संजीवनी टुडे

लोकतंत्र की जगहंसाई

बाल मुकुंद ओझा

संजीवनी टुडे 14-06-2018 16:53:00


यह केजरीवाल की जगहंसाई है या लोकतंत्र की विवशता। इसे साफतौर पर कोई भी परिभाषित करने की स्थिति में नहीं है। ऐसा लगता है जैसे लोकतंत्र के सभी कथित रहनुमा अपने अपने दलीय सियासी ड्रामे को अपने अपने हिसाब से लोगों के समक्ष प्रदर्शित कर रहे है। यह सच है केजरीवाल आंदोलन की उपज है और आंदोलन से निकली पार्टी के मुखिया है। दिल्ली की जनता ने भारी बहुमत से उन्हें सिंहासन पर बैठाया है । इसे भी मान लेने में कोई गुरेज नहीं है कि केजरीवाल को राज चलाना नहीं आता।

यही कारण है उसके निकटस्थ साथी एक एक कर उसका साथ छोड़ गए। केजरीवाल कुछ नया करना चाहते थे मगर उनके हाथ बंधे है। दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश है। यहाँ राज करने वाले को केंद्र से अपने सम्बन्ध बनाकर ही चलना पड़ता है। मोदी सरकार की आँखों की किरकिरी शुरू से ही केजरीवाल है। फिर केजरीवाल ने भी मोदी पर हमला करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी जिसका खामियाजा  भी उन्हें ही भुगतना है।  मगर केजरीवाल बेईमान नहीं है यह भी अकाट्य सत्य है। वे दिल्लीवासियों  के कल्याण के लिए तत्पर दिखाई दे रहे है। मगर इसके लिए सब को साथ लेकर चलना होगा। चाहे वह राजनीतिक शत्रु हो या मित्र।  

 बहरहाल इस समय दिल्ली आंदोलनरत है। मसला इतना बड़ा भी नहीं है की निपटाया नहीं जा सके। एलजी वही करेंगे जो केंद्र चाहेगा। केंद्र को भी कुछ सदाशयता दिखानी पड़ेगी और अपने अफसरों को यह कहना ही पड़ेगा की वे दिल्ली सरकार की नाफरमानी नहीं करें। दिल्ली सरकार को भी बड़ा दिल रखकर अपने अफसरों को गले लगाना होगा। सभी पक्षों को अपने दलीय स्वार्थ त्याग कर जन कल्याण की भावना के साथ आगे बढ़ना होगा तभी हमारा लोकतंत्र सफलता को चूमेगा। 
                

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