संजीवनी टुडे

बिगड़ते पर्यावरण को बचाने की चुनौती

- देवेन्द्रराज सुथार

संजीवनी टुडे 23-10-2019 13:27:59

बिगड़ते पर्यावरण को लेकर आज पूरा विश्व चिंतित है। पर्यावरण की दिनोंदिन बिगड़ती तबियत एवं जलवायु परिवर्तन के संकट को लेकर दुनियाभर में प्रदर्शन हो रहे हैं। पिछले दिनों स्वीडन की 16 साल की छात्रा ग्रेटा थनबर्ग के आह्वान पर न्यूयॉर्क में 11 लाख तो ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में करीब 1 लाख लोग सड़कों पर पर्यावरण बचाने की मुहिम को लेकर उतरे।


बिगड़ते पर्यावरण को लेकर आज पूरा विश्व चिंतित है। पर्यावरण की दिनोंदिन बिगड़ती तबियत एवं जलवायु परिवर्तन के संकट को लेकर दुनियाभर में प्रदर्शन हो रहे हैं। पिछले दिनों स्वीडन की 16 साल की छात्रा ग्रेटा थनबर्ग के आह्वान पर न्यूयॉर्क में 11 लाख तो ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में करीब 1 लाख लोग सड़कों पर पर्यावरण बचाने की मुहिम को लेकर उतरे। जलवायु परिवर्तन को लेकर यह अब तक का सबसे बड़ा विरोध माना जा रहा है। इससे पहले मार्च में भी वैश्विक प्रदर्शन किया गया था, जिसमें दुनियाभर में 16 लाख लोगों ने भाग लिया था। इस तरह पर्यावरण बचाओ आंदोलन को लेकर दुनिया की कई बड़ी कंपनियों के कर्मचारी भी प्रदर्शन में शामिल हुए। प्रधानमंत्री मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर अपने संबोधन में पेरिस जलवायु समझौते के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताते हुए कहा था कि भारत गैर परंपरागत ईंधन यानी अक्षय ऊर्जा से 175 गीगावाट बिजली पैदा करेगा। लेकिन ‘हाउडी मोदी’ रैली के बाद प्रधानमंत्री ने जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन को संबोधित करते प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत ने 2022 तक अक्षय ऊर्जा के अपने मौजूदा 175 गीगावाट के लक्ष्य को दोगुना से भी ज्यादा बढ़ाकर 450 गीगावाट करने जा रहा है। हाल ही में जी20 के ओसाका सम्मेलन के दौरान संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर ध्यान आकर्षित करते हुए विश्व में प्रकृति और मानवता के बीच संतुलन एवं समरसता कायम करने पर बल देते हुए कहा कि हमें पृथ्वी को आज बचाने की महती आवश्यकता है। यह न केवल दिसंबर 2018 में पोलैंड के कैटोविचे शहर में हुए जलवायु शिखर सम्मेलन की सफलता के लिए जरूरी है बल्कि निरंतर वृद्धि कर रहे हैं वैश्विक तापमान को कम करने व हमारे अस्तित्व के बचाव के लिए भी अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाईमेट चेंज की रिपोर्ट का हवाला देते कहा कि 21वीं सदी के अंत तक वैश्विक तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा वृद्धि संपूर्ण प्राणीजगत के लिए घातक सिद्ध हो सकती है।  

निःसंदेह इन गंभीर परिस्थितियों में आवश्यक हो जाता है कि दुनिया के समस्त देश परस्पर सहयोग व समन्वय कायम करते हुए जलवायु परिवर्तन के खतरों प्रति एक दीर्घकालिक योजना पर कार्य करें। जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते तापमान को यदि कम करने की तत्परता अभी नहीं दिखाई तो हमें आने वाले समय में भयवाह त्रासदी का सामना करना पड़ सकता है। वैश्विक तापक्रम में अचानक से हुए इस इजाफे के कारण ग्लेशियर पिघल रहे हैं और समुद्र का जल स्तर दिनोंदिन नयी ऊंचाइयों को छू रहा है। समुद्र के सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए बाढ़ एवं सुनामी का खतरा बढ़ गया है। दरअसल, जलवायु में होने वाला परिवर्तन कोई एक-दो दिन की प्रक्रिया का परिणाम नहीं है बल्कि ये सब एक लंबी प्रक्रिया के तहत होता है। ये सच है कि पृथ्वी का तापमान कभी स्थिर नहीं रहा है। पृथ्वी के बनने से लेकर अब तक तापमान में उतार चढ़ाव होता रहा है। लेकिन आधुनिक भौतिकवादी युग में मशीनों के उपयोग के बढ़ने व औद्योगिक इकाइयों की तादाद में वृद्धि होने व निर्बाध विकास की महत्वाकांक्षा ने पर्यावरण व प्रकृति की अनदेखी करके इसमें बड़ा परिवर्तन करके इस संकट को और भी विकराल कर दिया है। वस्तुत: यह अनियंत्रित औद्योगिक विकास के आगे पर्यावरण की पुकार नहीं सुनने का नतीजा है।

हम यह भूलते जा रहे हैं कि भौतिकवाद की जिस दुनिया में रहते हैं यह हमें पर्यावरण की दोहरी कीमत पर हासिल हुई है। जंगलों का अंधाधुंध तरीके से दोहन व पर्यावरण के विरुद्ध आधुनिक जीवनशैली अपनाने की हठधर्मिता ने पृथ्वी को रेट अलर्ट के घेरे में लाकर खड़ा कर दिया है। पर्यावरण मानव के जीवन का अभिन्न अंग हैं। मानव के जीवन को विकसाने में पर्यावरण की भूमिका एक निर्माणकारी तत्व की हैं। यदि पर्यावरण नहीं होता तो मानव जीवन ही नहीं अपितु पादप व प्राणी जीव के जीवन की कल्पना करना भी दूभर था। संतुलित व मानव अनुकूल पर्यावरण ने अपने आँचल में प्रत्येक प्राणी को जीवन व्यतीत करने के लिए वे समस्त संसाधन उपलब्ध कराएं जो जीवन जीने के लिए अनिवार्य होते हैं। लेकिन मानवीय जीवन में हुई विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की प्रगति व तकनीकी घुसपैठ ने न कि केवल मानवीय जीवन की दिशा को परिवर्तित करके रख दिया अपितु पर्यावरण और प्रकृति का शुद्ध-सात्विक रूप भी काफ़ी हद तक विकृत कर दिया। पर्यावरण समस्या की यह स्थिति इतनी जटिल होती जा रही है कि वैश्विक स्तर पर पर्यावरणीय संस्थाओं द्वारा आयोजित कराए गये पर्यावरण संरक्षण के कार्यक्रमों में बनायी गयी योजनाओं व नियमों की अनुपालना भी सही ढंग से नहीं हो पा रही हैं। भले वह स्टॉकहोम सम्मेलन हो या रियो डि जेनेरो का पृथ्वी सम्मेलन, मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल हो या क्योटो प्रोटोकॉल, सभी में विकृत होते पर्यावरण व प्रकृति को लेकर कई योजनाएं बनी और कई कार्यक्रम संचालित करने का निर्णय हुआ लेकिन ज़मीनी धरातल पर इन सारी योजनाओं और कार्यक्रमों का अब तक उचित क्रियान्वयन नहीं होने के कारण पर्यावरण संरक्षण की कवायद अंजाम तक नहीं पहुंच सकीं।

कहने को तो हमारे ग्रंथों व पुराणों में 'माता भूमि: पुत्रो अहं पृथिव्या' अर्थात् धरती को माता का दर्जा दिया गया है और उसके प्रति सारे मनुष्यों को पुत्र (संतान) के जैसा आचरण करने की बात बतायी गयी है। लेकिन इसके विपरीत आज के मनुष्य का आचरण तो कदापि धरती के प्रति माँ के समरूप दृष्टिगोचर नहीं हो रहा है। वस्तुतः पॉलिथीन के बढ़ते प्रयोग व हानिकारक रासायनिक तत्वों के उपयोग के कारण आज धरती अपनी उर्वरक क्षमता खोकर कैंसर की बीमारी से जूझ रही है। असंतुलित होते पर्यावरण के कारण आज न केवल मनुष्य के जीवन पर आपदाएं आ रही हैं बल्कि इस आपदा के फेर में फंसकर कई पशु-पक्षियों की प्रजातियां सदैव के लिए लुप्तप्राय-सी होती जा रही हैं। इधर, हरित ग्रह प्रभाव के कारण भूमि का तापमान प्रत्येक वर्ष वृद्धि करता जा रहा है। कार्बन डाई आक्साइड, नाइट्रस आक्साइड, मीथेन इत्यादि भूमंडलीय ऊष्मीकरण के लिए उत्तरदायी गैसों का उत्सर्जन सूर्य से आने वाले किरणों के अवशोषण में बाधक तत्व बन रहा है। वहीं क्लोरो-फ्लोरो कार्बन गैस के बढ़ने के कारण ओजोन (रक्षा कवच) का अवक्षय हो रहा है। परिणामतया मानव शरीर के लिए हानिकारक सूर्य की पराबैंगनी किरणें धरती पर पहुंचकर कई बीमारियों को न्यौता दी रही हैं। इसी हरित ग्रह प्रभाव के कारण जलवायु भी परिवर्तित हो रही है। जिसके कारण हमें सर्दी में गर्मी और गर्मी में सर्दी का अहसास हो रहा है। वहीं कारखानों की चिमनियों, बसों व स्वचालित वाहनों के विषैले धुएं के रूप में निकलने वाली सल्फर डाइआक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसी गैसें जल के साथ क्रिया करके नाइट्रिक अम्ल और गंधक का तेजाब बनकर अम्ल वर्षा के रूप में धरती पर बरस रही है। जिसके कारण जलीय प्राणियों की मृत्यु, खेतों और पेड़-पौधों की वृद्धि में गिरावट के साथ ही तांबा और सीसा जैसे घातक तत्वों का पानी में मिल जाने के कारण मानव के स्वास्थ्य पर कई प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहे हैं।

यदि अब भी हम सचेत नहीं हुए तो वह समय दूर नहीं जब हमें सांसे भी खरीदने पड़ेगी। अब पर्यावरण के संकेत को समझकर इसकी हत्या बंद कर देने में ही हमारी भलाई हैं। क्योंकि जो पर्यावरण जीवन को विकसित करने में सहायक सिद्ध हो सकता हैं वह समय आने पर विनाश का ताडंव भी कर सकता है। सही मूल्यांकन किए बिना अंधाधुंध प्रकृति से छेड़छाड़ करते रहे और उसकी सीमाओं का उल्लंघन करते रहे तो कुछ भी हाथ नहीं आएगा। साथ ही आमजन में पर्यावरण शिक्षा एवं अवबोध को लेकर जागरूकता लायी जाएं। प्रकृति के पारंपरिक ऊर्जा के स्रोत (गैस, तेल और कोयला) के सीमित उपयोग के साथ ही यथासंभव उनके स्थान पर उर्जा के गैर-पारंपरिक ऊर्जा स्त्रोत (सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा, बायोगैस और परमाणु ऊर्जा) के उपयोग को लेकर ध्यान आकर्षित किया जाएं। यहां हमें ये भी नहीं भूलना चाहिए कि पर्यावरण प्रदूषण का प्रमुख कारण जनसंख्या में वृद्धि होना भी है। इस बढ़ती जनसंख्या के लिए भरण पोषण एवं जीवन की सामान्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की दृष्टि से वैज्ञानिक एवं तकनीकी ज्ञान का उपयोग करते हुए संसाधनों का तीव्र गति से अंधाधुंध दोहन किया जा रहा हैं। इसीलिए जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में कदम उठाने की आज महती आवश्यकता है। हमें सर्व सहभागिता के साथ पर्यावरण संरक्षण को लेकर सच्चे मन से प्रयास करने ही होंगे। हमारे पूर्वजों ने वन्य जीवों को देवी-देवताओं की सवारी मानकर तथा पेड़-पौधों को भी देवतुल्य समझकर उनकी पूजा की इस हेतु उन्हें संरक्षण भी प्रदान किया। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम प्रकृति और पर्यावरण के लिए हर उस काम से परहेज़ करें जिससे उसे हानि का सामना करना पड़े। व्यापक पैमाने पर वृक्षारोपण करने हेतु अभियान चलाने, जन-जागृति लाने जैसी मुहिम इस दिशा में सार्थक पहल होगी।

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