संजीवनी टुडे

व्यंग्य- परिवारवाद की फसल काट रही हमारी सियासत

संजीवनी टुडे 26-06-2019 14:45:57

ना ना करते आखिर मायावती ने भी परिवारवाद का दामन थाम ही लिया। हमारी सियासत भी बड़ी अजब गजब है। वर्षों परिवारवाद के लिए मुलायम सिंह को कौसने वाली मायावती ने अपने भाई और भतीजे को बसपा की कमान सौंप दी। यह हुई ना मुंह में राम और बगल में छुरी वाल बात। क्या करें यह राजनीति भी बड़ी हरामी है।


ना ना करते आखिर मायावती ने भी परिवारवाद का दामन थाम ही लिया। हमारी सियासत भी बड़ी अजब गजब है। वर्षों परिवारवाद के लिए मुलायम सिंह को कौसने वाली मायावती ने अपने भाई और भतीजे को बसपा की कमान सौंप दी। यह हुई ना मुंह में राम और बगल में छुरी वाल बात। क्या करें यह राजनीति भी बड़ी हरामी है। जिस पर विश्वास करें वही काटने दौड़ता है। कांशीराम हमेशा कहते थे कि उनकी राजनीति में परिवार और भाई-भतीजावाद में कोई जगह नहीं होगी। 

मायावती ने उनकी यह धारणा अपने तुच्छ स्वार्थों के वशीभूत होकर खंडित करने में देर नहीं की। इसे बसपा और लोकतंत्र का दुर्भाग्य कहा जाएगा कि उनकी उत्तराधिकारी मायावती ने कांशीराम की इस राजनीति को पूरी तरह तिलांजलि दे दी और परिवारवाद और भाई-भतीजावाद को बढ़ावा देने में लग गई हैं। इससे अच्छा तो यह है पार्टी परिवार की ही बनी रहे। वैसे भी कई प्रदेशों में खुल्लमखुल्ला परिवार ही पार्टी चला रहे है और उन्हें कामयाबी भी मिलती रही है। अपने बिहार में लालू यादव की आरजेडी पत्नी राबड़ी देवी और दोनों बेटों और बेटी मीसा के भरोसे सियासत के गोते लगा रही है। ये तो नीतीश ही नुगरे निकले नहीं तो बिहार की सत्ता तो लालू परिवार ने हथिया ही ली थी।  

जम्मू कश्मीर में अब्दुल्ला परिवार बेरोकटोक परिवारवाद के कट्टर हिमायती है तो तमिलनाडु में करूणानिधि परिवार सिरमौर है। पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा कहाँ पीछे रहने वाले है उनकी पार्टी कर्णाटक में सत्ता के घोड़े पर परिवारवाद के कारण ही सवार है नहीं तो सिद्धरमय्या उन्हें कब के धक्का दे चुके होते। परिवारवाद की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। अभी पंजाब में बादल परिवार ,हरियाणा में चैटाला और हुड्डा परिवार भी परिवारवाद की फसल काट रहे है। रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी भी इस मामले में एक कदम आगे है। इनके भाई और बेटे परिवारवाद का झंडा बुलंद किये हुए है। महाराष्ट्र की सियासत तीन लोक से न्यारी है ,ठाकरे और शरद पंवार को वंश की राजनीति खूब भा रही है। इनमें से अधिकांश जातीय पार्टियां है जिनका अपना क्षेत्रीय वोट बैंक है। 

लोकसभा चुनाव में इन पार्टियों का मंसूबा पूरा नहीं हुआ। यहाँ गाँधी नेहरू परिवार की चर्चा न करना बेमानी होगी। कांग्रेस पार्टी परिवारवादी पार्टियों में सबसे आगे है। परिवारवाद के हिमायतियों का कहना है गाँधी परिवार से इतर किसी ने कांग्रेस की कमान संभाली तो पार्टी की लुटिया डूबनी निश्चित है। भाजपा में भी परिवार वाद की प्रवर्ती बढ़ने लगी है। राजनाथ सिंह - पंकज सिंह , मेनका गांधी-वरुण गांधी, वसुंधरा राजे- दुष्यंत राजे, रमन सिंह-अभिषेक सिंह से लेकर कितने ही उदाहरण मिल जाएंगे।

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