संजीवनी टुडे

"उठापटक से ही निखरते हैं - राजनैतिक चेहरे"

संजीवनी टुडे 16-07-2020 08:09:52

यदि सचिन पायलट विभीषण बनने का प्रयास नहीं करते तो राजस्थान की जनता को भी भला अभी तक गहलोत सरकार की कार्यशैली व असली चेहरे को भांपने का अनुभव कैसे मिल पाता।


जयपुर। आम जीवन में इंसान संघर्षों के सामने घुटने टेक देता है। लेकिन वास्तविक जीवन में संघर्ष (उठापटक) ही व्यक्ति को महान बनाते हैं। हम चाहे तो प्राचीन भारतीय उपजीव्य काव्य में इनका अवलोकन कर सकते हैं- रामायण के अंतर्गत यदि सुग्रीव, अपने बड़े भाई बाली के द्वारा प्रताड़ित होकर ऋष्यमूक पर्वत पर निर्वासित जीवन व्यतीत न करता तो वह आज वानरराज सुग्रीव (राम- कथा में) नहीं कहलाता। दूसरी तरफ 'लंका-विजय' के प्रसंग में यदि विभीषण, भरी सभा में रावण से तिरस्कृत होकर राम की शरण में नहीं आता तो विभीषण, लंकेश! न बन पाता। जगजाहिर लोकोक्ति का रास्ता हमें कौन दिखाता-"घर का भेदी लंका ढाए।"

हाल ही के राजनैतिक परिदृश्य(राजस्थान के सियासी घमासान) में यदि सचिन पायलट विभीषण बनने का प्रयास नहीं करते तो राजस्थान की जनता को भी भला अभी तक गहलोत सरकार की कार्यशैली व असली चेहरे को भांपने का अनुभव कैसे मिल पाता। निश्चित तौर पर संघर्षों में ही निखरते हैं -'राजनैतिक चेहरे।' क्योंकि योग्यता के शारीरिक व बौद्धिक दोनों मायने समाज में एक दूसरे पर हावी नजर आते हैं लेकिन बुद्धि हमेशा बल पर हावी होती है-"बलात् बुद्धि: गरीयसी।" 

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मुझे आज भी याद है जब मैं स्व.राजेश पायलट स्नातकोत्तर राजकीय महाविद्यालय, बांदीकुई (दौसा) से बी.ए. करते हुए(2003 से 2005 तक), कॉलेज से ही अपनी राजनीतिक संभावनाओं को तलाश रहा था। मुझे अधिकतम छात्रों का समर्थन भी प्राप्त था, लेकिन उस समय बांदीकुई महाविद्यालय गुर्जर-मीणा विवादों की भंवर में बुरी तरह फंसा हुआ था। यहां तक कि हमारे पूर्ववर्ती कॉलेज अध्यक्ष (मुकेश मीना) द्वारा एक गुर्जर छात्र का मर्डर कर दिया गया था। इन सब हालातों के चलते मुझे घर वालों ने राजनीतिक गतिविधियों से पीछे हटने के लिए बोला। इस वजह से मैं तनावग्रस्त तो रहा लेकिन बाद में अपने आप को संभाला और शैक्षणिक गतिविधियों की तरफ ध्यान केंद्रित कर मेधावी छात्र का दर्जा पाया एवं 2005 में कॉलेज टॉप किया। 

उस समय आज के सचिन पायलट समर्थक विधायक मुरारीलाल मीणा ने राजस्थान की राजनीति में पदार्पण ही किया था। उन्हें मैं अपना राजनीतिक गुरु व प्रेरक मानता आया हूं। क्योंकि वो मेरे करीबी रिश्तेदार होने के साथ-साथ, ग्रामीण संस्कृति व गरीबी में बचपन बिताने के बावजूद, इंजीनियर के रूप में राजकीय सेवा करने के उपरांत उन्होंने राजनैतिक सफर में यहां तक का मुकाम(कद्दावर व बागी नेता का टैग) हासिल किया। उनकी रग-रग में कांग्रेस विचारधारा का लहू प्रारंभ से ही बहता था। 

मेरे कॉलेज के दिनों में जब उन्होंने पहला चुनाव बांदीकुई विधानसभा क्षेत्र से लड़ा तो कांग्रेस ने उन्हें बांदीकुई से टिकट देने के लिए मना कर दिया था। फिर उनकी काबिलियत और योग्यता को देखते हुए बसपा अध्यक्ष मायावती ने बसपा के टिकट पर उन्हें बांदीकुई विधानसभा क्षेत्र से ही चुनावी जंग में उतारा। हुआ यह है कि तत्कालीन निवर्तमान उच्च शिक्षा मंत्री शैलेंद्र जोशी जो कांग्रेस के टिकट पर बांदीकुई क्षेत्र से उनके खिलाफ चुनावी मैदान में थे। कांग्रेस के कद्दावर नेता शैलेंद्र जोशी को मुरारी लाल मीणा ने भारी मतों से पराजित किया और राजस्थान की राजनीति में उनका कद इस क़दर बढ़ा कि अगला विधानसभा चुनाव भी जीते और गहलोत द्वारा उन्हें तवज्जो दिए जाने पर बसपा के सभी विधायकों को साथ लेकर उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की। 

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गहलोत ने मुरारीलाल मीणा को मंत्रिमंडल में शामिल भी किया और राजस्थान का हर नागरिक जानता है कि बसपा के 6 विधायकों के बल पर ही उस समय गहलोत ने अपनी सरकार बचाई। 2018 के विधानसभा चुनाव में भी मुरारी लाल मीणा ने दौसा विधानसभा क्षेत्र से (सामान्य सीट से) चुनाव जीता। पार्टी में दिनों दिन उनका वर्चस्व एवं राजनीतिक कद बढ़ता ही गया। लेकिन गहलोत साहब को नागवार गुजरा जब मुख्यमंत्री के चुनाव को लेकर प्रारंभ में, उन्होंने सचिन पायलट के समर्थन में अपनी सहमति जाहिर की। तभी से गहलोत साहब ने उनके कद को छोटा करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी, यहां तक कि मंत्री पद के प्रबल दावेदार होने के बावजूद भी उन्हें मंत्रिमंडल में जगह नहीं दी गई। यह मैंने मात्र एक उदाहरण दिया है बल्कि जो भी विधायक पायलट खेमे में था उसके साथ गहलोत साहब ने इसी तरीके का रवैया अख्तियार किया है।

राजनीति के जादूगर कहे जाने वाले गहलोत साहब का असली मकसद यह है कि वे राजनीति के दैदीप्यमान चेहरों (पायलट खेमें के सदस्यों) की चमक को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। इसलिए वे सूर्योदय (सचिन पायलट) के प्रकाश को भी संक्रमित (बीजेपी की चाल से) करार दे रहे हैं। उक्त मुद्दे की आड़ में चुनावी घोषणापत्र आधारित विकास को भूल गए हैं और भूल गए हैं जनता के मतपत्र की ताकत को। पूर्व सांसद रघुवीर प्रसाद मीणा को कई दिनों तक लगातार आवास पर बुलाकर राजस्थान पीसीसी अध्यक्ष की सुर्खियों में जरूर लाए लेकिन पायलट खेमे के पूर्व मंत्री  दिद्गज जाट नेता विश्वेन्द्र सिंह व विधायक बृजेन्द्र ओला को धत् कहकर, जाट वोट बैंक को साधने के लिए गोविंद सिंह डोटासरा को राजस्थान पीसीसी चीफ की कर्सी उपलब्ध करवाई और बीजेपी के आमेर विधायक व प्रदेश अध्यक्ष जाट नेता सतीश पूनिया के समानांतर विकल्प ढूंढने में सफल रहे। 

स्वभाविक तौर पर शास्त्र सम्मत विचार को अब हम भली-भांति महसूस कर सकते हैं कि 'जिस घर में कलह प्रारंभ हो चुकी है' तो सुख शांति के लिए उस घर को त्याग देना ही बेहतर होता है। फिलहाल सचिन पायलट ने सुग्रीव व विभीषण की भांति वही किया है और हरियाणा प्रमुख खट्टर साहब (राम के डेरे में-मानेसर) के क्षेत्र में पिछले कई दिनों से जीवन यापन कर रहे हैं।

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महाराष्ट्र की राजनीति में अजीत पंवार व मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया भी इसी तरह का निर्वासित जीवन व्यतीत कर चुके हैं। क्योंकि "क्लेश: फलेन हि पुनर्नवतां विद्यते।" अर्थात जिस कार्य के लिए मनुष्य कठिन श्रम करता है उसके सफल हो जाने पर वह सभी दुखों को भूल जाता है। इसी परिस्थिति से सचिन पायलट को भी गुजरना पड़ रहा है।राजा भतृहरी ने नीतिशतक में ठीक ही लिखा था-
    "अम्भोजिनीवनविहारविलासमेव 
             हंसस्य हन्ति नितरां कुपितो विधाता।
     न त्वस्य दुग्धजलभेदविधौ प्रसिद्धां
            वैदग्ध्यकीर्तिमपहर्तुमसौ समर्थ:।।"
  (ब्रह्मा का वाहन हंस और आसन कमल है। यदि किसी कारणवश ब्रह्मा हंस पर अत्यंत क्रुद्ध हो जाए तो वे उसके कमल वन में विचरण करने के सुख को रोक सकते हैं,अर्थात उस पर स्वच्छंद-विहार का प्रतिबंध लगा सकते हैं, परंतु वे दूध और पानी को पृथक्- पृथक् करने के उसके गुण को नष्ट नहीं कर सकते हैं। इसी प्रकार रुष्ट होकर कोई राजा (मुख्यमंत्री) किसी विद्वान् ( योग्य नेता) के स्वच्छंद- विचरण(राजनैतिक अधिकारों) पर प्रतिबंध लगा सकता है, परंतु वह उसकी विद्वता की प्रसिद्धि (योग्यता को अर्थात महत्त्वाकांक्षाओं को) नहीं रोक सकता (कम कर सकता) है।

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इसलिए हमें अपने विचारों के सिद्धांतों को कभी नहीं गिरने देना चाहिए। क्योंकि- " राजनीतिक योग्यता किसी की बपौती नहीं है।"और न ही किसी जाति, धर्म व संप्रदाय के घेरे में बंधने वाली है। क्योंकि सरकारें आती हैं और चली जाती हैं लेकिन विकासवाद के रास्ते और जनभावनाओं को कभी नहीं ठुकराया जा सकता। पायलट का बयान ठीक ही था-  'सत्य को परेशान किया जा सकता है लेकिन पराजित नहीं।' 

किसी जमाने में ममता बनर्जी ने भी घर(कांग्रेस) त्यागकर नई राह का वरण किया था जिसका दूरगामी सुखद परिणाम आप सभी के सामने है।आज भला पश्चिम बंगाल में शेरनी की (सीएम की) दहाड़ दिल्ली तक राजनीतिक गलियारों में सभी को आतंकित करती है।

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अभाव व संघर्षों के कारण ही हमारे भारतीय समाज में अनेक कुशल राजनेता, चिंतक, आलोचक, विचारक, कवि व विद्वान् पनप सके हैं। सचिन पायलट का नाम भी इतिहास के पन्नों में एक जुझारू नेता के रूप में दर्ज होगा।

नोट:- ये लेखक के निजी और व्यक्तिगत विचार हैं। 

लेखक:- राम निवास मीना
(व्याख्याता, केंद्रीय विद्यालय क्रमांक 5,पंजाब)

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