संजीवनी टुडे

सोशल मीडिया पर सवार सहायता चिट्ठियां!

-रामविलास जांगिड़

संजीवनी टुडे 20-05-2020 14:52:47

आदरणीय शरद जोशी के समय विकास की इल्लियां जीप पर सवार होकर गांव की ओर जाती थी। ये इल्लियां गांव के दुख-दर्द को चट करने की एक विशेष योग्यता रखती थी। समय ने विकास के पंख पर सवार होकर अब नया रूप प्रकट किया है।


आदरणीय शरद जोशी के समय विकास की इल्लियां जीप पर सवार होकर गांव की ओर जाती थी। ये इल्लियां गांव के दुख-दर्द को चट करने की एक विशेष योग्यता रखती थी। समय ने विकास के पंख पर सवार होकर अब नया रूप प्रकट किया है। अब सरकारी सहायता की चिट्ठियां सोशल मीडिया पर सवार होकर इठलाती हुई बल खा रही है। नाना रूपी सहायता की बसों पर सवार होकर चिट्ठियां गगन मंडल में लहरा रही है। बेहाल बेकार मजबूर मजदूर राजमार्गों पर उतरे हैं। इनको पता नहीं है कि इन राजमार्गों पर पैदल जाना सख्त मना है। फिर भी यह चले जा रहे हैं। नंगे पांव, जाने के लिए अपने गांव। त्रासदी का यह रेला पसरा है चारों ओर। सियासतदानों द्वारा सृजित सहायता की चिट्ठियां मंडरा रही है चैनल-चैनल। कोई बसों के सहारे मजदूरों को उनकी अपनी झोपड़ियों में पहुंचाने की व्यवस्था के लिए चिट्ठियां पेल रहा है, तो कोई बसों के झुंड में ऑटो टैक्सी ढूंढ़ रहा है। एक सियासत बाज दूसरे के अधिकार क्षेत्र में तीसरे प्रकार की व्यवस्था चलाकर चौथे चमचे को पांचवी सीढ़ी पर चढ़ाने का छठा प्रयास सातवें ढंग से आठवीं बार कर रहा है। लॉकडाउन 1 से लेकर लॉकडाउन 4 तक पसरा यह मजदूरों का रेला झमेला बना दिया गया है। अपने-अपने सियासी चालबाजों ने अपने-अपने चम्मचों की सहायता से खाने-खिलाने का काम शुरू कर दिया है। न्यूज़ में मजदूरों की कथा देखना बहुत डरावना हो गया है। इनकी खबर को अब क्या तो टाइटल दें! क्या शीर्षक दिया जाए इस लाचारी बेबसी को!

इधर वैश्विक फेसबुक संस्थान के कवि गण अपने आपको फल-फ्रूटों से सजाकर, एयर कंडीशनर में डबल बेड बिछाकर, कट-पेस्ट का नया हथियार फहराकर, मजदूरों पर अपनी कविताएं पैलने के लिए आतुर-व्यातुर है। मजदूरों की व्यथा पर अखबारों के पन्ने रंगे जा रहे हैं। चैनल-चैनल बहस वीर बहसों में बेबसी को उलझाए जा रहे हैं। एक सरकार दूसरी सरकार पर। एक शासक दूसरे शासक पर। एक प्रशासक दूसरे प्रशासक पर। मजदूरों की विसंगतियों का ठीकरा फोड़ने का जो भी कार्यक्रम कर रहे हैं, वह एक मजेदार खेल बन पड़ा है। शासन-प्रशासन द्वारा मजदूर को ठेंगा दिखाते ठेंगा-ठेंगड़ी का यह खेल बेहतरीन ढंग से खेला जा रहा है। इधर की चिट्ठी उधर। उधर का ट्विटर इधर। सिर्फ खुद की सेवा करते हुए हम करेंगे मजदूरों की सेवा। यही मंत्र मारने की सोशल ड्रामेबाजी भी एक और नया वातावरण पैदा कर रही है। इसके लिए सभी सियासत दानों को दोनों हाथ लंबे-लंबे जोड़ने के सिवाय अब कुछ नहीं कर सकते हैं। मजेदार मंजर दिखाई दे रहे हैं। रईस लोग मौज मस्ती के लिए अपना घर छोड़ना चाहते हैं और मजदूर अपने जीवन की अंतिम सांस के लिए अपने घर जाना चाहते हैं। केवल इतनी ही तो मांग है कि हमें अपने घर जाने दीजिए। हमें केवल अपने घर ही पहुंचा दीजिए। हे मजदूर! तुम देखो तो सही तुम्हारे लिए कितनी-कितनी कविताएं रच दी गई है। तुम्हारे लिए कितनी रंगशालाओं में कितने-कितने नाटक खेले जा रहे हैं। तुम्हारे लिए कितनी-कितनी सहायता के गीत गाए जा चुके हैं। सहायता के लिए कितने-कितने सियासत दान आपस में चिट्ठियां पेल रहे हैं। प्रशासन के कितने अधिकारी तुम्हारे लिए कितने प्रकार के आदेश-निर्देश के खेल खेल चुके हैं। यह क्या कम है, डियर मजदूर! माना कि तुम्हें घर जाना है लेकिन राजनीति बाजों को अपनी राजनीति भी तो चमकानी है। रंज, राग एवं राजनीति में सब कुछ जायज है मेरे मजबूर! सड़क पर घिसटते। हे नंगे पांव! हे खाली पेट! सुनते समझते देखते रहिए। इन सबकी सहायताओं की बातों के बवंडर में चलते रहिए। आपके अपूर्व साहस और हिम्मत को पूरी दुनिया प्रणाम करती है। आपमें गजब की इम्यूनिटी है, आप विश्व विजेता हैं। पता है ना, अब इल्लियां जीप पर सवार होकर आपके गांव की ओर नहीं आएगी। सहायता चिट्ठियां अब सोशल मीडिया में फिरती-तैरती ही नजर आएगी। चिट्ठियां लिखी तो जा रही है! यह क्या कम है!

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