संजीवनी टुडे

बापू की 150 वी जयंती पर सामंती न्याय तंत्र के विरुद्ध एक सत्याग्रह

डॉ अजय खेमरिया

संजीवनी टुडे 22-07-2019 19:32:18

ग्वालियर से उठा गांधीवादी आंदोलन हाईकोर्ट औऱ सुप्रीम कोर्ट की आत्मा को झकझोर देगा


देश के उच्च न्यायिक तंत्र की कार्यविधि, सरंचना,औऱ सामंती सोच के विरुद्ध पूर्व प्रधानमंत्री अटलजी की जन्मभूमि ग्वालियर से एक सत्याग्रह की शुरुआत हुई है।अभी तक इस मामले पर वैचारिक विमर्श औऱ दबी जुबान में आक्रोश देखने समझने को मिलता था लेकिन "न्याय मित्र" नामक एक जनसंगठन ने बाकायदा गांधीवादी तौर तरीकों से भारत मे न्यायपालिका के शुद्धिकरण के लिये जमीन पर काम आरंभ किया है.करीब एक हजार कानून के विद्यार्थियों, शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार, वकील,चिकित्सक,व्यापारी औऱ सरकारी गैर सरकारी मुलाजिमों के समूह ने ने इस नए तरह के आंदोलन में अपनी शिरकत की है।शहर के एक होटल से करीब तीन किलोमीटर पैदल चलकर इस  संगठन ने मप्र उच्च न्यायालय की ग्वालियर खंडपीठ के रजिस्ट्रार को एक ज्ञापन भी सौंपा  जिसमें 10 प्रमुख मांगो पर विचार का आग्रह है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त जज न्यायमूर्ति रंगनाथ पांडे की मौजूदगी में इस  जनसंगठन  ने विधिवत अपने गठन का एलान किया।

देश के प्रतिष्ठित निजी विश्वविद्यालय आईटीएम के कुलपति रमाशंकर सिंह और मप्र के ख्यातिप्राप्त नेत्र सर्जन डॉ अरविंद दुबे ने इस 'न्याय मित्र' नामक सत्याग्रही प्लेटफार्म को आकार दिया है ।'न्याय मित्र' यानी 'फ्रेंड्स फ़ॉर जस्टिस' का यह आंदोलन अपने एक सूत्रीय एजेंडे पर कायम रहेगा -"भारत मे न्यायपालिका सन्देह औऱ आक्षेप से परे होकर विश्व में सर्वश्रेष्ठ कैसे बने".

रमाशंकर सिंह मप्र में सबसे कम उम्र में मंत्री रह चुके है वे दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्ययन के दौरान लोहियावादी आंदोलन से जुड़े वर्तमान में आईटीएम जैसी बड़ी यूनिवर्सिटी के मालिक कुलपति है। डॉ अरविंद दुबे मप्र के बड़े नेत्र सर्जन है गांधीवाद पर उनका अध्ययन और समझ अद्धभुत है।इस जन संगठन को लोकतन्त्र के एक उपकरण 'प्रेशर ग्रुप' यानी दबाब समूह भी कहा जा सकता है क्योंकि इसमें कोई पदाधिकारी नही है सब समान हैसियत से जुड़े हुए है।यह संगठन पहले चरण में देश के सभी हाईकोर्ट मुख्यालय एवं खंडपीठ मुख्यालय पर जाकर गांधीवादी तरीके से रजिस्ट्रार को ज्ञापन देगा।

यह सत्याग्रह सभी जगह रविवार के दिन ही होगा ताकि कोर्ट की नियमित करवाई बाधित न हो औऱ कोई अप्रिय तमाशा भी इस मुद्दे का न बनाया जा सके।यह एक वैचारिक आंदोलन भी होगा, क्योंकि जिस भी शहर में यह सत्याग्रह होगा वहां एक दिन पहले गांधीवादी तरीके की जनसभा होगी जिसमे हाईकोर्ट औऱ सुप्रीम कोर्ट की वेदनापूर्ण कार्यविधि पर संसदीय शैली में खुली चर्चा की जाएगी। इस दरमियान देश के सभी जिला मुख्यालय पर भी जनसंवाद औऱ ज्ञापन का लक्ष्य रखा गया है, देश भर के गांधीवादी औऱ स्वेछिक संगठनों को इस' न्याय मित्र' से जोड़ने पर काम आरम्भ कर दिया गया है।ग्वालियर में जो व्यापक और सघन प्रतिसाद इस सत्याग्रह को हासिल हुआ उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि आईटीएम यूनिवर्सिटी से उठी ये आवाज देश भर में उसी तरह अपनी उपयोगिता साबित करेगी जैसा नमक सत्याग्रह ने आजादी के लिये किया था।

न्याय मित्र पूरी तरह से गांधीवाद पर केंद्रित रहेगा औऱ गैर राजनीतिक मंच होगा।जिन दस बिंदुओं को इस संगठन ने उठाया है वह सही मायनों में भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में अंदर ही अंदर धधक रहे एक आक्रोश की समयानुकुल संसदीय अभिव्यक्ति ही है जैसा कि डॉ अरविन्द्र दुबे कहते न्यायमूर्तियों का सम्मान ,न्यायालय की प्रतिष्ठा बढ़े सभी चाहते है लेकिन आज देश मे हालात बहुत ही गंभीर है ,भारत मे लोग न्यायपालिका के चरित्र उसकी विश्वसनीयता,उसकी आम भारतीयों के प्रति निष्ठा पर संदेह व्यक्त कर रहे है.अभी तक यह दबी जुबान था पर अब अंतिम छोर पर भी भारत मे उच्च औऱ उच्चतम न्यायालय को लेकर लोग चर्चा करते है और इस चर्चा का सार भारतीयों के बीच सरकार के तीसरे सर्वाधिक आस्थावान पिलर को दूषित स्वरूप में रेखांकित करता है। वस्तुतः भारत के उच्च न्यायिक पतन पर आज अगर गंभीरता से मनन औऱ निर्णय नही लिया गया तो संभव है भारत के न्यायालय अपनी साख वैसे ही पूरी तरह गंवा दे जैसे कार्यपालिका और विधायिका गंवा चुके है।

पूरी दुनिया में ऐसा कोई सिस्टम नही है कि ज़ज ही जज को नियुक्त करते हो लेकिन जिस सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया को भारत के संविधान की सुरक्षा और समीचीन व्याख्या का जिम्मा है उसी सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति असंवैधानिक तरीकों से होती है।संविधान में किसी कोलेजियम सिस्टम का प्रावधान नही है लेकिन हमारे लोकतंत्र की विसंगति को देखिये जो सुप्रीम कोर्ट सरकारों की वैधता को निर्धारित करता है सरकारों के बनने बिगड़ने की तारीखें तय करता है लोकतांत्रिक मूल्यों और मर्यादा के नाम पर ।उसी सुप्रीम कोर्ट में लोकतंत्र नामक कोई चीज है ही नही ।

हमारा पीएम, सीएम,एमपी,एमएलए कौन होगा यह हमें पता रहता है क्योंकि हम दुनिया के सबसे  बड़े लोकतांत्रिक मुल्क के वाशिंदे है हम इस चुनाव से प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष जुड़े रहते है लेकिन जरा सोचिये हमारे सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जज कौन होंगे ?यह हमे अखबारों से पता चलता है।क्या यह लोकतांत्रिक मूल्यों का अनुशीलन है?पूरे देश मे आरक्षण की व्याख्या करने वाले जज  कभी अपने कैम्पस में इस आरक्षण पर चर्चा भी नही करना चाहते है जबकि सामाजिक न्याय पर खुद नियामक की तरह निर्णय देते है।असल मे भारत में सुप्रीम औऱ हाईकोर्ट की मौजूदा सरंचना आज 75 साल में भी औपनिवेशिक आवरण से मुक्त ही नही हो पाई है, लगता ही नही की यह भारतीयों के लिये बनाई गई व्यवस्था है।कैसी बिडम्बना है कि जज ही जज को चुन रहे है पीढ़ीगत रूप से।मप्र के एक जज हुए जो ग्वालियर में वकील थे हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक पदस्थ रहे उन्होंने अपने पूरे घर के नातेदारों को हाईकोर्ट का जज बनाने में कंजूसी नही की उनकी खुद की नियुक्ति एक राजपरिवार की नजदीकी के चलते हुई।इसी ग्वालियर खण्डपीठ के एक दूसरे जज हुए जो एक दूसरे राजपरिवार की सम्पत्ति की देखरेख करते थे।ग्वालियर खण्डपीठ में एक दर्जन जज ऐसे रहे है पिछले 15 साल में जो यही वकालत करते रहे फिर यही माननीय हो गए।ये किस नैतिकता की श्रेणी में आता है क्योंकि यही जज जब निचली अदालतों के लिये सर्विस रूल बनाते है तब गृह जिले में छोटे न्यायाधीश को पदस्थ नही करते।मप्र उच्च न्यायालय में हाल ही में एक जज ऐसे भी रहे जिन्होंने उप लोकायुक्त का पद अपने जूनियर जज के अधीन स्वीकार किया।एक महिला एडीजे की यौन शोषण की शिकायत पर ग्वालियर से उसका ट्रांसफर कर स्टीफ़े पर विवश किया जाता है लेकिन उस हाईकोर्ट जज के विरुद्ध सभी आरोप निराधार पाए जाते है ठीक वैसे ही जैसे मौजूदा सुप्रीम कोर्ट में इसी प्रकृति के केस के निपटान में किया गया।

हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति न केवल भाई भतीजावाद औऱ दूषित प्रकृति की है बल्कि तकनीकी रूप से भी बेहद आपत्तिजनक है मसलन ग्वालियर खण्डपीठ में एक वकील साब 20 साल तक सिविल मामलों की प्रैक्टिस करते रहे फिर माननीय हो गए और क्रिमिनल केसों की सुनवाई करने लगे।मैंने एक आरटीआई जब इन महाशय के यहां प्रस्तुत उन  दीवानी प्रकरणों को लेकर लगाई जिनमे वे वकील के रूप में प्रस्तुत होते थे तो दबाब के हर स्तर को मेरे विरुद्घ अपनाया गया और मेरा आवेदन खारिज कर दिया गया। लोकनिर्माण विभाग के एक कार्यपालन यंत्री ने बताया कि उनके ऊपर ग्वालियर के गांधी रोड स्थित हाईकोर्ट जजो के बंगलों को लेकर सर्वाधिक दबाव रहता है हर साल लाखों रुपया इन बंगलों पर खर्च होता है अब जरा बताइये मंत्री के बंगले की मरम्मत भी खबर बनती है पर मजाल कोई पत्रकार माननीय के घर की बाहर से भी फोटो खींच सके।

निचली अदालतों में जज को बोर्ड पर बैठने से पहले करीब एक साल की ट्रेनिंग अनिवार्य होती है लेकिन हाईकोर्ट में शपथ लेते ही ज़ज सीधे फैसले देने लगते है आईएएस जैसी कठिन परीक्षा पास करके आये अभ्यर्थियों को भी पहले नायबतहसीलदार, फिर तहसीलदार, एसडीएम,सीईओ जिला पंचायत के रूप में 24 महीनों तक काम करना पड़ता है फिर उन्हें कलेक्टर बनाया जाता है लेकिन हाईकोर्ट में ऐसा क्यों नही है?क्या वकील देश के कानून के सर्वज्ञाता औऱ अन्तर्यामी है?इस तकनीकी और नैतिक विषय पर आज आम आदमी भी चिंतित है।मप्र हाईकोर्ट में ऐसे जज भी है जिन्हें स्मार्ट फोन चलाना नही आता है लेकिन वे आई टी एक्ट के मामलों की भी सुनवाई करते है उम्र के जिस पड़ाव पर वे है उससे उनका सुप्रीम कोर्ट पहुचना भी तय है,क्योंकि उनके यहां खानदानी परम्परा है जज बनने की।

देश की उच्च न्यायिक व्यवस्था में खामियों का अथाह भंडार है यहां आम भारतीय के लिये कोई जगह नही है ।एक नया मीलार्ड समाज 75 साल में विकसित हो गया ठीक एंग्लो इंडियन की तरह,इस सामंती समाज के विरुद्ध निचले स्तर पर भी खदबदाहट है इसे लंबे समय तक दरकिनार करना हमारे संसदीय मॉडल के लिये बेहतर नही है। ऋषि गालब ,राजा मान सिंह,लक्ष्मीबाई और अटलजी की धरती से उठी  आवाज अपने अंजाम तक पहुँचेगी क्योंकि स्वर गांधी के है ऐसी आशा है 150 वी  बापू की जयंती पर सत्याग्रह न्याय के लिये होने जा रहा है ताकि भारत की न्यायपालिका दुनिया की सबसे चरित्रवान औऱ श्रेष्ठतम हो जैसी वह अतीत में थी लार्डशिप से पहले।

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