संजीवनी टुडे

खामोश सा अफसाना पानी से लिखा होता

संजीवनी टुडे 24-02-2018 19:31:44

Source: hema sharma


डेस्क। जीवन में गुजरे कुछ पल कुछ ऐसा ही एहसास देकर चले जाते हैं। ये बहुत ही खास मगर ऐसे लम्हें  होते हैं जिनके गुजर जाने के बाद लगता है, काश! ये न हुआ होता’। जब उन लम्हों को हम जी रहे होते हैं तब सब खूबसूरत लगता हैं; सुनहरा तो लुभावना ही होता है, उस वक्त गहरा काला भी हो तो उसे भी  जी लेने का मन करता है। ना जाने कहां से अंतर्मन अचानक हिम्मत से लबरेज हो जाता है। सब कुछ कर गुजरने की अद्भुत क्षमता दिल और दिमाग दोनों के पास आ जाती है। कोई भय नहीं सताता, कोई बुरा ख्याल नहीं आता, कोई शंका मन में धर नहीं करती बस, कर गुजर जाने को जी चाहता है। उन लम्हों के बीत जाने के ख्याल से मन हर घड़ी सहमा रहता है। दिमाग पर हावी दिल कहता है "जो है इस पल में है, ना जाने कब ये बीत जायेगा, एक अफसाना बन कर रह जाएगा और एक याद बन कर सताएगा। तो क्यों ना इन लम्हों को भरपूर जी लिया जाए, जितना हो सके इन खुशियों को दामन में समेट लिया जाए"।  

ये लम्हें  खामोश होते है बिना दस्तक दिए जीवन में आते है और एक खामोश सा अफसाना लिख कर चले जाते हैं लेकिन एक कसक रह जाती है क्योंकि, ये अफ़साने पानी की स्याही से हमारे मन की दीवार पर लिखे होते हैं। जिनका बोझ सिर्फ और सिर्फ इस अकेले मन को ही उठाना होता है और उस बिना रंग वाली मगर गहरी स्याही की वो लिखाई किसी दूसरे को दिखाई भी नहीं देती। हम सोचते तो हैं कि पानी कि स्याही है मिट जायेगी किन्तु हकीकत में ऐसा होता नहीं है। पानी की ये स्याही भीतर से ऐसा गहरा रंग कर जाती है जिसका निशान ता उम्र उस दीवार पर रहता है। कारण, कि ये अफ़साने जीवन के उस दौर में लिखे जाते हैं जब जीवन के सागर में हिंडोले लगा रही कश्ती को किसी साहिल की तलाश होती है और जब वो कश्ती मंझधार में डूबने को होती है तो, ‘चक्रवात के समय तेज हवाओं में बहकर आयी हुई रेत’ से बना टीला दिखाई दे जाता है और मन उसी को साहिल मान कर अपनी कश्ती को उस रेत के टीले पर बांध लेता है। तब ये कहाँ पता होता है, कि जिसे हम साहिल मान अपनी डोलती कश्ती बांध रहे है वो रेत का एक टीला है, एक न एक दिन ये भी सागर में समां जाएगा या यूँ कहूं कि पता तो था पर सहारा ढूंढ रहे मन ने सच्चाई स्वीकार करने से इंकार कर दिया। एक दिन रेत का वो टीला सागर में समां जाता है और कश्ती को बिन साहिल छोड़ जाता है। तब ज़िंदगी अपनी हकीकत की दास्ताँ फिर से सुनाती है, सच्चाई के आईने पे पड़ी धूल को हटाती है और जागती आँखों में पल रहे ख्वाब से हमें जगाती है। 

असल में ज़िन्दगी की राह तो यही थी लेकिन, मंजिल की तरफ जा रही इस राह पर कुछ देर के लिए हम अकेले क्या हो गए क्षण भर का ये सूनापन हम सह न सके और सूनी सड़क देखकर किसी अनजानी राह पर एक अनजान साये के पीछे चल पड़े। अजनबी सी एक आवाज़ अचानक अपनी सी लगने लगी  जिसका हकीकत में कोई वज़ूद था ही नहीं। इस रेगिस्तानी छलावे से बाहर निकलना आसान नहीं होता, पर नामुमकिन नहीं। चूँकि अब जीवन की सच्चाई हमारे सामने है, तो इस मरीचिका से निकलना ही होगा। दूसरा कोई रास्ता है ही नहीं। ईश्वर की अद्भुत रचना हैं हम। हिम्मत, हौसला, दिल, दिमाग हर चीज़ से नवाज़ा है उपरवाले ने हमें। यदि हम निश्चित कर लें तो बड़े से बड़े तूफान का सामना कर सकते है, ये तो फकत मन का अंतर-द्वन्द है।  चलिए, लड़ लेते हैं एक लड़ाई स्वयं से भी। सिर्फ अपनी राह ही तो बदलनी है। 

निश्चित ही हम कर लेंगे, तो क्या गर वो ख्वाब न रहा जिसमे सच्चाई नहीं थी, तो क्या गर वो अफसाना मिट गया जो पानी से लिखा था, तो क्या गर वो लम्हा बीत गया जो आना था ही नहीं, तो क्या गर वो अजनबी आवाज़ अब नहीं आती जिसका कोई वजूद था ही नहीं, तो क्या गर वो साया साथ छोड़ गया जो कभी अपना था ही नहीं। लेकिन मन के किसी कोने में एक कसक अब भी बाकी रह जाती है और मन बरबस ही कह उठता है, काश! ये पल ना आये होते; काश! ये अफ़साने जिंदगी के पन्नों पर ना लिखे होते; काश! उसने जो कहा, हमने ना सुना होता; काश! ये नींद में चल रहा एक ख्वाब होता, जो भोर होने पर टूट जाता। इस पल गुलज़ार साहब की लिखी ये पंक्तियाँ याद आती हैं “खामोश सा अफसाना पानी से लिखा होता ना तुमने कहा होता ना हमने सुना होता”।
लेखिका 
हेमा शर्मा

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