संजीवनी टुडे

भूख और गरीबी के खिलाफ जंग जारी है

बाल मुकुंद ओझा

संजीवनी टुडे 15-10-2019 14:55:22

विश्व खाद्य दिवस 16 अक्टूबर 1981 से प्रतिवर्ष मनाया जाता है। इसका उद्देश्य दुनिया को गरीबी कुपोषण और भुखमरी से मुक्ति दिलाने के साथ खाद्य सुरक्षा तथा लोगों की स्थिति के बारे में जागरूकता फैलाना है।


विश्व खाद्य दिवस 16 अक्टूबर 1981 से प्रतिवर्ष मनाया जाता है। इसका उद्देश्य दुनिया को  गरीबी कुपोषण और भुखमरी से मुक्ति दिलाने के साथ खाद्य सुरक्षा तथा लोगों की स्थिति के बारे में जागरूकता फैलाना है। इस दिवस को संयुक्त राष्ट्र के विश्व खाद्य व कृषि संगठन  की स्थापना की याद में मनाया जाता है। विभिन्न सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं की रिपोर्टों का निष्पक्षता से अध्ययन करें तो गरीबी और भुखमरी के आंकड़े परस्पर विरोधाभाषी मिलेंगे। आंकड़ों की बाजीगरी के बावजूद एक बात बिलकुल साफ है की दुनियां में भूखे पेट सोने वालों की संख्यां में कोई कमी दृष्टिगोचर नहीं हो रही है। भारत सरकार दावा कर रही है उसके विभिन्न प्रयासों से  लोगों को खाध सुरक्षा मिली है जिससे देश में गरीबी घटी है। हालाँकि ग्लोबल हंगर इंडेक्स कुछ ओर ही कहानी बयां कर रही है। आंकड़ों के मायाजाल में गरीबी और भुखमरी की वास्तविक तस्वीर समझने में समाजशास्त्रियों को काफी जोर आजमाइस  करनी पड़ रही है।  

संयुक्त राष्ट्र की जुलाई 2019 की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में स्वास्थ्य, स्कूली शिक्षा समेत विभिन्न क्षेत्रों में प्रगति से लोगों को गरीबी से बाहर निकालने में मदद मिली है। वर्ष 2006 से 2016 के बीच रिकॉर्ड 27.10 लोग गरीबी से बाहर निकले हैं। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2005-06 में भारत के करीब 64 करोड़ लोग (55.1 प्रतिशत) गरीबी में थे। यह संख्या घटकर 2015-16 में 36.9 करोड़ (27.9 प्रतिशत) पर आ गयी। इस प्रकार, भारत ने बहुआयामी यानी विभिन्न स्तरों और 10 मानकों में पिछड़े लोगों को गरीबी से बाहर निकालने में उल्लेखनीय प्रगति की है। इस दौरान खाना पकाने का ईंधन, साफ-सफाई और पोषण जैसे क्षेत्रों में मजबूत सुधार के साथ गरीबी सूचकांक मूल्य में सबसे बड़ी गिरावट आयी है। दूसरी ओर ग्लोबल हंगर इंडेक्स की विभिन्न सालों की रिपोर्टों में भारत की रैंकिंग में लगातार गिरावट दर्शायी जा रही है। साल 2014 में भारत 55वें पायदान पर था। वहीं 2015 में 80वें, 2016 में 97वें 2017 में 100वें और 2018 में 103 वें पायदान पर आ गया। चैंकाने की यह स्थिति तब है जब भारत की कुपोषित आबादी में उल्लेखनीय कमी आयी है।  2000 में भारत की कुल आबादी का 18.2 फीसदी हिस्सा कुपोषण का शिकार था जबकि 2018 में कुल आबादी का 14.8 फीसदी वर्ग कुपोषण की स्थिति का सामना रहा है।

संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक भारत में 40 फीसदी खाना बर्बाद हो जाता है और यह देश की भुखमरी का एक अहम कारण है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में खाने का पर्याप्त उत्पादन होता है लेकिन ये खाना हर जरूरतमंद तक नहीं पहुंच पाता। यह समस्या का स्थाई समाधान नहीं है। गरीबी कैसे दूर हो यह प्राथमिक बात है। कुपोषण और भुखमरी गरीबी से जुडी हुई है। गरीबी दूर करने के सर्वांगीण प्रयास करने होंगे।  इसे ही विश्व  स्तर पर सुलझाना होगा तभी हम अपना लक्ष्य हासिल कर पाएंगे। अन्न उत्पादन में आत्म निर्भर बनने के लिए उन्नत कृषि प्रणाली को अपनाना होगा। देश का कृषि उत्पादन बढाकर हम कई मौजूदा समस्याओं पर नियंत्रण पा सकते है।  

विश्व बैंक के मुताबिक दुनिया में करीब 76 करोड़ गरीब हैं। इनमें भारत में करीब 22.4 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे जिंदगी गुजार रहे हैं। भारत के 7 राज्यों छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा, राजस्थान और यूपी में करीब 60 प्रतिशत गरीब अबादी रहती है। 80 प्रतिशत गरीब भारत के गांवों में रहते हैं। लोकसभा में भारत सरकार द्वारा दी गई एक जानकारी के अनुसार हमारे देश की जनसंख्या सवा सौ करोड़ से ज्यादा है। इसमें करीब 27 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे (बीपीएल) जीवनयापन करते हैं। इनमें से अनुसूचित जनजाति के 45 प्रतिशत और अनुसूचित जाति  के 31.5 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे आते हैं।

विभिन्न स्तरों पर गरीबी खत्म किये जाने के दावे स्वतंत्र विश्लेषक सही नहीं मानते है। मगर यह अवश्य कहा जा सकता है कि पिछले एक दशक में गरीबी उन्मूलन के प्रयास जरूर सिरे चढ़े है। सरकारी स्तर पर यदि ईमानदारी से प्रयास किये जाये और जनधन का दुरूपयोग नहीं हो तो भारत शीघ्र गरीबी के अभिशाप से मुक्त हो सकता है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल पर जुड़ें

More From editorial

Trending Now
Recommended