संजीवनी टुडे

यक्षिणी पुत्र हृदयवीर की मौन धारणा

-- रामविलास जांगिड़

संजीवनी टुडे 29-05-2020 14:11:10

बुझे चेहरे। लटके मास्क। मलिन वस्त्र। तपती धूप, पांवों में छाले। सपनों की गठरी लादे। मजदूरों का एक बहुत बड़ा रेला। सड़क पार कर रहा था। रोते बिलखते। एक महामेला। भारी झमेला।


बुझे चेहरे। लटके मास्क। मलिन वस्त्र। तपती धूप, पांवों में छाले। सपनों की गठरी लादे। मजदूरों का एक बहुत बड़ा रेला। सड़क पार कर रहा था। रोते बिलखते। एक महामेला। भारी झमेला। यह देख बुलाकीराम नाई ने गंगाराम पटेल से पूछा- 'ये क्या गत है? मजदूरों की ऐसी दशा किसने बनाई?' तब गंगाराम पटेल ने अपने मुंह पर मास्क चढ़ाते हुए ये कहानी सुनाई। सुन डियर बुलाकी नाई! शहर के किसी कंक्रीट वाले अपार्टमेंट के पीछे एक फार्म हाउस था। उस फार्म हाउस में हृदयप्रभा नामक एक यक्षिणी रहती थी। उसे शरारतें करने में सिद्धि प्राप्त थी। वह ट्वीटर फेसबुक पर सवार होकर पूरी दुनिया में मंडराती फिरती। फेसबुक पर गुजरते राहगीरों से वह लूटपाट करती। उन्हें डिजिटली स्वांग भर, खूब डराती। कोरोना काल की लॉकडाउन वाली घड़ी में इसके लूटने का अंदाज और शातिराना बन गया था। एक दिन उसने देखा कि फेसबुक पर एक खूबसूरत नौजवान मंडरा रहा था। यक्षिणी ने उससे चैटियाना शुरू किया। नशीली आंखों और रसीली बातों में उसे फंसा लिया। कोरोना काल के समस्त लॉकों को डाउन होते देखकर उसने वेबीनार पर शादी रचाई। यक्षिणी ने शीघ्र ही सत्यवीर नामक उस युवक को पति होने की ट्रेनिंग दी। उसे पत्नीव्रता बनने के लिए टिप्स दिए। वह उससे सुबह शाम झाड़ू चौका बर्तन का कार्य करवाती। दिन में उसे ऑफिस भेज दिया करती ताकि शाम के समय वह सब्जी साबुन सोडा आदि अपनी पीठ पर लाद कर घर ले आए।

दिवस पर्यंत हृदयप्रभा स्वयं पलंगासन होकर टीवी माता पर लाल इश्क और भाभी जी घर पर है, जैसे धार्मिक सीरियलों का विधि-विधान से पारायण करती। व्हाट्सएपोन्मुखी होकर वह चैटिंग जैसा सात्विक कार्य भी संपन्न करती रहती। वह पतिदेव को जंज़ीरों से बाँध कर रखती क्योंकि उसे पत्नी धर्म का निर्वाह करना अच्छे से आता था। कुछ दिनों बाद न्यूयॉर्क के एक निजी अस्पताल में यक्षिणी ने एक विलक्षण पुत्र को जन्म दिया। जिसे हृदयवीर नाम दिया गया। उसे पैरों की रेखाएं देखकर भविष्य कथन करने में महारत हासिल थी। एक दिन कुम्हारिया सिटी के सरकारी खजाने में सपनों की चोरी हो गई। देश निर्माण के लिए किसान मजदूरों को दिखाए जाने वाले सपने जाने कहां गायब होने लगे। मजदूरों के नसीब में अब सपने देखना भी नहीं था। कोरोना के भय और भूख से बिलखते मजदूरों की दशा देखी नहीं जाती थी। तब राजा ने यह घोषणा करवाई कि जो कोई भी मजदूरों के इन खोए सपनों को को ढूँढ़ने में सहायता करोगा उसे सरकारी नौकरी दी जाएगी। ऐसा कहकर राजा ने फिर से कोई एक सपना उछाला। चमचों की मांग पर यक्षिणी पुत्र ने तब तत्काल ही सपनों के चोरों के पद-चिह्नों को पढ़ना शुरू किया। वह उस स्थान पर ले गया जहाँ चुराए सपनों को छुपाया गया था। जनता ने जब सपनों के चोरों का नाम पूछा तो यक्षिणी पुत्र हृदयवीर मौन धारण कर जड़ हो गया। कहानी सुनाकर गंगाराम पटेल ने बुलाकीराम नाई को पूछा- 'बता बुलाकी इस कहानी में सपनों का असली चोर कौन है?' तब बुलाकी ने सैनिटाइजर से हाथ धोते हुए बताया- 'इस कहानी में यक्षिणी हृदयप्रभा स्वयं राजा बन बैठी है और वही असली चोर है। पत्नीव्रता सत्यवीर ब्यूरोक्रेट के उच्च पद पर आसीन है। वह भी इसमें सम्मिलित है। सपने चुराने की सारी योजना यक्षिणी पुत्र हृदयवीर ने ही बनाई।' तब गंगाराम पटेल ने बुलाकीराम को कहा- 'माय डियर बुलाकी! अब तू बहुत सयाना हो गया है रे!'

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