संजीवनी टुडे

मतदाता के निर्णय में देर है, अंधेर नहीं: सियाराम पांडेय 'शांत’

संजीवनी टुडे 16-03-2019 11:51:30


सपा-बसपा की साझा रैली उत्तर प्रदेश के देवबंद से शुरू होगी। बसपा प्रमुख मायावती मैनपुरी में मुलायम सिंह यादव का प्रचार करेंगी। दोनों ही राजनीतिक दलों के मुखिया केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार पर जमकर प्रहार करेंगे। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी जल मार्ग से काशी से प्रयागराज की यात्रा करेंगी और मार्ग में केवट-मल्लाहों और तटवर्ती गांवों के लोगों से वोट के लिए संपर्क करेंगी। वे जनता को यह बताने की कोशिश करेंगी कि मोदी और योगी ने उनके लिए कुछ नहीं किया।

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कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी देश और प्रदेश में विकास न होने के आरोप अपने हर चुनावी कार्यक्रम में लगा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में चार प्रतिशत मल्लाह हैं। बिहार, मध्यप्रदेश और समुद्र के तटवर्ती राज्यों में भी केवटों की ठीक-ठाक आबादी है। केरल, आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु में भी मछुआरों की बड़ी तादाद है।

राहुल गांधी ने दावा किया है कि अगर केंद्र में कांग्रेस सरकार बनती है तो वे अलग से मत्स्य मंत्रालय बनाएंगे। अभी तक कृषि मंत्रालय के अधीन यह विभाग हुआ करता है। मछुआरों को खुश करने के लिहाज से राहुल गांधी की यह घोषणा बेहद अहम है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या जातीय आधार पर अलग से मंत्रालय बनाए जाने चाहिए। अगर हर जाति की ओर से या खास-खास जाति की ओर से मंत्रालय बनाने की मांग उठने लगी तो लोकतंत्र का स्वरूप कैसा बनेगा, विचार तो इस पर भी होना चाहिए।

कांग्रेस समेत हर विपक्षी दल सवाल उठा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोई काम नहीं किया है। इसके जवाब में उत्तर प्रदेश के हर घर में योगी सरकार 22 माह की उपलब्धियों की लघु पत्रिका भिजवा रही है। इसमें विपक्ष के हर सवालों का जवाब है। 'हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फारसी क्या ' का निनाद इसमें महसूस किया जा सकता है।

इसका मतलब साफ है कि उत्तर प्रदेश या देश के किसी भी राज्य में भाजपा विकास के मुद्दे पर ही चुनाव मैदान में जाना पसंद करेगी। योगी सरकार की पुस्तिका में यह बताने का प्रयास हुआ है कि प्रधानमंत्री आवास योजना चाहे वह शहरी क्षेत्र की हो या ग्रामीण क्षेत्र की, उत्तर प्रदेश पूरे देश में अव्वल है। स्वच्छ भारत मिशन, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों की स्थापना में नंबर वन है। कौशल विकास नीति लागू करने वाला उत्तर प्रदेश देश का पहला राज्य है।

आयुष्मान भारत योजना के अंतर्गत उत्तर प्रदेश के 6 करोड़ लोगों को प्रतिवर्ष 5 लाख रुपये की चिकित्सा सुविधा देने, 2329 उपकेंद्रों को हेल्थ एवं वेलनेस सेंटर के रूप में सुदृढ़ करने का निर्णय यह तो बताता ही है कि सरकार की समाज हित में कुछ करने की इच्छाशक्ति तो है।

प्रधानमंत्री जन धन योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, प्रधानमंत्री मुद्रा योजना, प्रधानमंत्री जीवन ज्योति योजना, अटल पेंशन योजना, किसान कल्याण योजना, खाद्यान्न योजना, बाण सागर परियोजना का लोकार्पण, बुंदेलखंड के पहुंच बांध, पहाड़ी बांध, गंटा बांध, पथरई बांध, लहचुरा बांध और मौदहा बांध की पूर्णता भी विपक्ष के कुछ काम न करने के आरोपों पर सवाल तो उठाती ही है।

सरयू नहर परियोजना, मध्य गंगा नहर परियोजना, अर्जुन सहायक परियोजना पर निरंतर चल रहा काम दिखता तो है ही। पूर्वांचल एक्सप्रेस वे, बुंदेलखंड एक्सप्रेस वे का निर्माण कार्य केंद्र और राज्य सरकार की इच्छा शक्ति की अभिव्यक्ति है। हाल ही में प्रधानमंत्री, केंद्रीय वित्त मंत्री, रेल मंत्री और केंद्रीय परिवहन मंत्री ने कई बड़ी योजनाओं का शिलान्यास और लोकार्पण किया है। इसे काम न होना तो नहीं कहा जा सकता या इसे कार्यशून्यता की दृष्टि से तो नहीं देखा जा सकता। 

मानव मन की फितरत यह है कि वह दूसरों से अपने हर प्रश्न का उत्तर तो पाना चाहता है लेकिन खुद जवाबदेह नहीं बनता। जवाब देना शायद उसे पसंद नहीं। इस मामले में उसकी प्रवृत्ति 'मन लेहु पर देहु छटांक नहीं' वाली ही है। उत्तर देने का मतलब है कि खुद को खोलना। खुलना बेहद कठिन भी है और बहुत सरल भी, लेकिन सरलता का मार्ग हमें पसंद नहीं। सरलता को मानव समाज दोष समझ बैठता है। जटिल होना नेता होने की पहली शर्त है।

राजनीति में किसी भी सवाल का सीधा जवाब देने की परंपरा नहीं है। गुलामी से मुक्ति के बाद लोकतंत्र के शुरुआती दिनों में जरूर राजनीतिक सवालों के जवाब पूरी ईमानदारी से दिए जाते थे लेकिन अब वह बात नहीं रही। अब कोई भी राजनीतिक दल सीधे तौर पर जवाब नहीं देना चाहता। सवाल पूछे ही इसलिए जाते हैं कि जवाब मिले, लेकिन जवाब कैसे देना है, यह उत्तरदाता पर निर्भर करता है।

मौजूदा लोकसभा में विपक्ष का एक भी दल ऐसा नहीं है जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अपने चुनावी वादों को पूरा न करने के आरोप न लगा रहा हो। सभी का तर्क है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपना एक भी वादा पूरा नहीं किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी टीम यह बताने में भी जुटी है कि उसने क्या किया है और जो लोग उनकी सरकार पर नाकारापन का आरोप लगा रहे हैं, उन्होंने क्या किया है जबकि सत्ता में तो वे भी रहे हैं। राजनीति तुलनात्मक, रचनात्मक और गुणात्मक होनी चाहिए।

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जनहित का तकाजा भी यही है लेकिन आजकल तुलना बर्दाश्त नहीं की जाती। कोई नहीं चाहता कि उसकी किसी के साथ कोई तुलना हो। नेता खुद को अतुलनीय मानते हैं। 'परम स्वतंत्र न सर पर कोई।' लंका में सभी बावन हाथ के थे। राजनीति से जुड़े लोगों को सामान्य बुद्धि से समझा नहीं जा सकता। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने एक नारा दिया था- दूर दृष्टि, पक्का इरादा। दूर दृष्टि मतलब दूर तक देखना। विवेक युक्त बुद्धि के साथ देखना। इस देखने में जानना-समझना शामिल होता है। दूर दृष्टि किसी वस्तु, स्थिति का विहंगावलोकन हरगिज नहीं होती।

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