संजीवनी टुडे

शर्मनाक है मंदिर में चंद सिक्कों के लिए मौतें: डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

संजीवनी टुडे 24-04-2019 14:07:55


तमिलनाडु के करुपन्ना स्वामी मंदिर में इसी हफ्ते महज चंद सिक्के प्राप्त करने की होड़ में सात लोगों की मौत और करीब दस लोगों के घायल होने की घटना ने समूची मानवता को झकझोर दिया। तमिलनाडु की घटना को किसी आतंकी या सिरफिरे ने अंजाम नहीं दिया। न ही इसके लिए किसी आतंकवादी संगठन को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। 

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ऐसी घटनाएं हमारी व्यवस्था के लिए शर्मनाक हैं। तमिलनाडु के मंदिर में चंद सिक्के प्राप्त करने के लिए मची भगदड़ सभ्य समाज के गाल पर तमाचा है। इस तरह की घटनाओं के लिए जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। जब तक कोई कड़ी से कड़ी सबक सिखाने वाली सजा नहीं दी जाती है तब तक इस तरह की घटनाओं की पुनरावृति नहीं रोकी जा सकती। 

हमारी प्रशासनिक व्यवस्था की यह कैसी विसंगति है कि एक ओर हम कुंभ जैसे मेलों का आयोजन कर दुनिया के सामने अपनी आयोजकीय दक्षता का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। दूसरी ओर इस तरह की घटनाओं को रोकने में विफल हो जाते हैं। यदि तमिलनाडु की मुथैयापलयम स्थित करुपन्ना स्वामी मंदिर की घटना को देखें तो हमारी लापरवाही स्पष्ट हो जाती है। मंदिर में इस तरह का आयोजन पहली बार नहीं हो रहा था। इस तरह के आयोजन में आने वाले भक्तों की संख्या का अनुमान भी पहले से ही पूर्व अनुभवों व आयोजनों में आने वाले भक्तों की संख्या के आधार पर लगाया जा सकता था। 

यह भी साफ था कि जब सिक्के वितरित होंगे तो चूंकि यह सीधे-सीधे लोगों की धार्मिक भावनाओं और आस्था से जुड़ा मामला होता है। ऐसे में सिक्के प्राप्त करने की होड़ लगना सामान्य है। इसके साथ ही भीड़तंत्र के मनोविज्ञान को भी पहले से समझा जा सकता है। मंदिर प्रशासन को पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था का इंतजाम पहले ही कर लेना चाहिए था। आशीर्वाद का सिक्का पहले पाने की होड़ तथा सिक्के पाने से वंचित नहीं रह जाने की संभावना दोनों ही स्थितियों की संभावना पहले से समझी जा सकती है। 

इसके साथ ही एक व्यक्ति के भी गिर जाने से स्थिति बिगड़ने की आशंका को नकारा नहीं जा सकता। इसके साथ ही भीड़ में किसी सिरफिरे की खुराफात या अफवाहें फैलना भगदड़ मचाने के लिए काफी होती है। इस तरह के आयोजनों के अवसर पर जिला प्रशासन व पुलिस प्रशासन और मंदिर प्रशासन के बीच निश्चित रुप से विचार-विमर्श होता है। देखना होगा कि करुपन्ना स्वामी मंदिर में यह किया गया था या नहीं। यह भी सही है कि इस तरह के आयोजन में आने वाले लोगों की संभावित संख्या का अनुमान भी होता है। 

तमिलनाडु की घटना कोई पहली घटना नहीं है। इससे पहले 14 जनवरी 2011 को सबरीमाला में भगदड़ के कारण 106 लोगों की मौत का मंजर हम देख चुके हैं। धार्मिक आस्था हमारे संस्कार में है। तीज- त्यौहारों व मेलों में पूरे उत्साह के साथ लोग भाग लेते हैं। धर्मगुरुओं के समागम तक में अनुयायियों की भीड़ उमड़ पड़ती है। पहले मथुरा में बाबा जयगुरुदेव के अनुयायियों द्वारा आयोजित समागम में अफवाह के चलते मची भगदड़ में 24 लोगों की जान जा चुकी थी। 

बाबा जयगुरुदेव के कार्यक्रम में आयोजकों ने प्रशासन से 4 से 5 हजार लोगों के एकत्रित होने की अनुमति ली थी जबकि समागम में 3 लाख से अधिक लोग जुटे थे। 1 अक्टूबर, 2006 में दतिया में रतनगढ़ स्थित देवी मंदिर में पुल टूटने की अफवाह ने करीब 109 श्रद्धालुओं की जान ले ली। इस तरह के उदाहरण भरे पड़े हैं। पिछले सालों का इतिहास इस बात का गवाह है कि एक अफवाह किस तरह से विकराल रुप ले लेती है। 

परिणाम स्वरुप होने वाली भगदड़ लोगों के मौत का कारण बन जाती है। इस तरह की घटनाएं बार-बार होने के बावजूद हम ऐसा प्रशासनिक तंत्र विकसित नहीं कर पाए, जिससे इस तरह की घटनाओं की पुनरावृति को रोका जा सके। 2003 में नासिक के कुंभ में भगदड़ मचने से 40 लोगों की जान गई, 2005 में महाराष्ट्र् के सतारा के मंधेरी देवी मंदिर में भगदड़ के कारण सैकड़ों लोग मारे गए। 2008 में जोधपुर के चामुण्डा मंदिर में भगदड़ मची और 224 लोग दबकर मर गए। 

इसी तरह से 2008 में हिमाचल प्रदेश के नैनादेवी मंदिर, 2011 में हरिद्वार में गंगाघाट, 2012 में छठ पूजन के दौरान और 2013 में इलाहाबाद कुंभ के दौरान रेलवे स्टेशन पर मची भगदड़ से बेकसूर श्रद्धालुओं को जान से हाथ धोना पड़ा। 3 अक्टूबर, 14 को पटना के गांधी मैदान में रावण दहन समारोह में 32 मौत, 18 जनवरी 14 को बोहरा समाज धर्मगुरु के यहां भगदड़ में 19 लोग, 14 जुलाई 15 को आंध्रप्रदेश, 10 अगस्त 15 को देवघर मंदिर में पूजा के दौरान भगदड़ और इसी साल 10 अगस्त 16 को कोट्टयम में समारोह के दौरान पटाखा विस्फोट के कारण भगदड़ में 111 की मौत की घटनाएं हो चुकी हैं। यह घटनाएं कोई प्राकृतिक आपदा नहीं हैं।

महत्वपूर्ण बात यह है कि इस तरह की घटनाओं से हम सबक नहीं सीखते। घटनाएं होते ही एक-दूसरे पर दोषारोपण और प्रशासन की नाकामी के आरोप जड़ने लग जाते हैं। इस तरह की घटनाओं के लिए मंदिर प्रशासन भी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। आखिर मंदिर प्रशासन को भी जिला प्रशासन के साथ बेहतर तालमेल बनाते हुए दुर्घटनाओं को रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाने चाहिए थे। 

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करुपन्ना स्वामी मंदिर में सिक्के वितरण की व्यवस्था को और अधिक व्यवस्थित किया जा सकता था। अधिक संख्या में वांलटियर्स की सेवाएं ली जा सकती थीं। श्रद्धालुओं को व्यवस्थित किया जा सकता था। अधिक पुलिस की व्यवस्था की जा सकती थी। क्या हम इस दुर्घटना से सबक लेंगे या फिर किसी नये हादसे का इंतजार करेंगे?

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