संजीवनी टुडे

ईवीएम को लेकर अनावश्यक विवाद: योगेश कुमार गोयल

संजीवनी टुडे 17-04-2019 14:16:17


विगत दिनों जब सुप्रीम कोर्ट ने ईवीएम के मतों की वीवीपैट पर्चियों से मिलान की संख्या एक से बढ़ाकर पांच करने का निर्णय सुनाया था तो उम्मीद जगी थी कि इस निर्णय के बाद ईवीएम को लेकर विवाद शांत हो जाएगा। लेकिन प्रथम चरण के मतदान के बाद जिस प्रकार 21 विपक्षी दलों ने एकजुट होकर एक बार फिर ईवीएम में गड़बड़ियों के आरोप लगाकर सारा ठीकरा चुनाव आयोग पर फोड़ते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाने की बात कही है, उससे साफ हो गया है कि लोकसभा चुनाव के परिणाम आने तक तो ईवीएम राग शांत नहीं होने वाला है। फिलहाल सारा विवाद पहले चरण के मतदान के तुरंत बाद तब खड़ा हुआ, जब आंध्रप्रदेश की 25 लोकसभा सीटों और 175 विधानसभा सीटों पर मतदान हुआ और मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू द्वारा आशंका जताई जाने लगी कि उनके राज्य में चुनाव प्रक्रिया में काफी गड़बड़ियां हुई हैं।

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दरअसल देश में चुनावों के दौरान कुछ वर्षों से यही ट्रैंड बन चुका है कि कहीं भी हार की स्थिति दिखाई देने पर विपक्षी दलों द्वारा ईवीएम को दोषी ठहराकर सारा ठीकरा ईवीएम पर ही फोड़ दिया जाता है। हर राजनीतिक दल द्वारा अपनी हार के लिए नये-नये बहाने तलाशने की कोशिश की जाती है। पिछले कुछ समय से इसके लिए ईवीएम ही तमाम राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ा हथियार बना है। ये वही ईवीएम हैं, जिन्होंने पिछले साल पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान तीन में कांग्रेस को सत्ता के पायदान तक पहुंचाया। तब विपक्षी दलों के ईवीएम विरोधी स्वर खामोश हो गए थे।

ऐसे में हर बार चुनावी प्रक्रिया के दौरान ही ईवीएम के विरोध का औचित्य समझ से परे है। तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त ओमप्रकाश रावत बैलेट पेपर से मतदान कराए जाने की मांग पर अपने कार्यकाल के दौरान कह चुके हैं कि जो भी दल हारता है, वह किसी को तो जिम्मेदार ठहराता ही है। जिस प्रकार खेल में हारने पर रैफरी को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है, उसी प्रकार चुनाव में हारने पर ईवीएम को जिम्मेदार ठहराया जाता है।

चुनाव आयोग तमाम दलों को कई बार ईवीएम में गड़बड़ी साबित करने या ईवीएम हैक करके दिखाने की चुनौती दे चुका है। लेकिन हर बार चुनावों के दौरान ईवीएम का बेसुरा राग अलापने वाले राजनीतिक योद्धा ऐसी चुनौती स्वीकारने की बजाय अपनी भूमिका ईवीएम को कोसने तक ही सीमित रखते हैं। इस तथ्य को कैसे नजरअंदाज किया जा सकता है कि चुनाव के लिए नामांकन भरते समय तमाम दलों के प्रत्याशियों द्वारा ईवीएम से चुनाव कराए जाने पर सहमति प्रकट की जाती है किन्तु जनता को बरगलाने के लिए ईवीएम को लेकर अनावश्यक विवाद खड़ा करने की कोशिशें की जाती हैं।

यह हाल तो तब है जबकि कई अवसरों पर न केवल चुनाव आयोग बल्कि सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका है कि ईवीएम से बेहतर और कोई चुनावी प्रक्रिया नहीं है। हालांकि तमाम आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच यह चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि लोकसभा के बाकी चरणों के मतदान के दौरान ईवीएम में गड़बड़ी के मामले सामने न आएं।

हालांकि कई बार मतदान प्रक्रिया के दौरान ईवीएम में खराबी के कुछ मामले सामने आते हैं लेकिन ऐसे मामलों को ईवीएम में छेड़छाड़ या हैकिंग जैसे आरोपों से जोड़ना कदापि उचित नहीं ठहराया जा सकता। वैसे ईवीएम को लेकर चुनाव आयोग द्वारा यह स्पष्ट किया जा चुका है कि ईवीएम के फेल होने का प्रतिशत महज 0.6 फीसदी ही है। दरअसल किसी भी इलैक्ट्रॉनिक मशीन में कभी भी खराबी आना संभव है। ऐसे में अगर ईवीएम में आने वाली खराबियों के समाधान को लेकर विपक्षी दलों द्वारा आवाज उठाई जाती तो उसका स्वागत होता। लेकिन ईवीएम के बजाय बैलेट पत्र से चुनाव कराए जाने की मांग को पूर्णतया अव्यावहारिक बताते हुए अदालत भी पहले इसे नकार चुकी है।

चुनाव के दौरान मतपत्रों के इस्तेमाल की मांग कर विपक्षी दल देश को कौन-से पुराने युग में ले जाने की बातें कर रहे हैं? आधुनिकीकरण में हम अब इतने आगे निकल चुके हैं कि मतपत्रों के युग में वापस लौटना असंभव है। वैसे भी इस प्रकार की मांग उठाते वक्त हमें इस तथ्य को भी ध्यान में रखना चाहिए कि मतपत्रों से चुनाव कराने के लिए हमें हर चुनाव के लिए कितनी बड़ी संख्या में पेड़ काटने पड़ेंगे और ऐसी स्थिति में पर्यावरण की क्या दुर्दशा होगी। हम इस तथ्य को भी नजरअंदाज नहीं कर सकते कि चुनावी प्रक्रिया में ईवीएम के इस्तेमाल के बाद से ही निरस्त मतों की संख्या में अभूतपूर्व गिरावट देखने को मिली है। 

कुछ ही माह पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह धारणा गलत है कि ईवीएम की बजाय मतपत्रों के जरिये चुनाव ज्यादा विश्वसनीय है। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई का कहना था कि हर मशीन के ठीक या गलत होने की संभावना रहती है। यह उपयोग करने वालों पर निर्भर करता है कि वे उसका कैसे इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में ईवीएम के सही इस्तेमाल की जिम्मेदारी और जवाबदेही अब चुनाव आयोग तथा संबंधित अधिकारियों की ही है।

हालांकि हम इस तथ्य की अनदेखी नहीं कर सकते कि ईवीएम के जरिये चुनाव कराने की प्रक्रिया में क्रांतिकारी बदलाव आए हैं। अब ईवीएम के साथ वीवीपैट का इस्तेमाल होता है, जिसके जरिये मतदाता अपने मत का प्रयोग करते हुए स्वयं यह देखकर आश्वस्त हो सकता है कि उसका मत उसी उम्मीदवार को गया है या नहीं जिसके लिए उसने ईवीएम का बटन दबाया है। ऐसे में ईवीएम मशीनों को वीवीपैट से जोड़े जाने के बाद ईवीएम में छेड़छाड़ कर चुनावी नतीजों में हेरफेर की संभावना लगभग खत्म हो गई है।

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ईवीएम को देश की मतदान प्रणाली में एक क्रांतिकारी बदलाव के रूप में देखा गया है। इससे जहां देश के हर क्षेत्र में और यहां तक कि आतंकवाद प्रभावित इलाकों में भी मतदान प्रतिशत बढ़ता गया। मतों की गिनती में लगने वाला कई-कई दिनों का समय चंद घंटों में सिमट गया। बूथों पर कब्जे की घटनाएं अप्रत्याशित रूप से बेहद कम हो गईं तथा ईवीएम के इस्तेमाल से निरस्त होने वाले मतों की संख्या में काफी कमी आई है। 

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