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महात्मा गांधी के 'सत्याग्रह' का असर, 10 रुपये के लिये लड़े 11 साल

संजीवनी टुडे 30-09-2020 11:03:07

महात्मा गांधी के सत्याग्रह से प्रेरित होने वाले करोड़ों लोग हैं। कइयों ने आजादी के लिए इसे हथियार बनाया तो अनेक ऐसे भी रहे जो आजादी के बाद इसी सत्याग्रह के बल पर संघर्ष करते रहे।


रायबरेली। महात्मा गांधी के सत्याग्रह से प्रेरित होने वाले करोड़ों लोग हैं। कइयों ने आजादी के लिए इसे हथियार बनाया तो अनेक ऐसे भी रहे जो आजादी के बाद इसी सत्याग्रह के बल पर संघर्ष करते रहे। ऐसे ही एक सर्वोदयी नेता हैं जिनका पूरा जीवन इसी सत्य के प्रति आग्रह को समर्पित रहा। 

रायबरेली के टीकर आगचीपुर के रहने वाले 80 वर्षीय रवींद्र सिंह चौहान विनोबा भावे के शिष्य हैं और महात्मा गांधी का उन पर व्यापक प्रभाव पड़ा। गांधी के सत्याग्रह को ही हथियार बनाकर उन्होंने राष्ट्र भाषा आंदोलन, डकैतों के आत्मसमपर्ण सहित कई अभियान चलाए। उम्र के इस पड़ाव पर भी आज वह उसी जोश के साथ महात्मा गांधी के विचारों के साथ संघर्ष कर रहे हैं। 

10 रुपये के लिये लड़े 11 साल
महात्मा गांधी के सत्याग्रह को रवीन्द्र सिंह चौहान ने पूरी तरह से आत्मसात किया है, उनके जीवन का आचरण भी गांधी से प्रभावित है। इसका उदाहरण उनकी एक ट्रेन यात्रा में मिला जब वह 1979 में लक्ष्मणपुर स्टेशन से लखनऊ की यात्रा कर रहे थे। स्टेशन पर टिकट न ले पाने के लिये पर उन्होंने ट्रेन में ही टीटी को 10 रुपया देकर टिकट की मांग की। टीटी ने टिकट नहीं बनाया और पैसे रख लिये। इस बाबत जब रवीन्द्र सिंह ने रायबरेली में उतरकर स्टेशन अधीक्षक से शिकायत की तो उनका चालान बना दिया गया।इससे आहत रवीन्द्र सिंह ने उच्च अधिकारियों तक लिखा पढ़ी शुरू कर दी। बावजूद इसके कोई कारवाई नहीं हुई, लेकिन वह डटे रहे। 

सत्याग्रह के प्रति उनका अनुराग उन्हें संघर्ष के लिए प्रेरित करता रहा। अंत मे 11 साल की कठिन लड़ाई के बाद रेलवे बोर्ड ने टीटी की गलती मानी और रवीन्द्र सिंह चौहान को सही ठहराया। 1990 में उन्हें पेनाल्टी के रूप में लिए गए 10 रुपये वापस किये गये। जिसका उल्लेख रेलवे के दस्तावेजों में अंकित है।रवीन्द्र सिंह चौहान ने इस संघर्ष पर एक किताब 'किस्सा रेल टिकट का' भी लिखा है।उनके गांधीवादी संघर्ष के कई कहानियां और भी हैं जो लोगों के लिए प्रेणादायक हैं। 

रवीन्द्र सिंह चौहान का कहना है कि गांधी जी का सत्य को लेकर जो समपर्ण था वह उन्हें हमेशा प्रेरित करता रहा इससे उन्हें एक आत्मबल मिलता था। आजादी के बाद कई मुद्दों पर उनका इसी आधार पर संघर्ष रहा है। उनके अनुसार आज भी गांधी के विचार प्रासंगिकता है। जरूरत है केवल इसे अपने व्यवहार में उतारने की।

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