संजीवनी टुडे

उनपचास बुद्धिजीवियों पर ’इकसठ हस्तियाें' का बहुमत

डाॅ..विलास जोशी

संजीवनी टुडे 28-07-2019 14:29:57

जब ’उनपचास बुद्धिजीवियों’ ने उन्मादी भीड़ की हिंसा के खिलाफ प्रधानमंत्री के नाम एक खुला खत लिखा, तब उसका पलटवार देश की ’इकसठ बड़ी हस्तियाें ने किया। यानी अब बड़ी हस्तियोें ओैर बुद्धिजीवियों की फौज भी परो़क्ष रूप से राजनीति के मैदान में उतर आई है।

जब  ’उनपचास बुद्धिजीवियों’ ने उन्मादी भीड़ की हिंसा के खिलाफ प्रधानमंत्री के नाम एक खुला खत लिखा, तब उसका पलटवार देश की ’इकसठ बड़ी हस्तियाें ने किया। यानी अब बड़ी हस्तियोें ओैर बुद्धिजीवियों की फौज भी परो़क्ष रूप से राजनीति के मैदान में उतर आई है। यदि इसी बात को दूसरे शब्दों में कहा जाए तो ’’तुम्हारे उनपचास तो हमारे इकसठ’’। इसे इकसठ बड़ी हस्तियों की उनपचास बुद्धिजीवियों पर एक ’’सर्जिकल स्ट्राइक’’ भी कहा जा सकता है।
 
सच कहा जाए तो इस होैड़ का चलन हमारे देश में नया नहीं है। उनपचास बुद्धिजीवियों के खत  पर से तो ऐसा महसूस होता  है कि  वे इस भीड़ की हिंसा को ’’असहिष्णता का नाम’’ देना चाहते है! अब सवाल यह है कि इन उनपचास बुद्धिजीवियों के मन में उठ रहा असंतोष वास्तव में  किसके खिलाफ है? ’सरकार’ या प्रधानमंत्री मोदीजी के? क्योंकि कुछ लोगों का मत यह भी सामने आया है कि ये बुद्धिजीवी  मोदीजी के विरोधी रहे है ओर पूर्वग्रह से ग्रस्त है? जब इस उन्मादी भीड़ की हिंसा मेें कोई पार्टी शामिल है ही नहीं तो फिर ये उनपचास बुद्धिजीवी अपना विरोध किसे दिखाना चाहते है! जबकि स्वंय प्रधानमंत्री मोदीजी लोकसभा मेें इस उन्मादी भीड़ द्वारा हिंसा करनेवालों को कड़ी सजा देने की बात कह चूके हेै। ऐसे मेें खत लिखनेवाले उनपचास बुद्धिजीवियों की नीति और नियत पर लोगों को शक होने लगे तो उसमेें  गलत क्या हैै? 
 
अब ये उनपचास बुद्धिजीवी इस बात से परेशान है कि एक तरफ तो उन्हे जनता जनार्दन  का समर्थन नहीं मिल रहा है,वही दूसरी तरुफ  मिड़िया की तरफ से भी उन्हे सकारात्मक सपोर्ट नहीं है, बल्कि उल्टे इकसठ बड़ी हस्तियों ने उनपर ऐसा पलटवार  किया है कि उसका जवाब भी उन्हे देते नहीं बन रहा है। अब उन इकसठ बड़ी हस्तियों का यह सवाल भी बेहद  विचारणीय और जायज है कि  जब कश्मीर में बेचारे कश्मीरी पंड़ितों को मार मार के वहां से भगाया जा रहा था, 1984 में  सिख दंगों में उन्मादी भीड़ की हिंसा मेें बेचारे बेकसूर लोगों को मारा और जब देश के विश्ववि़द्यालय में अलगाववादी देश के टूकडे -टूकड़े के नारे लगा रहे थे, तब कहा थे ये ’’उनपचास  बुद्धिजीवी’’? तब इन्होने क्यों अपनी जुबान पर ताला लगा रहा था? तब इन बुद्धिजीवियों ने अपनी आवाज क्यों बुलंद नहीं की  या कोई खत  तत्कालीन प्रधानमंत्री के नाम लिखा?
 
सच तो असली सवाल यह होना चाहिए है कि आज ये ’’उनपचास बुद्धिजीवी’’ ही क्यो कर परेशान हो रहे है? जबकि इसके पूर्व कुछ तथाकथित लेखक, साहित्यकार और कलाकार उनको मिले ’’अवार्ड वापस’’करने के नाटक का ’’पहला अंक’’ खेल चूके है। क्या इन उनपचास बुद्धिजीवियों का यह खत उसी नाटक के ’’दूसरे अंक’’ की स्क्रिप्ट का कोई हिस्सा हैएक विड़म्बना देखिए कि भीड़ की हिंसा का समर्थन न तो कोई पार्टी और न ही देश की जनता  कर रही हेै, तब इसको ’’असहिष्णूता का नाम’’ देना किसी तीखे व्यंग्य से कम है क्या?

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