संजीवनी टुडे

तीन तलाक कानून पर नकली आंसू बहा रहे हैं विपक्षी दल

रमेश सर्राफ धमोरा

संजीवनी टुडे 02-08-2019 14:54:18

मुस्लिम महिलाओं से एक साथ तीन तलाक को अपराध करार देने वाले ऐतिहासिक विधेयक को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अपनी मंजूरी दे दी। राष्ट्रपति के इस विधेयक पर हस्ताक्षर करने के साथ ही मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक अब कानून बन गया है। इस कानून को 19 सितंबर 2018 से लागू माना जाएगा।


मुस्लिम महिलाओं से एक साथ तीन तलाक को अपराध करार देने वाले ऐतिहासिक विधेयक को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अपनी मंजूरी दे दी। राष्ट्रपति के इस विधेयक पर हस्ताक्षर करने के साथ ही मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक अब कानून बन गया है। इस कानून को 19 सितंबर 2018 से लागू माना जाएगा।

इससे पहले मंगलवार को राज्यसभा ने मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक को अपनी स्वीकृति दी थी। संसद के उच्च सदन राज्यसभा में मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक के पक्ष में 99 वोट पड़े जबकि 84 सांसदों ने इसके विरोध में मतदान किया था। इससे पहले विपक्ष द्वारा बिल को सलेक्ट कमेटी के पास भेजने का प्रस्ताव भी 100 के मुकाबले 84 वोटों से गिर गया था। राष्ट्रपति से मंजूरी मिलने के बाद इस कानून ने अब तीन तलाक को लेकर 21 फरवरी को जारी किए गए मौजूदा अध्यादेश की जगह ले ली है।

राज्यसभा में बहुमत नहीं होने के बावजूद सरकार ने तीन तलाक बिल पास करवा कर जहां विपक्ष की एकता को तो तोड़ा ही है साथ ही राज्यसभा में बेहतर फ्लोर मैनेजमेंट कैसे किया जाता है यह भी बता दिया है। इस बिल के पास होने से विपक्षी दल संख्या बल अधिक होने के उपरान्त भी सरकार के सामने कमजोर पड़ गये । प्रधानमंत्री मोदी ने 15 अगस्त 2018 को मुस्लिम महिलाओं को लालकिले से सम्बोधित करते हुये शिघ्र ही तीन तलाक बिल पास करवाकर कानून बनाने का वादा किया था। मोदी चाहते थे कि आगामी 15 अगस्त से पहले किसी भी तरह तीन तलाक कानून बनाकर अपना वादा निभायें। इसीलिये उन्होने नयी लोकसभा के प्रथम सत्र में ही तीन तलाक बिल को पेश करवा दिया था।

सरकार ने लोकसभा में तो विपक्ष के विरोध के बावजूद आसानी से तीन तलाक बिल पास करवा लिया था मगर राज्य सभा में कम संख्या बल के चलते इसे पास करवाना मुश्किल लग रहा था। उपर से एनडीए में सरकार के साथ जुटे जनता दल (यू) व अन्नाद्रुमक ने भी बिल का विरोध करने की घोषणा कर दी थी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व गृह मंत्री अमित शाह बिल पास करवाने को लेकर बहुत गम्भीर थे। उन्होने व्यक्तिगत रूप से विपक्षी दलों के नेताओं से बात कर उनको बिल पर मतदान के समय राज्यसभा से बहिर्गमन करने को तैयार कर लिया। उन्होने बीजू जनता दल के नेता नवीन पटनायक को बिल का समर्थन करने को तैयार कर लिया जिनके राज्यसभा में सात सांसद हैं।

उन्होने जनता दल (यू) के 6, अन्नाद्रुमक के 11, तेलंगाना राष्ट्र समिति के 6 व पीएमके के एक सदस्य को सदन से अनुपस्थित रहने को तैयार कर लिया ताकि 24 सदस्यो की अनुपस्थिति का फायदा सरकार को मिले। इस तरह सरकार के पास 102 सदस्यों का समर्थन हो गया जबकि विपक्षी दलो के खेमें में 111 सदस्य थे। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस की सोच थी कि हर प्रदेश में मुस्लिम वोट प्रभावकारी है ऐसे में कोई भी सेक्युलर पार्टी मुस्लिम वोटरो को नाराज कर तीन तलाक विधेयक को पास नहीं करवायेगी। मगर जब बिल पर राज्यसभा में मतदान हुआ तो सरकार के पक्ष में 99 व विपक्ष को 84 वोट मिले व तीन तलाक बिल बहुमत से पास हो गया।

तीन तलाक बिल पास होने से विपक्षी दलो की हालत खराब हो रही है। उनको जवाब देते नहीं बन रहा है। राज्यसभा में मतदान के वक्त विपक्षी दलों के कई नेता नदारद थे। कांग्रेस के एक सदस्य डा. संजय सिंह ने मतदान से ठीक पहले राज्यसभा की सदस्यता से त्यागपत्र देकर कांग्रेस को झटका दिया था। सियासी वाद-विवाद का केंद्र बने इस बिल पर विपक्ष के कमजोर प्रबंधन का आलम यह था कि मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस खुद सदन में अपने सभी सांसदों की उपस्थिति सुनिश्चित नहीं करा पाई। कांग्रेस के चार सांसदों विवेक तन्खा, मुकुट मिथी, प्रताप सिंह बाजवा और रंजीत बिस्वाल के अलावा कांग्रेस से ही संबद्ध मनोनीत सदस्य केटीएस तुलसी तीन तलाक बिल पर मतदान के दौरान सदन में मौजूद नहीं थे।

विधेयक को लेकर विपक्षी खेमे का नेतृत्व कर रही कांग्रेस के लिए पार्टी व्हिप के बावजूद अपने ही सांसदों के गैर-हाजिर होने से असहज होना स्वाभाविक है। इसीलिए पार्टी ने इन सांसदों से मतदान के दौरान सदन में मौजूद नहीं होने की वजह बताते हुए स्पष्टीकरण देने को कहा है। बसपा के चारों सदस्य गायब थे जबकि मतदान से पूर्व चर्चा में बसपा जमकर बिल का विरोध कर रही थी। एनसीपी नेता शरद पवार व प्रफुल पटेल अनुपस्थित रहे।

मुस्लिमो की राजनीति करने वाली जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की पार्टी के दोनो सदस्यों ने मतदान में भाग नहीं लिया। इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के एकमात्र सदस्य ने भी मतदान नहीं किया। तेलुगु देशम पार्टी के बाकी बचे दानो सदस्यों ने भी मतदान नहीं किया। देवेगौड़ा के जनता दल (सेक्युलर) के एकमात्र सदस्य ने भी वोट नहीं डाला जबकि हाल ही में भाजपा ने उनके बेटे को मुख्यमंत्री पद से हटाया था। समाजवादी पार्टी के पांच, आरजेडी के राम जेठमलानी, द्रुमक का एक व ममता बनर्जी की पार्टी के केडी सिंह व कांग्रेस द्धारा नामित के टी तुलसी ने भी वोट नहीं डाला।

अब तीन तलाक कानून बन गया है तो मुस्लिम नेताओं ने विपक्ष पर सरकार से मिलीभगत कर बिल पास करवाने का आरोप लगा रहे हैं। इससे विपक्ष के नेता बचाव की मुद्रा में आ गये हैं। राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलामनबी आजाद अब कह रहे हैं कि उनको समय पर तीन तलाक बिल पेश होने की सूचना नहीं मिली। आजाद तो उल्टा सरकार पर ही आरोप लगा रहे हैं कि सरकार ने गुमराह करके बिल पास करवाया है। मगर उनके पास इस बात को कोई जवाब नहीं है कि विपक्ष के जो सदस्य बहस में शामिल थे वो मतदान के वक्त अचानक कहां चले गये व कांग्रेस के सदस्य कैसे अनुपस्थित रहे?

तीन तलाक पर कानून बन चुका है विपक्ष के नेता चाहे जो बयानबाजी कर अपनी गलती छुपाने का प्रयास करें मगर इस बात से वो इंकार नहीं कर सकते की सरकार की बजाय उनका फ्लोर मैनेजमेंट बहुत कमजोर था। इस बिल के पास होने से विपक्षी दलों के नेताओं के पास कोई रास्ता नहीं बचा हैं। बिल पास होने से तीन तलाक कानून का विरोध कर रहे मुस्लिम नेता इनसे नाराज हैं ही उपर से बिल का विरोध करने से मुस्लिम समाज की महिलायें भी विपक्षी दलों से नाराज है। बिल की मंजूरी से विपक्ष की कमजोर रणनीति भी उजागर हुई।

इस विधेयक का तीखा विरोध करने वाली कांग्रेस कई अहम दलों को अपने साथ बनाए रखने में असफल रही। राज्यसभा में यह बिल पास होना सरकार के लिए बड़ी कामयाबी माना जा रहा है क्योंकि उच्च सदन में अल्पमत में होने के चलते उसके लिए इस बिल को पास कराना मुश्किल था। अब कांग्रेस चाहे कितने ही नकली आंसू बहायें राज्यसभा में पार्टी की पोल खुल गयी है कि विपक्षी दलों के सांसदो पर उनका नियंत्रण नहीं हैं। क्षेत्रीय दलों ने इस हफ्ते कांग्रेस से कई बार किनारा किया। ऐसे में कहा जा सकता है कि यह कांग्रेस के लिए यह निराशा का दौर है।

देश की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ससंद में ऐसे लड़ रही है जैसे यह उसके अस्तित्व की लड़ाई हो। वर्तमान परिस्थितियों में कांग्रेस को अकेला पडऩे का डर सता रहा है। राज्यसभा में तो कांग्रेस का दबदबा पिछले हफ्ते ही खतम हो गया था जब कांग्रेस के पूरा जोर लगाने के बावजूद सूचना का अधिकार कानून संशोधन विधेयक पास हो गया था। राज्यसभा में तीन तलाक बिल पर वोटिंग के वक्त क्षेत्रीय दलों के रवैये से कुछ अलग ही संकेत मिल रहे हैं। राज्यसभा में अक्सर कांग्रेस के साथ खड़ा रहने वाले दल तीन तलाक बिल पर कांग्रेस को गच्चा दे गये। राज्यसभा में लगातार घट रहे घटनाक्रम ने जहां कांग्रेस की बैचेनी बढ़ा दी है वहीं इसको भाजपा के बढ़ते प्रभाव के रूप में देखा जा रहा है।

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