव आयोग के इस निर्णय को ‘अनैतिक’ और ‘असंवैधानिक’ करार दिया है। उनका आरोप है कि प्रधानमंत्री मोदी के निर्देश पर यह फैसला लिया गया है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने भी आयोग को धमकी दी थी, लेकिन इस तरह भी मोदी और भाजपा जीत नहीं सकते। ममता ने अपने ‘कपड़े फाड़’ अंदाज में इसे बंगाल अस्मिता का मुद्दा बनाने की कोशिश की है और जनता का आह्वान किया है कि मोदी को सत्ता से हटाओ३ भाजपा को एक वोट भी नहीं देना है। बहरहाल बंगाल में प्रत्येक चरण के चुनाव के दौरान हिंसा भड़कने के मद्देनजर आयोग को यह फैसला लेना पड़ा है। 

हरेक चरण के मतदान के दौरान व्यापक हिंसा ही नहीं हुई, बल्कि बूथ लूटे गए, कानून-व्यवस्था और लोकतंत्र का उल्लंघन किया गया। ऐसा लगता रहा मानो यह चुनाव नहीं, कोई जंग या गैंगवार लड़ा जा रहा हो! ममता ने भाजपा को दोषी करार दिया और भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस को ‘हिंसक’ साबित करने की शिकायतें कीं। अंततः यह निर्णय अंतिम और सातवें चरण के मतदान से पूर्व लिया गया है। चुनाव आयोग लगातार खामोश एवं सवालिया कैसे रह सकता था? सिर्फ यही नहीं, चुनाव आयोग ने प्रदेश सरकार के प्रधान गृहसचिव, गृहसचिव, पुलिस आयुक्त की छुट्टी करने का फैसला भी लिया। मुख्यमंत्री के लाडले अफसर एवं सीआईडी के एडीजी राजीव कुमार को गृह मंत्रालय में तुरंत तलब किया गया है। ममता को ऐसा एहसास हो रहा होगा मानो बंगाल में राष्ट्रपति शासन चस्पां कर दिया है! दरअसल यह निर्णय चुनाव आयोग को तब लेना पड़ा, जब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के रोड-शो के दौरान उन पर जानलेवा हमले की कोशिश की गई और उन्हीं के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई। जेड प्लस सुरक्षा के बावजूद अमित शाह को निशाना बनाया गया। उनका मानना है कि यदि सीआरपीएफ की सुरक्षा न होती, तो जिंदा बचकर निकलना मुश्किल था। यानी बंगाल ने सुरक्षा व्यवस्था में अपना दायित्व नहीं निभाया। 

विपक्षी दल नरेंद्र मोदी सरकार और भाजपा पर संविधान के हनन का आरोप लगाते रहे हैं, लेकिन इन विपक्षी दलों के नेता स्वयं विभिन्न राज्यों में संविधान की धज्जियां उड़ा रहे हैं। पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार के लिए गये अमित शाह के हेलीकॉप्टर को  उतरने की अनुमति नहीं दी तथा उनको रैलियां करने से रोकने की कोशिश की। ममता बनर्जी नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री तक मानने को तैयार नहीं है। वह नरेंद्र मोदी को देश-निकाला देने की बात करतीं हैं तो कभी अनाप-शनाप बोलकर अवमानना करती हैं। ऐसे व्यवहार से संविधान की गरिमा गिरती है। यह बड़ी गंभीर बात है, और भारत के संघीय रूप  के लिए बिल्कुल अशुभ है. चुनाव आयोग को केंद्र सरकार और विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ तालमेल करके भविष्य में चुनाव प्रचार के नये नियम निश्चित करने होंगे ताकि इसकी मर्यादाएं सुरक्षित रहें और चुनाव प्रचार के समय अराजकता न फैले।

सवाल जांच और विमर्श का है कि मूर्ति को तोड़ने की नौबत क्यों और कैसे आई? आयोग इस पर न्यायिक जांच बिठा सकता है। ममता ने इसे भी बंगाल और बंगालियों के सम्मान का मुद्दा बनाने की कोशिश की है। एक तरफ भाजपावाले ‘जय श्रीराम’ का नारा लगा रहे हैं, तो जवाब में ‘जय विद्यासागर’ की हुंकार भरी जा रही है। बंगाल में इतनी विभाजक स्थिति क्यों बनी? भाजपा कई और राज्यों में विपक्ष में है और चुनाव जीतने की होड़ वहां भी होगी, लेकिन नफरती हिंसा नहीं फैली। आखिर क्यों३? शायद ममता बनर्जी इन चुनावों में अपने राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं! ऐसा हिंसक माहौल 1977 में तब नहीं हुआ, जब आपातकाल के बाद चुनाव हुए थे। ममता ने प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह दोनों को सार्वजनिक रूप से ‘गुंडा, बदमाश’ कहा है। क्या लोकतांत्रिक भाषा यही है? बहरहाल चुनाव आयोग ने कड़ा कदम उठाते हुए हिंसा का सामूहिक रूप रोकने की कोशिश की है। मतदान भी शांति से होंगे, यही उम्मीद कर सकते हैं।

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