संजीवनी टुडे

श्वेत युवक की हिंसा से उपजे सवाल: जयकृष्ण गौड़

संजीवनी टुडे 19-03-2019 11:27:58


वैश्विक आतंकवाद के मूल में जो इस्लामी आतंकवाद है, उसका मकसद दुनिया का इस्लामीकरण करना है। उसकी प्रतिक्रिया में भी नए प्रकार का आतंकवाद प्रशांत महासागर के देश न्यूजीलैंड में शुक्रवार की जुमे की नमाज के दौरान दिखाई दिया। वहां की दो मस्जिदों में बंदूकधारी हमलावर ने अंधाधुंध गोलियां चलाकर 49 लोगों को मार दिया। हमले के बाद पुलिस ने एक कार से दो आईईडी बरामद किए हैं।

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हमले में छह भारतीयों की भी जान गई है। बाद में हमलावर को गिरफ्तार कर लिया गया। क्राइस्ट चर्च में करीब तीस हजार भारतवंशी रहते हैं। नौ भारतीय लापता हैं। हमलावर ने 74 पेजों के नोट में बताया कि 'मैं श्वेतों के हक के लिए हमला करने जा रहा हूं।' उसने लिखा कि यह हमला बाहरी लोगों को आने से रोकने के लिए है। उन्हें डराकर या मारकर खत्म कर दूंगा। 

इस बारे में पाकिस्तान के द डॉन ने लिखा है कि मस्जिदों में शांति में नमाज अदा कर रहे 49 लोगों को मार दिया गया। ये हमला इस्लाम फोबियो के खतरे और नस्लवाद से घृणा का बड़ा उदाहरण है। अब नहीं कहा जा सकता कि आतंकियों का धर्म होता है। डेली मेल ने लिखा है कि न्यूजीलैंड की मस्जिदों में नरसंहार हुआ है। हमला उस व्यक्ति ने किया, जो ऐसे नरसंहार करने वालों से घृणा करता था। वह नाजियो से प्रेरित था। 

वाशिंगटन पोस्ट की चकित करने वाली प्रतिक्रिया है। उसमें लिखा है कि हमले में उपयोग किए गए हथियार से घातक हथियार सोशल मीडिया बन गया है। किसी ने सोशल मीडिया में लिखा है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प श्वेत लोगों की पहचान के नए प्रतीक हैं। वह कोई पालिसी नहीं बनाएंगे, लेकिन गोरे लोगों का दबदबा दुनिया में कायम रखेंगे। उसने यह भी लिखा है कि आक्रमणकारियों को दिखाना है कि हमारी जमीन कभी प्रवासियों की नहीं होगी। दूसरे देश से आए लोग कभी हमारे लोगों की जगह नहीं ले पाएंगे। 

इस घटनाक्रम और प्रतिक्रियाओं से स्पष्ट है कि हमलावर न्यूजीलैंड में बस रहे मुस्लिमों के खिलाफ आक्रोशित था। वह इस्लामी आतंकवाद के रूप में वहां बस रहे मुस्लिमों को देखता था। उसे हर जगह इस्लामी आतंक के चेहरे दिखाई देते थे। उसने अपनी मेनिफेस्टो में यह संदेह भी व्यक्त किया है कि न्यूजीलैंड से श्वेत लोगों को हटाकर इस भूमि का इस्लामीकरण न हो जाए। इस हमले को इस्लामी आतंकवाद की प्रतिक्रिया में हुए बर्बर हमले के रूप में देखा जा सकता है। 

म्यांमार से लेकर भारत में बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियों का मकसद भी यही है कि जिस देश की जमीन में बसे हैं, वहां का न केवल इस्लामीकरण करना बल्कि आतंक के द्वारा वहां के मूल निवासियों को पलायन करने के लिए बाध्य करना। क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। आतंकवाद का भी प्रति आतंकवाद, खूनी हमले का स्थान लेता है। यह चिन्तन और चिन्ता का विषय हो सकता है कि आतंकी हिंसा का चेहरा किसका कितना बर्बर है। न्यूजीलैंड की दो मस्जिदों के हमले को श्वेत अर्थात ईसाई जगत पर हुए 9/11 के इस्लामी आतंक से देखा जा सकता है। 

इधर पाकिस्तान की धरती इस्लामी आतंकवाद की उर्वरा भूमि बन गई है। आईएसआईएस, लश्कर-ए- तोएबा, जैश-ए-मोहम्मद, इंडियन मुजाहिद्दीन आदि नाम के कई आतंकी संगठन पैदा हुए। इनके द्वारा 9/11, 26/11, भारत की संसद पर हमला, कश्मीर विधानसभा से लेकर, दिल्ली, बनारस आदि शहरों में धमाके कर निर्दोष नागरिकों का खून बहाया गया। यही नहीं अक्षरधाम, अयोध्या, काशी के संकट मोचन हनुमानजी के मंदिरों को भी निशाना बनाया गया। 

यूरोपीय देश फ्रांस, ब्रिटेन, रूस आदि देशों में भी इस्लामी जेहादी आतंकवाद के हमले हुए। दुनिया में यह जेहादी आतंकवाद संकट और चुनौती बन गया। जिस तरह श्रीराम के बाण से जब रावण का एक सिर कटता था तो दूसरा पैदा हो जाता था। इसी तरह यह आतंक चाहे सीरिया में किया गया हो या कश्मीर में जैश-ए-मोहम्मद, इंडियन मुजाहिद्दीन जैसे संगठन के द्वारा हमले किए गए हों, लेकिन सब में आतंक की विचार भूमि और मकसद समान हैं। 

मंदिर, मस्जिद और चर्च भी आतंकी हमले की चपेट में आ गए हैं। आतंक की क्रिया से उपजी प्रतिक्रिया में निर्दोष का खून बह रहा है। इस बात पर भी अक्सर चर्चा होती है कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, लेकिन धर्म के नाम पर आतंकी हिंसा होती है। बंदूकों पर धर्म के नाम का लेबल लगाकर गोली दागी जाती है। न्यूजीलैंड के हमलावर ब्रेटन टैरंट का हमला अपनी भूमि पर प्रवासी मुस्लिमों के कब्जे की प्रतिक्रिया में है। उसने इस्लामी आतंक का चेहरा देखा था। इस बर्बरता की प्रतिक्रिया में हुए हमले को श्वेत हमला कहा जा सकता है। आतंक का मनोविज्ञान यह है कि आतंकवादी किस उन्माद से प्रेरित होकर हिंसा करता है। 

इस समय दुनिया आतंक के प्रदूषण से त्रस्त है। सीरिया, मिस्र आईएसआईएस आतंकवाद से त्रस्त है। यूरोपीय देश भी इसी आतंकी हिंसा का मुकाबला कर रहे हैं। भारत भी करीब चार दशक से इस्लामी आतंकवाद से जूझ रहा है। इसका मकसद भी मजहबी राजनीति से है। इस्लामी जगत के कुछ लोग इस उन्माद से प्रेरित हैं कि उनके हिंसक जिहाद से दुनिया का इस्लामीकरण हो जाएगा। 

भारत इस्लामी आतंकवाद से जूझ रहा है। उरी के बाद पुलवामा हमला हुआ। इनके खिलाफ भारत की थल एवं वायुसेना ने सर्जिकल स्ट्राइक की। पुलवामा हमले के सरगना मसूद अजहर को अन्तरराष्ट्रीय आतंकी घोषित करने के संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव को रोकने के लिए चीन ने चौथी बार वीटो पावर का उपयोग किया। चीन न केवल लाल आतंक को प्रेरित करता है, वरन वह जेहादी आतंक के समर्थन में भी खड़ा है। 

चीन जानता है कि पाकिस्तान में जेहादी आतंकी पैदा होते हैं। इसका आशय यही है कि सांपनाथ और नागनाथ का गठबंधन दुनिया के संकट का कारण बन गया है। ऐसी स्थिति में शांति की बातों की प्रासंगिकता समाप्त हो गई है। दुनिया पर न केवल परमाणु युद्ध का खतरा मंडरा रहा है, बल्कि आतंकी हिंसा की प्रतिक्रिया में भी युद्ध की स्थिति पैदा हो सकती है। यदि इतिहास में झांककर देखे तो यहूदी मुस्लिमों में संघर्ष हुए, ईसाई मुस्लिमों में संघर्ष हुए, हिन्दू अधिक उदार और अति सहिष्णु रहा। 

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इसलिए वह राजनीतिक गुलामी से त्रस्त रहा। अब वह पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद से जूझ रहा है। पहली बार मोदी सरकार ने सर्जिकल स्ट्राइक के द्वारा जेहादी आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक कदम उठाए हैं। अति सहिष्णुता भारत के लिए अभिशाप बन गई है। अब भारत आतंकी हमले को सहन नहीं कर सकता। इस आतंकी माहौल में श्वेत युवक आक्रोशित होकर अपनी बंदूक से मस्जिदों में नमाजियों पर हमला करके 49 लोगों को मौत के घाट उतार दे तो यह तलाश करना जरूरी है कि उस श्वेत युवक ने किस मकसद से हिंसा की। इसका आंकलन जरूरी है।

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