संजीवनी टुडे

अशांति अंधेरा है और शांति उजाला है

ललित गर्ग

संजीवनी टुडे 20-09-2018 12:29:09


विश्व शांति दिवस अथवा अंतरराष्ट्रीय शांति दिवस प्रत्येक वर्ष 21 सितम्बर को मनाया जाता है। यह दिवस सभी देशों और लोगों के बीच स्वतंत्रता, शांति, अहिंसा और खुशी का एक आदर्श माना जाता है। यह दिवस मुख्य रूप से पूरी पृथ्वी पर शांति और अहिंसा स्थापित करने के लिए मनाया जाता है। शांति सभी को प्यारी होती है। अहिंसा एवं शांति जीवन का सौन्दर्य है। इसकी खोज में मनुष्य अपना अधिकांश जीवन न्यौछावर कर देता है। किंतु यह काफी निराशाजनक है कि आज इंसान दिन-प्रतिदिन इस शांति से दूर होता जा रहा है। आज चारों तरफ फैले बाजारवाद ने शांति एवं अहिंसा को व्यक्ति से और भी दूर कर दिया है।  मनुष्य, पशु, पक्षी, कीड़े, मकोड़े आदि सभी जीना चाहते हैं। कोई मरने की इच्छा नहीं रखता। जब कोई मृत्यु चाहता ही नहीं, तो उस पर उसको थोपना कहां का न्याय है। शांति एवं अहिंसा में विश्वास रखने वाले लोग किसी प्राणी को सताते नहीं, मारते नहीं, मर्माहत करते नहीं, इसी में से अहिंसा एवं शांति का तत्त्व निकला है। अहिंसा है स्वयं के साथ सम्पूर्ण मानवता को  मानवता को ऊपर उठाने में, आत्मपतन से बचने में और उससे किसी को बचाने में। अशांति अंधेरा है और शांति उजाला है। आंखें बंद करके अंधेरे को नहीं देखा जा सकता। इसी प्रकार अशांति से शांति को नहीं देखा जा सकता। शांति को देखने के लिए आंखों में अहिंसा का उजाला आंजने की अपेक्षा है। पृथ्वी, आकाश व सागर सभी अशांत हैं। स्वार्थ और घृणा ने मानव समाज को विखंडित कर दिया है। यूँ तो ‘विश्व शांति’ का संदेश हर युग और हर दौर में दिया गया है, लेकिन इसकी आज अधिक प्रासंगिकता है।

सम्पूर्ण विश्व में शांति कायम करना आज संयुक्त राष्ट्र का मुख्य लक्ष्य है। संयुक्त राष्ट्र चार्टर में भी इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि अंतरराष्ट्रीय संघर्ष को रोकने और शांति की संस्कृति विकसित करने के लिए ही यूएन का जन्म हुआ है। संघर्ष, आतंक और अशांति के इस दौर में अमन की अहमियत का प्रचार-प्रसार करना बेहद जरूरी और प्रासंगिक हो गया है। इसलिए संयुक्त राष्ट्रसंघ, उसकी तमाम संस्थाएँ, गैर-सरकारी संगठन, सिविल सोसायटी और राष्ट्रीय सरकारें प्रतिवर्ष इस दिवस का आयोजन करती हैं। शांति का संदेश दुनिया के कोने-कोने में पहुँचाने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने कला, साहित्य, सिनेमा, संगीत और खेल जगत की विश्वविख्यात हस्तियों को शांतिदूत भी नियुक्त कर रखा है। 
भारत अहिंसा एवं शांति को सर्वाधिक बल देने वाला देश है, यहां की रत्नगर्भा माटी ने अनेक संतपुरुषों, ऋषि-मनीषियों को जन्म दिया है, जिन्होंने अपने त्याग एवं साधनामय जीवन से दुनिया को अहिंसा एवं शांति का सन्देश दिया। महात्मा गांधी ने अहिंसा एवं शांति पर सर्वाधिक बल दिया। पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने विश्व में शांति और अमन स्थापित करने के लिए पाँच मूल मंत्र दिए थे, इन्हें ‘पंचशील के सिद्धांत’ भी कहा जाता है। मानव कल्याण तथा विश्व शांति के आदर्शों की स्थापना के लिए विभिन्न राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक व्यवस्था वाले देशों में पारस्परिक सहयोग के ये पंचशील के पाँच आधारभूत सिद्धांत हैं-एक दूसरे की प्रादेशिक अखंडता और प्रभुसत्ता का सम्मान करना, एक दूसरे के विरुद्ध आक्रामक कार्यवाही न करना, एक दूसरे के आंतरिक विषयों में हस्तक्षेप न करना, समानता और परस्पर लाभ की नीति का पालन करना एवं शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की नीति में विश्वास रखना। माना जाता है अगर विश्व उपरोक्त पाँच बिंदुओं पर अमल करे तो हर तरफ चैन और अमन, अहिंसा एवं शांति का ही वास होगा।
‘विश्व शांति दिवस’ के उपलक्ष्य में हर देश में जगह-जगह सफेद रंग के कबूतरों को उड़ाया जाता है, जो कहीं ना कहीं ‘पंचशील’ के ही सिद्धांतों को दुनिया तक फैलाते हैं। एक शायर का निम्न शेर बहुत ही विचारणीय है-लेकर चलें हम पैगाम भाईचारे का, ताकि व्यर्थ खून न बहे किसी वतन के रखवाले का। आज कई लोगों का मानना है कि विश्व शांति को सबसे बड़ा खतरा साम्राज्यवादी आर्थिक और राजनीतिक कुचेष्टाओं से है। विकसित देश युद्ध की स्थिति उत्पन्न करते हैं, ताकि उनके सैन्य साजो-समान बिक सकें। यह एक ऐसा कड़वा सच है, जिससे कोई इंकार नहीं कर सकता। आज सैन्य साजो-सामान उद्योग विश्व में बड़े उद्योग के तौर पर उभरा है। आतंकवाद को अलग-अलग स्तर पर फैलाकर विकसित देश इससे निपटने के हथियार बेचते हैं और इसके जरिये अकूत संपत्ति जमा करते हैं।  
आज प्रत्येक व्यक्ति को यह समझना होगा कि इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है। मानव कल्याण की सेवा से बढ़कर कोई धर्म नहीं है। भाषा, संस्कृति, पहनावे भिन्न-भिन्न हो सकते हैं, लेकिन विश्व के कल्याण का मार्ग एक ही है। मनुष्य को नफरत का मार्ग छोड़कर प्रेम के मार्ग पर चलना चाहिए। इस अपेक्षा को ध्यान में रखकर ही अहिंसक समाज रचना के दो उद्देश्य सामने आये- अहिंसक चेतना का जागरण एवं नैतिक मूल्यों का विकास।

हिंसा एवं अशांति विश्व की एक ज्वलन्त समस्या है। अहिंसा एवं शांति ही इस समस्या का समाधान है। भारतीय संस्कृति के घटक तत्वों में अहिंसा भी एक है। यहां सभी धर्मों के साधु-संन्यासी अहिंसा का उपदेश देते रहे हैं। केवल उपदेश से अहिंसक चेतना का जागरण हो जाता तो भारत में हिंसा की कोई समस्या टिक ही नहीं पाती। देश में बढ़ रही हिंसक वारदातों और आतंकवादी दुर्घटनाओं का अध्ययन करके उस मनोवृत्ति का पता लगाना चाहिए, जिसके कारण मनुष्य हिंसा में प्रवृत्त होता है। इस संदर्भ में आचार्य श्री महाप्रज्ञ का कथन समस्या के स्थायी समाधान की दिशा प्रशस्त करने वाला है। उन्होंने अपनी अहिंसा यात्रा के दौरान बार-बार इस बात को दोहराया था कि वे अपनी यात्रा में हिंसा के कारणों की खोज कर रहे हैं।
भगवान महावीर का दर्शन अहिंसा का दर्शन है। अहिंसा, समता, मैत्री, करुणा, संयम, उपशम आदि शब्द एक ही अर्थ को अभिव्यंजना देने वाले हैं। आचार्य विनोबा भावे एक बार पैदल यात्रा करते हुए अजमेर पहुंचे। वहां उन्हें एक परिचित अमेरिकी मिला। वह बोला-मैं अपने देश जा रहा हूं। आप मेरे देश के नागरिकों के लिए कोई संदेश दें। विनोबाजी दो क्षण गंभीर होकर सोचते रहे, फिर बोले-मैं एक छोटा आदमी हूं। तुम्हारा देश बहुत बड़ा है। मैं उसके लिए क्या संदेश दे सकता हूं। अमेरिकी ने आग्रह किया तो विनोबाजी ने कहा-‘मैं चाहता हूं कि आपके देश में तीन सौ चैंसठ दिन कारखानों में हथियार बनाए जाएं। भयंकर से भयंकर हथियार बनाए जाएं। क्योंकि आपके नागरिकों और कारखानों को काम चाहिए। काम नहीं होगा तो बेरोजगारी बढ़ेगी। इसलिए जितने बना सको, हथियार बनाओ। पर तीन सौ पैंसठवें दिन उन्हें समुद्र में फेंक देना।’ अमेरिकन व्यक्ति विनोबाजी की बात सुन हक्का-बक्का रह गया। यह ऐसा यथार्थ है, जो बढ़ती हुई हिंसात्मक मनोवृत्ति को उजागर करता है और साथ ही इस सत्य से पर्दा भी उठाता है कि हिंसा का समाधान हिंसा नहीं है। 
अशांति एवं हिंसा के बाह्य कारणों में मुख्य रूप से दो कारण सामने आते हैं-अर्थ का अभाव और अर्थ का प्रभाव। अभाव की स्थिति में आदमी आक्रामक बन जाता है, इसी प्रकार अतिभाव से उत्पन्न विलासिता भी व्यक्ति को हिंसा की अंधेरी सुरंग में उतार देती है। जिस समाज या राज्य व्यवस्था में उक्त समस्या के समाधान का प्रयास नहीं होता, वहां मनुष्य की वृत्तियों में पशुता या दानवता का प्रवेश हो जाता है। वर्तमान युग की एक बड़ी समस्या है अहिंसा में आस्था का अभाव। जिस राष्ट्र की जनता को विरासत में अहिंसा के संस्कार प्राप्त हैं, जिस देश को समय-समय पर महावीर, बुद्ध, गांधी जैसे महापुरुषों के द्वारा अहिंसा का संदेश मिलता रहा है, उस देश की जनता हिंसा में विश्वास करे, इससे अधिक विडम्बना क्या होगी?
अहिंसा सव्वभूयखेमंकरी-विश्व के समस्त प्राणियों का कल्याण करने वाली तेजोमयी अहिंसा की ज्योति पर जो राख आ गई, उसे दूर करने के लिए तथा अहिंसा की शक्ति पर लगे जंग को उतार कर उसकी धार को तेज करने के लिए अहिंसक समाज रचना की जरूरत है। आज लोग सोचते हंैै-हिंसा, हथियार, संहार या समता चाहे जिस तरह से शांति मिले, वह मिले, वे अपना लक्ष्य शांति को समझते हैं। वह अहिंसा से मिले तो ठीक वरना हिंसा से ही लक्ष्य तक पहुंचा जाए। भूल का प्रारंभ यहीं से होता है। वास्तविकता यह है कि अशांति से कभी शांति नहीं लाई जा सकती। विषमता से कभी समता नहीं आती। किसी को दुःखी बनाकर सुख नहीं पाया जा सकता। शांति, समता और सुख के लिए अपने आपको जगाना होगा, आंतरिक शुद्धि का विकास करना होगा। सर्वसाधारण के लिए पूर्ण अहिंसक बनना संभव  नहीं है, फिर भी वे इसे आदर्श मानकर आगे बढ़े। अपनी अशक्यता से की जानेवाली हिंसा को हिंसा समझें। एक दुकानदार सोचता है-‘आज सुबह-सुबह कोई ऐसा ग्राहक मिले, जिससे एक साथ ही अधिक लाभ हो जाए।’ यह ठगाई की वृत्ति हिंसा है। राज कर्मचारी सोचते हैं कि तनख्वाह कम मिलती है। परिवार बड़ा है। शान-शौकत से रहना पड़ता है। अच्छा हो कि कोई चिड़िया हाथ लगे और अच्छी-खासी रिश्वत मिले। कुछ लोग प्रश्न करते हैं कि क्या यह संभव है कि सारी दुनिया अहिंसक बन जाएगी? सारी दुनिया न कभी अहिंसक बनी और न कभी बनेगी। लाख प्रयास करने पर भी हिंसा का अभाव नहीं हुआ तो अहिंसा का भी कभी लोप नहीं हुआ। कभी अहिंसा का पलड़ा ऊंचा रहा और कभी हिंसा का। आज हिंसा का पलड़ा भारी है। वह हल्का बने, उसे हल्का किया जाए। हिंसा एवं अशांति के प्रतिरोध में शांति एवं अहिंसा दिवस का आयोजना के बारे में कुछ लोग कह सकते है-ंएक दिन शांति एवं अहिंसा-दिवस मना भी लिया तो क्या हुआ? लेकिन शांति एवं अहिंसा दिवस बनाने की बहुत सार्थकता है, उपयोगिता है, इससे अंतर-वृत्तियां उद्बुद्ध होंगी, अंतरमन से अहिंसा-शांति को अपनाने की आवाज उठेगी और हिंसा-अशांति में लिप्त मानवीय वृत्तियों में अहिंसा एवं शांति आएगी। 

यह लेखक के स्वयं के विचार है। 

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