संजीवनी टुडे

शीला दीक्षित का अचानक चले जाना

रमेश सर्राफ धमोरा

संजीवनी टुडे 21-07-2019 14:53:59

शनिवार दोपहर को अचानक खबर आयी की दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री और दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष शीला दीक्षित का 81 वर्ष की आयु में निधन हो गया। पारिवारिक सूत्रों के अनुसार दीक्षित पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रही थीं


शनिवार दोपहर को अचानक खबर आयी की दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री और दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष शीला दीक्षित का 81 वर्ष की आयु में निधन हो गया। पारिवारिक सूत्रों के अनुसार दीक्षित पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रही थीं और उन्हें शुक्रवार की सुबह सीने में जकडऩ की शिकायत के बाद फोर्टिस-एस्कॉर्ट्स अस्पताल में भर्ती कराया गया था। जहां दोपहर बाद तीन बजकर 55 मिनट पर उन्होंने अंतिम सांस ली। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, कांग्रेस नेता राहुल गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल समेत कई अन्य नेताओं ने उनके निधन पर शोक प्रकट किया है।

शीला दीक्षित कांग्रेस में एक जुझारू नेता थी। 81 साल की उम्र में भी वह किसी युवा की तरह पूरे जोश के साथ दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष की जिम्मदारी संभालकर कांग्रेस को पुन: खड़ा करने में लगी हुयी थी। यह शीला दीक्षित की ही जिद ही थी जिसके चलते पिछले लोकसभा चुनाव में दिल्ली की सातों सीटो पर कांग्रेस का आम आदमी पार्टी से गठबंधन नहीं हो पाया था। लोकसभा चुनाव में चली मोदी लहर में कांग्रेस दिल्ली में सीट तो एक भी नहीं जीत पायी थी। यहां तक की खुद शीला दीक्षित भी भाजपा के मनोज तिवाड़ी से उत्तर-पूर्वी दिल्ली से करीब 3.66 लाख वोटों से चुनाव हार गयी थी। मगर हारकर भी दिल्ली में कांग्रेस तीसरे स्थान से दूसरे स्थान पर आ गयी थी। उस चुनाव में कांग्रेस के वोट बैंक में काफी बढ़ोत्तरी हुयी थी।

शीला दीक्षित की सक्रियता इसी से आंकी जा सकती है कि हाल ही में उन्होने दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी की मीटिंग बुलाई थी व कार्यकारी अध्यक्षों के मध्य काम का बंटवारा किया था। चार दिन पूर्व उन्होने दिल्ली कांग्रेस के तीन प्रवक्ता भी नियुक्त किये थे। राजनीति में इतनी सक्रियता देखकर कौन सोच सकता था कि वो अचानक चली जायेगी। दिल्ली कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उनका प्रदेश प्रभारी पीसी चाको व पूर्व अध्यक्ष अजय माकन से टकराव चलता रहता था मगर जीवट वाली महिला शीला दीक्षित उनसे कब हार मानने वाली थी। उनको जो भी सही लगता वही करती थी।

शीला दीक्षित लगातार तीन बार 15 वर्षों तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रही। उनके कार्यकाल में दिल्ली को जो विकास हुआ उसको लोग आज भी याद करते हैं। शीला दीक्षित को दिल्ली में विकास का चेहरा माना जाता रहा है। दिल्ली मेट्रो और तमाम फ्लाईओवर से लेकर बारापूला जैसे बड़े रोड़ अगर बने हैं तो उसके पीछे सोच और श्रेय शीला दीक्षित को ही जाता है।

उनका विवाह  कांग्रेस के बड़े नेता और बंगाल के पूर्व राज्यपाल उमाशंकर दीक्षित के आईएएस अधिकारी बेटे विनोद दीक्षित से हुआ था। शीला के बेटे संदीप दीक्षित भी दिल्ली से सांसद रह चुके हैं। शीला दीक्षित का जन्म 31 मार्च, 1938 को पंजाब के कपूरथला में हुआ था। उन्होंने दिल्ली के जीसस एंड मेरी कॉन्वेंट स्कूल में शिक्षा पाई और दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस से इतिहास में मास्टर डिग्री हासिल की थी। 1984 से 89 तक वे उत्तर प्रदेश के कन्नौज से सांसद रहीं। 1986 से 1989 तक शीला दीक्षित केन्द्र सरकार में संसदीय कार्य मंत्रालय में राज्य मंत्री तथा बाद में प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री रहीं। वे दिल्ली शहर की महापौर भी रहीं। शीला दीक्षित इंदिरा गांधी मेमोरियल ट्रस्ट की सचिव भी रह चुकी हैं।

2013 में दिल्ली विधानसभा चुनाव में हार के बाद शीला को 2014 में केरल का राज्यपाल बनाया गया था। हालांकि कुछ महीनों बाद ही केन्द्र में सरकार बदलने पर उन्हें राज्यपाल के पद से इस्तीफा देना पड़ा था। शीला दीक्षित शादी होने के बाद अपने ससुर उमा शंकर के काम में सहयोग करने लगी। उनके ससुर इंदिरा गांधी सरकार में गृहमंत्री भी रहे थे। शीला दीक्षित ने अपने ससुर से राजनीति सीखी।

शीला दीक्षित कई बार विवादो में भी रही। मुख्यमंत्री रहने के दौरान उन पर भाजपा की एक नेत्री ने सरकारी राशि का दुरुपयोग करने का आरोप भी लगाया था। कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान भी उन पर इसी तरह के आरोप लगे थे। जेसिका लाल हत्याकांड के मुख्य आरोपी मनु शर्मा को पैरोल पर रिहा करने को लेकर भी उन पर आरोप लगे थे।

शीला दीक्षित कुछ दिनों से वो बीमार जरूर थीं फिर भी कांग्रेस को खड़ा करने के लिए आखिरी दम तक जूझती रहीं। शीला दीक्षित का अचानक चले जाना कांग्रेस के लिए तो बहुत बड़ी क्षति है। 2019 के आम चुनाव से ठीक पहले शीला दीक्षित को कांग्रेस राहुल गांधी दिल्ली की कमान सौंपी थी। शीला दीक्षित सोनिया गांधी की बेहद करीबी रहीं। राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा दोनों उन्हें आंटी ही कहते थे। लेकिन सच तो ये भी रहा कि दिल्ली में उनके अलावा कांग्रेस को ऐसा कोई नेता नहीं था जो आम आदमी पार्टी के मुकाबले पार्टी कांग्रेस को खड़ा कर सके। बढ़ती उम्र और तबीयत खराब होने के बावजूद शीला दीक्षित को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की जिम्मेदारी दिया जाना इस बात का सबसे बड़ा सबूत है।

तमाम मुश्किलों के बावजूद शीला दीक्षित अगले साल होने जा रहे दिल्ली विधानसभा के चुनावों के लिए जोर शोर से जुटी हुई थीं। शीला दीक्षित को सिर्फ विरोधी दल के नेताओं से ही नहीं बल्कि कांग्रेस के ही सीनियर नेताओं से लगातार जूझना पड़ रहा था। शीला दीक्षित और दिल्ली प्रभारी पीसी चाको का झगड़ा तो आखिर तक खत्म नहीं ही हो सका। वैसे चाको से बेपरवाह शीला दीक्षित अपने तरीके से कांग्रेस को मजबूत करने में लगी रहीं और अपने हिसाब से जिलाध्यक्षों की नियुक्ति भी कर डाली थी।

अब इससे बड़ी बात क्या होगी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने शोक संदेश में शीला दीक्षित के व्यक्तित्व की सराहना के साथ साथ उनके शासन में दिल्ली में हुए विकास के कामों की ओर भी ध्यान दिलाया है। प्रधानमंत्री मोदी का शीला दीक्षित की तारीफ बहुत मायने रखती हैं। मोदी ने उनके घर जाकर उन्हे श्रृद्वांजलि अर्पित की व उनके अंतिम संस्कार में भी शामिल हुये।

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